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385

  • grid
  • Postmortem
    Ajeet Kaur
    160 144

    Item Code: #KGP-2048

    Availability: In stock


  • The Change Maker (Paperback)
    Subhash Chandra Agrawal
    325

    Item Code: #KGP-327

    Availability: In stock

    A New Smart Democratic Venture
    To Mahatma Gandhi goes the credit of starting Non-Violent political movements; to Justice Bhagwati goes the credit of starting Public Interest Litigation, and now comes Subhash Agrawal who brings about changes by writing letters—a very unusual method which has resulted in significant successes in various areas, apart from winning him awards.
    Here is a method which can be followed and used by others, and perhaps a regular movement can be organized for better results. We present the first ever study of this new smart democratic venture.

    A Few of positive responses on Subhash's RTI Petitions:
    Wealth-declaration by judges: Bill in Parliament to be introduced.
    - Foreign trips of Judges: Restrictions now imposed by Union Government.
    - Immunity against retired judges: CBI and Income Tax authorities initiate enquiries.
    - Cases against retired judges: CBI and Income Tax authorities initiate enquiries.
    - Conduct-code for judges: Bill in Parliament to be introduced.
    - Disciplinary Authority for Judges: Bill in Parliament to be introduced.
    - Twisting RTI Act by rules framed by Delhi High Court: RTI rules at Delhi High Court get revised.
    - File-notings: Accepted by DoPT being under purview of RTI Act.
    - Wealth-declaration by Union Ministers: Disclosed by Rajya Sabha Secretariat.
    - Padma panel ignoring Olympics heroes: Authorities accept big lapse.
    - Not following deadline for Padma-awards nominations: 20th November now being strictly followed.
    - Flouting norms for issuing commemorative postal stamps: No violation reported after RTI petition.
    - Fees structure at private universities: UGC to regulate fees-structure at private universities.
    - RTI fees in various names: DoPT issues circular for uniform payee-name “Accounts Officer”- Merger of public sector oil-companies: Aspect gets momentum.
  • Mushkil Kaam (Paperback)
    Asghar Wajahat
    90

    Item Code: #KGP-1454

    Availability: In stock

    मुश्किल काम
    लघुकथा के संबंध में फैली भ्रांतियों को तोड़ती असग़र वजाहत की लघुकथाएँ अपनी विशिष्ट शैलियों तथा व्यापक कथ्य प्रयोगों के कारण चर्चा में रही हैं। वे पिछले पैंतीस साल से लघुकथाएँ लिख रहे हैं। उनकी लघुकथाएँ इन अर्थों में अन्य लघुकथाओं से भिन्न हैं कि उनकी लघुकथाएँ  किसी विशेष शैली के सामने समर्पण नहीं करती है। पंचतंत्र की शैली से लेकर अत्याधुनिक अमूर्तन शैलियों की परिधि को अपने अंदर समेटे असग़र वजाहत की लघुकथाएँ पाठक का व्यापक अनुभव जगत् से साक्षात्कार कराती हैं। प्रस्तुत लघुकथाएँ सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक विषयों तक फैली हुई हैं। सामाजिक प्रतिबद्धता इन लघुकथाओं की एक विशेषता है, जो किसी प्रकार के अतिरिक्त आग्रह से मुक्त है। इन लघुकथाओं के माध्यम से मानवीय संबंधों, सामाजिक विषमताओं और राजनीतिक ऊहापोह को सामने लाया गया है।
    निश्चित रूप से प्रस्तुत लघुकथाएँ हिंदी लघुकथा की विकास-प्रक्रिया को समझने में भी सहायक सिद्ध होती हैं।
  • Kavi Ne Kaha : Rituraj
    Rituraaj
    150 135

