Pratidin (3 Vols.)

Sharad Joshi

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  • Year: 2010

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9788170167273

प्रतिदिन (तीन खंड)
शरद जोशी के व्यंग्य कॉलम 'प्रतिदिन' पर लिखते हुए बहुत- सी बातें मेरे मन मैं हैं ।
सबसे पहले मेरे मन से वे दिन आ रहे हैं, जब ‘नवभारत टाइम्स' के आखिरी पन्ने के कोने में, शरद जोशी की फोटो के साथ बमुश्किल तमाम दस-पंद्रह पंक्तियों से लेकर पच्चीस- तिस पंक्तियों तक का छोटा-सा व्यंग्य कॉलम लगभग रोज आता था । इस छोटे-से कोने ने तब देश में अखबार पढ़ने के तरीके बदल दिए थे । हम जैसे तमाम लोग पिछले पन्ने से अखबार शुरू करने लगे थे । उत्सुकता रहती थी कि शरद जोशी ने आज किस विषय पर कैसा, क्या लिखा होगा? किस कोण से ? क्या उठाया ? तुमने पढा ? वाह यार !
शरद जोशी ने सात सालों तक रोज एक नया विषय उठाया, उसे एकदम नईं दृष्टि से देखा और फिर उसे एकदम नई भाषा-शैली के प्रयोग से ऐसा बनाया कि उन दिनो 'नवभारत टाइम्स' का वह कोना मानो फैलकर 'पूरे अखबार पर छा गया था । और अखबार पर ही क्यों, यह तो मानो पाठको की पूरी कायनात पर छा गया था । ऐसा व्यंग्य कॉलम न तो पहले लिखा गया था, न सोचा ही गया था । कुछ ही दिनो से वह इतना लोकप्रिय हो गया था कि यह अफवाह रहती थी कि एक जमाने में शरद जोशी का पेमेंट राजेन्द्र माथुर (जो अखबार के संपादक थे) से ज्यादा हो गया था । उसकी लोकप्रियता के चलते 'टाइम्स आँफ इंडिया' से उसके अंग्रेजी अनुवाद देने की कोशिश भी की गई । तब यह बात और भी विहित से सामने आई कि शरद जोशी जैसे जमीनी लेखक की मुहावरेदार और स्थानीय गमक से समृद्ध भाषा का अनुवाद करना लगभग असंभव बात है ।
आज सालों के अंतराल के बाद 'प्रतिदिन' में लिखी ये अद्भुत व्यंग्य रचनाएं जब एक साथ इस संकलन से जा रही हैं-तब इनका पुनर्पाठ आपको शरद जोशी की ऐसी विलक्षण प्रतिभा से साक्षात्कार कराता है, जिसकी याद उसके जाने के बाद व्यंग्य में उत्पन्न और व्याप्त बियाबान में और भी शिद्दत से आ रही है। -ज्ञानचतुर्वेदी

Sharad Joshi

शरद जोशी
शरद जोशी का जन्म 21 मई, 1931 को उज्जैन (म०प्र०) में हुआ ।
इन्होंने होल्कर कॉलेज, इंदौर से बी०ए० किया ।
शरद जी ने दैनिक 'मध्यदेश', भोपाल, मासिक 'नवलेखन', भोपाल तथा पाक्षिक 'हिंदी एक्सप्रेस', बंबई का संपादन किया तथा 15 वर्षों तक लगातार देश के सभी अखबारों-पत्रिकाओं में छपते रहे ।
अब तक शरद जी की 18 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है, जिनसे मुख्य हैं-परिक्रमा', 'किसी बहाने', 'तिलिस्म', 'जीप पर सवार इल्लियह', 'रहा किनारे बैठ', 'मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएँ, 'दूसरी सतह', 'हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे, 'यथा संभव', 'यत्र-तत्र-सर्वत्र, 'यथा समय' और दो चर्चित नाटक 'अंधों का हाथी' एवं 'एक था गधा उर्फ अलादाद खाँ’ ।
इन्होंने सात सालों तक लगातार 'नवभारत टाइम्स' से 'प्रतिदिन' नाम का कॉलम लिखा, जिसने उस पेपर की बिकी लगभग दुगनी कर दी ।
'क्षितिज', 'छोटी-सी बात', 'साँच को आंच नहीं', 'गोधूलि', 'उत्सव', 'दिल है कि मानता नहीं', 'उडान' और 'चोरनी' फिल्मों के संवाद लिखने के साथ ही आपने 'ये जो है जिंदगी, 'बेताल पच्चीसी', 'सिंहासन बत्तीसी', 'वाह जनाब', 'देवी जी', 'प्याले से तूफान’, 'दाने अनार के', 'मालगुडी डेज़' (हिंदी डायलॉग्स-संवाद) तथा 'ये दुनिया है गजब की' नाम से टेलीविजन सीरियल भी लिखे ।
1990 से इनको राष्ट्रपति द्धारा 'पद्यश्री' की उपाधि से सम्मानित किया गया ।
इन्होंने कवि-सम्मेलनों के मंच पर लगातार 35 वर्षों तक रचना-पाठ किया और विश्व-भर में शोहरत पाई ।
इनके लोकप्रिय नाटक 'एक या गधा उर्फ जलादाद खाँ' का जापानी भाषा में अनुवाद व मंचन हुआ ।
5 सितंबर, 1991 को बंबई में महाप्रयाण ।

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