    Item Code: #KGP-224

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : ऋतुराज
    ऋतुराज की कविता गरीब, वंचित, बहुत दूर रहने वाले लोगों की ताकत को रेखांकित करती है । वस्तुओं, लोगों और संवेदनाओं के 'आदिवास' के प्रति चिंता एक खोज और उसे बचाने की चिंता ऋतुराज की रचना में कई स्तरों पर व्यक्त होती रही हैं । बहुराष्ट्रीय निगमों के इस साम्राज्यवादी समय में ज्यादातर लोग आशा और प्रसन्नता जैसी चीजों के लिए बाजार की तरफ देख रहे हैं और उसे खरीद लेने की सुख-भ्रांति में भी रह रहे हैं, लेकिन ऋतुराज के लिए वास्तविक उम्मीद बाजार से बाहर घटित होती है; वह बाजार विरोधी है और समाज के अत्यंत साधारण मनुष्यों, गरीब आदिवासियों के भीतर निवास करती है ।
    ऋतुराज की संवेदना पर समकालीनता और उसके साथ अनायास आ जाने वाले विषयों का बहुत कम दबाब दिखता है । इसीलिए उनकी कविताएं प्रचलित, स्वीकृत और तयशुदा मुहावरे से अलग हैं । वे मुख्य भूमि से दूर किन्हीं हाशियों पर रहने वाले साधारण आदिवासी संसार से आधुनिक शहराती सभ्यता को देखते हैं और उसकी अमानुषिक, अश्लीलता, विसंगति और उसके विरूप के खिलाफ एक प्रति-संसार की रचना करते हैं और अगर कभी उनकी कोई कविता किसी आदिवासी के धनुष-बाण की तरह दिखने लगती है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है [ इसलिए कि ऋतुराज आदिवासी सभ्यता के ही कवि हैं और अपनी भाषा को एक आदिम औजार की तरह इस्तेमाल करते हैं । इसका एक कारण तो शायद यह है कि ऋतुराज का ज्यादातर जीवन राजस्थान के आदिवासियों, भीलों के क्षेत्र में बीता है और दूसरा शायद यह कि उनकी संवेदना शहरी तनावों के प्रति सजगता के बावजूद देशज और स्थानिक है ।
    आदिवासी जीवन की सरलता, मासूमियत और अच्छाइयाँ ऋतुराज की कविता का प्राणतत्त्व हैं, लेकिन वह आदिवासियों के मन की ही तरह जटिल और सांकेतिक भी है । एक आदिवासी व्यक्ति जितना व्यक्त होता है उससे कहीं अधिक अव्यक्त रहता है । शायद ऋतुराज की कविता भी इसी तरह है : शब्दों के शिल्प के पीछे एक जटिल संरचना ।
  • Jahaanoon
    Manorma Jafa
    240 216

    Item Code: #KGP-197

    Availability: In stock

    कॉलेज में रक्षाबंधन की छुट्टी थी। अनुराधा सुबह-सुबह ही तैयार होकर निकल गई। मैं उसे फाटक तक पहुँचाने गई। हरसिंगार के पेड़ के नीचे खड़ी थी। जमीन पर बिखरे फूल महक रहे थे। मुझसे रहा नहीं गया। मैंने फूल बीनकर अपने दुपट्टे के एक कोने में रखने शुरू कर दिए कि तभी एक मोटरसाइकिल बराबर में आकर रुक गई। मैंने मुड़कर देखा, अनुराधा के राजू भैया थे।

    "क्यों भई, किसके लिए फूल बीन रही हो?"

    मन में तो आया कह दूँ ‘आपके लिए।’ पर  जबान नहीं खुली।

    "अनुराधा को लेने आया था। आज रक्षाबंधन है। बुआ जी के यहाँ उसे मैं ही पहुँचा दूँगा।"

    "पर वह तो अभी-अभी वहीं चली गई।"

    "मैंने तो उससे कहा था कि मैं आऊँगा! बड़ी बेवकूफ है।"

    "भूल गई होगी।"

    "तुम्हारा क्या प्रोग्राम है? तुम भी उसके साथ क्यों नहीं चली गईं? रक्षाबंधन में सब लड़कियाँ बहनें और सब लड़के उनके भैया," और वह हँसने लगे।

    "क्या मतलब?"

    "मेरा कोई मतलब नहीं था। तुम चलो तो मैं तुम्हें भी अनुराधा की बुआ के यहाँ ले चलता हूँ।"

    "नहीं, मुझे पढ़ाई करनी है। यहीं रहूँगी।"
    —इसी उपन्यास से
  • Zindagi Aur Jugaar
    Manohar Puri
    250 225

    Item Code: #KGP-9025

    Availability: In stock

    जिन्दगी और जुगाड़
    आपाधापी के इस युग में व्यक्ति को अपना अस्तित्व बचाने के लिए जुगाड़ का सहारा लेना ही पड़ रहा है। व्यक्तिगत, पारिवारिक अथवा सामाजिक जीवन में कोई भी गतिविधि बिना जुगाड़ के संपन्न करना निरंतर कठिन होता जा रहा है। आर्थिक, राजनीतिक और यहां तक कि शैक्षणिक जीवन भी जुगाड़ पर निर्भर होकर रह गया है। हर एक व्यक्ति दिन-भर किसी न किसी प्रकार से जुगाड़ करके अपने जीवन की गाड़ी को धकेलने का प्रयास कर रहा है। उसके चौबीसों घंटे किसी न किसी प्रकार का जुगाड़ करने में ही व्यतीत होते हैं। देश की अर्थव्यवस्था, राजनीति और अन्य सभी गतिविधियां जुगाड़ के बिना निरर्थक हैं। जिन्दगी का कोई पक्ष जुगाड़ से अछूता नहीं रहा, इसका अनुभव प्रायः हर व्यक्ति को प्रत्येक कदम पर होता है।
    इस उपन्यास में जीवन के कुछ ही पक्षों को छूना संभव हो पाया है। रोजमर्रा का पारिवारिक जीवन, हमारे परस्पर संबंध, राजनीति, शिक्षा, चिकित्सा और प्रशासन, समाज में निरंतर फैलता भ्रष्टाचार, नशे की दुनिया में डूबती हमारी नई पीढ़ी, धन की अंधाधुंध दौड़ के मोहजाल में फंसी वर्तमान पीढ़ी जल्दी से जल्दी वह सब प्राप्त कर लेना चाहती है, जो उसे वर्षों के परिश्रम के बाद भी ईमानदारी से मिलना संभव नहीं दिखाई देता। इसके लिए शॉर्टकट जरूरी है और यही शॉर्टकट जुगाड़ का मकड़जाल है। एक बार इसमें फंसा व्यक्ति लाख सिर पटक ले, इससे बाहर नहीं निकल पाता।
    इस उपन्यास में विश्वविद्यालयों में पनपते माफिया गिरोह और देह-व्यापार, अस्पतालों से होती मानव-अंगों की व्यापक स्तर पर तस्करी और राजनीति में लगातार पनप रहे भ्रष्ट गठजोड़ सरीखे कुछ पक्षों को ही मात्र छुआ जा सका है। ये समाज में फलने-फूलने वाले कैंसर की एक बानगी मात्र हैं। आप स्वयं इससे कहीं अधिक जानते हैं और प्रतिदिन उसे भोगने को अभिशप्त हैं। समाज के किसी एक व्यक्ति अथवा वर्ग ने इस उपन्यास से प्रेरणा लेकर विरोध का एक स्वर भी उछाला तो मैं अपने प्रयास को सार्थक समझूंगा। हां, इतना निश्चित है, जितना इसमें लिखा गया है, हालत उससे कहीं अधिक गंभीर है। समय रहते जाग जाना बहुत जरूरी है। जागो, कहीं बहुत देर न हो जाए।    
  • Triya Hath
    Maitreyi Pushpa
    240 216

    Item Code: #KGP-82

    Availability: In stock


  • Toro Kara Toro-5 (Sandesh)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #KGP-667

    Availability: In stock


  • Sikha Acharshastra
    Satayendra Pal Singh
    250 225

    Item Code: #KGP-453

    Availability: In stock

    सिख गुरु साहिबान ने मानवता पर सबसे बड़ा परोपकार किया धर्म को धीर-गंभीर शब्दों के इंद्रजाल और कर्मकांडों के भंवर से मुक्त करके। उन्होंने कहा कि ऐसा पांडित्य और विद्वत्ता व्यर्थ है, खच्चर पर लदे भार व कुंचर स्नान की तरह, यदि इंद्रियां वश में नहीं और आचरण शुद्ध-पवित्र नहीं। इसका एक मात्र उपाय है परमात्मा की शरण में उसकी कृपा प्राप्ति जिससे मन ज्ञान के सूर्य से उद्दीप्त हो उठे। धर्मानुकूल आचार के लिए मन पर सतिगुरु ज्ञान का अंकुश आवश्यक है। सार्थक-सफल जीवन योग्य ज्ञान-चक्षु प्राप्त करने की जो राह सिख गुरु साहिबान ने दिखाई उस ओर ले चलने का संपुष्ट प्रयास है यह पुस्तक जिससे सभी वैयक्तिक व सामाजिक प्रश्नों के उत्तर खोजे जा सकते हैं।
  • Sant Naamdev
    Hari Krishna Devsare
    120 108

    Item Code: #KGP-9324

    Availability: In stock

    नामदेव महाराष्ट्र के संतों में सबसे वरिष्ठ थे। मराठी भाषा में ‘अभंग’ नामक छंद में रचना करने वाले प्रथम संत कवि नामदेव ही थे। उनका कार्यक्षेत्र केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं था। उन्होंने अपनी भक्ति-रचनाओं ‘अभंगों’ के द्वारा उत्तर भारत में पंजाब तक भक्ति-मार्ग का प्रचार किया। माधव गोपाल देशमुख लिखते हैं ‘‘नामदेव एक सामासिक शब्द है और उसका अर्थ है नाम ही देव है।’’ संत नामदेव ने अपनी संपूर्ण रचना में नाम ही महिमा जितने ढंग से और जैसे वर्णन की है, वह शायद ही किसी और संत ने की हो-
    नाम में ही नारायण है। वह भक्तों के अधीन है।
    भक्ति न मांगकर। नाम में ही चारों मक्ति हैं।
    नाम न भूलो। वही स्वर्ग में निशान है।
    नामा कहते हैं ऐसे प्राणी। नारायण में जाकर समान हो जाते हैं।

    जो वाणी से नाम लेता है, उसे यमदेव वंदन करते हैं।
    कालादिक उसे समान रूप से वंदन करते हैं।
    ऐसा नाम श्रेष्ठ है सबमें वरिष्ठ है।
    (नाम के) अच्छे उच्चारण से स्वर्ग गूंजता है।
    उस नाम-महिमा का वर्णन ब्रह्मा करने गए।
    उन्हें आदि-अंत की उपमा ही नहीं सूझी
    नामा कहता है कि पाठ से, नामा की ही राह से 
    प्रत्यय प्रकट होता है विट्ठल हरि।।

    —इसी पुस्तक से
  • Rahiman Dhaaga Prem Ka (Paperback)
    Malti Joshi
    100

    Item Code: #KGP-7039

    Availability: In stock

    रहिमन धागा प्रेम का
    "पापा, अगर आप सोच रहे है कि जल्दी ही मुझसे पीछा छुडा लेंगे तो आप गलत सोच रहे है । मैं अभी दस-बीस साल शादी करने के मूड में नहीं हूँ। मैं आपके साथ आपके घर में रहूंगी । इसलिए यह घर हमारे लिए बहुत छोटा है । प्लीज़, कोई दूसरा बड़ा-सा देखिए।"
    "तुम शादी भी करोगी और मेरे घर में भी रहोगी, उसके लिए मैं आजकल एक बड़ा-सा घर और एक अच्छा सा घर-जमाई खोज रहा हूँ। रही इस घर की, तो यह तुम्हारी माँ के लिए है । यह जब चाहे यहीं शिफ्ट हो सकती है । शर्त एक ही है-कविराज इस घर में नहीं आएंगे और तुम्हारी माँ के बाद इस घर पर तुम्हारा अधिकार होगा ।"
    अंजू का मन कृतज्ञता स भर उठा । उसने पुलकित स्वर में पूछा, "तो पापा, आपने माँ को माफ कर दिया ?"
    "इसमें माफ करने का सवाल कहाँ आता है ? अग्नि को साक्षी मानकर चार भले आदमियों के सामने मैंने उसका हाथ थामा था, उसके सुख-दुःख का जिम्मा लिया था । जब उसने अपना सुख बाहर तलाशना चाहा, मैंने उसे मनचाही आज़ादी दे दी । अब तुम कह रही हो कि वह दुखी है तो उसके लौटने का मार्ग भी प्रशस्त कर दिया । उसके भरण-पोषण का भार मुझ पर था । गुजारा-भत्ता तो दे ही रहा हूँ अब सिर पर यह छत भी दे दी।"
    [इसी संग्रह की कहानी "रहिमन धागा प्रेम का' से]

  • Shyamji Krishna Verma : Jeevan Darshan
    Mukesh Parmar
    150 135

    Item Code: #KGP-480

    Availability: In stock

    भारतभूमि पर बलिदानी क्रांतिकारियों की संख्या असंख्य है किंतु विदेश में जाकर भारत की स्वाधीनता के लिए संग्राम करने वालों में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस और महात्मा गांधी का नाम अग्रिम पंक्ति में लिखा जाता है। इसी क्रम में श्यामजी कृष्ण वर्मा का नाम भी उल्लेखनीय है। विचारों की भिन्नता और कार्यशैली में अंतर अवश्य हो सकता है किंतु नेताजी और श्यामजी कृष्ण वर्मा की परिस्थितियों और कार्यशैली में ज्यादा अंतर नहीं है। श्यामजी ने देश-विदेश में अपनी कार्यकुशलता, संगठनशक्ति और भारतीय स्वाधीनता का जो शंखनाद किया उसने भारत सहित समूचे यूरोप और विशेषकर ब्रिटिश साम्राज्य को कंपित कर दिया। ऐसी क्रांति के युद्धवीरों में श्यामजी कृष्ण वर्मा का नाम अग्रिम पंक्ति में रेखांकित करने योग्य है।
  • Shaam Ki Jhilmil
    Govind Mishra
    300 270

    Item Code: #KGP-9309

    Availability: In stock

    बुढ़ापे में अकेले हो जाने पर, फिर जी भर जी लेने की उद्दाम इच्छा, उसे साकार करने के प्रयत्न, एक-पर-एक...कुछ हास्यास्पद, कुछ गंभीर, कुछ बेहद गंभीर कि जीवन इहलोक और परलोक में इस पार से उस पार बार-बार बह जाता हो....कोई सीमारेखा नहीं। हताशा, जीने की मजबूरी, कुछ नया लाने की कोशिश...दरम्यान उठते जीवन सम्बन्ध मूलभूत प्रश्न
    गोविन्द मिश्र का यह बारहवाँ उपन्यास वृद्धावस्था के अकेलेपन और जिजीविषा के द्वन्द और टकराहट पर लिखा गया संभवतः हिंदी का पहला उपन्यास है।
  • Beeswin Sadi Ki Laghu Kathayen-1
    Balram
    350 315

    Item Code: #KGP-847

    Availability: In stock

    बीसवीं सदी की लघुकथाएं-1
    इतिहास अगर अतीत की शव-साधना हो तो ऐसे इतिहास में जाने का हमारा कोई  इरादा नहीं, लेकिन लघुकथा के इतिहास में जाना लघुकथाओं के शवों के बीच से गुजरना भर नहीं है। बेशक एक समय बहुत शक्तिशाली मानी जाने वाली अनेक रचनाएं कालांतर में रचनाओं के शव भर रह जाती हैं और बड़े रचनाकारों की ऐसी शव-रूप रचनाओं को भी साहित्य के आचार्य बहुत समय तक विक्रमादित्य की मुद्रा में ढोते रहते हैं, लेकिन कुछ रचनाएं दीर्घजीवी होती हैं, कालजयी। सदियों पुरानी ऐसी दीर्घजीवी रचनाओं के बीच से गुजरने वाला इतिहास अतीत में समकालीनता की प्रतिष्ठा-पुनर्प्रतिष्ठा का श्रम-साध्य उपक्रम होता है और दुर्भाग्य से हिंदी लघुकथा में यह जरूरी काम अभी तक नहीं हो सका है। और शायद इसीलिए इतनी रचना-बुहलता के बावजूद लघुकथा को विधा का दर्जा अभी तक हासिल नहीं हो सका है। अभी हम विधा और उपविधा के द्वंद्व से ही नहीं निकल पाए हैं। हम लेकिन इस बहस में पड़े बगैर सिर्फ निवेदन यह करना चाहते हैं कि बीसवीं सदी की आंख खुलते हिंदी लघुकथा ने भी आंख-कान खोलकर मुलुर-मुलुर इस दुनिया-जहान को देखना, सुनना और समझना शुरू कर दिया था। बीसवीं सदी के शुरू होने से 20-25 साल पहले लिखी गई भारतेंदु हरिश्चंद्र की पुस्तिका ‘परिहासिनी’ की चुटकियों को चुटकुला कहकर उड़ा दें और सन् 1900 के आसपास लिखी गई माखनलाल चतुर्वेदी की लघुकथा ‘बिल्ली और बुखार’ के काल-निर्णय पर मतैक्य न हो सके, ऋषि जैमिनी कौशिक ‘बरुआ’ को बोलकर लिखाई गई माखनलाल चतुर्वेदी की इस लघुकथा की प्रामाणिकता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया जाए तो भी 1901 में लिखी गई माधव सप्रे की लघुकथा ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ से हम हिंदी लघुकथा का आरंभ बेहिचक स्वीकार कर सकते हैं। बीसवीं सदी के खत्म होते न होते हिंदी लघुकथा ने अपनी जड़ और जमीन पर मजबूत तर्कों के साथ जो दावे ठोंक दिए हैं, उन्हें खारिज कर सकना अब किसी के लिए भी आसान नहीं होगा। हिंदी लघुकथा का अब तक का सबसे बड़ा यह संचयन दो सौ से अधिक कथाकारों की चुनी हुई लघुकथाओं का ऐसा गुलदस्ता है, जो हिंदी के प्रांगण में मह-मह महकेगा, देर तक और दूर तक, ऐसी उम्मीद हमें है।
  • Yaadon Ke Galiyaare Se
    Ramesh Chandra Diwedi
    180 162

    Item Code: #KGP-9321

    Availability: In stock

    साहित्य समाज का दर्पण है। काव्य समाज का स्वरूप है। समाज के अनुरूप ही काव्य की रचना होती है। यह धारणा अनादिकाल से चली आ रही है, जो आज भी चरितार्थ है। काव्य और साहित्य का अन्योन्याश्रय संबंध है। अद्यतन कवि की रचना संसर्ग से प्रभावित होती है। चूँकि कवि भ्रमणशील होते हैं, इसलिए संसर्ग गुणों का प्रभाव उन पर पड़ता ही है। ‘संसर्गजा दोष गुणा भवंति’ यह सूक्ति सार्थक प्रतीत होती है। साथ ही आज काव्य की रचना समाज की माँग के अनुरूप होती है। कवि जब आत्मा की आवाज को सुनकर रचना करता है, तब वह हृदयस्पर्शी हो जाता है। कवि की कवित्व शक्ति अनंत होती है। यह पूर्व संस्कारों से मिलती है। ‘नरत्वं दुर्लभं लोके विद्या तत्र सुदुर्लभा, कवित्वं दुर्लभं तत्र शक्तिस्तत्र सुदुर्लभा’।
    ब्रह्मा की सृष्टि में केवल छह रस होते हैं—कटु, अम्ल,कषाण, लवण, तिक्त तथा मधुर किंतु कवि की सृष्टि में  शृंगार, हास, करुण, रौद्र, वीर, बीभत्स, अद्भुत, भयानक और शांत नौ रस होते हैं। कवि अपने संकल्प मात्र से ही किसी रस का आवाहन कर सकता है, पर ब्रह्मा के रस को प्राप्त करने के लिए अन्यान्य उपकरणों की आवश्यकता होती है। कवि का अपना एक काव्य लोक होता है। काव्य कल्पना पर आधरित है। कल्पना का आधर सत्य है। यह आधर कवि को समाज से प्राप्त होता है।
    कविता, कवि के हृदय की वह ध्वनि है, जो मुँह से अथवा लेखनी से निकलते समय कवि को भी अचेत कर देती है। सुनने के बाद ही कवि को भी पता चलता है कि उसने क्या कहा। ऐसी ही कविता काव्य लोक में समादृत होती है।
    आज शहरी सामाजिक जीवन तथा संस्कृति में सिमटा भारत गाँव की ओर उन्मुख हो रहा है। ग्रामीण भारत को शहर में लाने का प्रयास कर रहा है। सरकारी तंत्रा भी ग्रामीण विकास पर अधिकाधिक बल दे रहा है। महात्मा बुद्ध ने भी राजभवन छोड़कर शांति के लिए ग्राम और वन की ओर प्रस्थान किया था। इस सामाजिक परिवेश में रचित यह काव्य संग्रह समाज और परिवारों के उन अनछुए स्वरूप को सामने लाया है, जो बुध जन हृदय के किसी कोने में दम तोड़ रहा था।
    —रमेश चन्द्र द्विवेदी

  • Mere Saakshatkaar : ShrInaresh Mehta
    Shree Naresh Mehta
    245 221

    Item Code: #KGP-871

    Availability: In stock


  • Megha Megha Pani De
    Madhukar Singh
    60

    Item Code: #KGP-1155

    Availability: In stock

    मेघा-मेघा पानी दे
    (एक प्राचीन ऐतिहासिक कथा पर आधारित नाटक)

    गांव की एक डगर। सामने बड़ा-सा चरागाह है। कृष्ण एक ऊंचे टीेले पर बैठा है। तीन-चार लड़के कुछ दूरी पर एक-दूसरे से कटे हुए बैठे हैं। कृष्ण की बंसी के स्वर धीरे-धीरे तेज होते जा रहे हैं।
  • Mere Saakshaatkaar : Mridula Sinha
    Mridula Sinha
    300 270

    Item Code: #KGP-9346

    Availability: In stock

    रचनाकार का मन स्वयं में एक रहस्य है। मन में निहित भावनाएं, संकल्पनाएं, स्वीकृतियां, असहमतियां, प्रार्थनाएं आदि किस विध में या किस शिल्प में व्यक्त होंगी यह एक अबूझ तथ्य है। विद्वानों का ऐसा कहना है कि जब कोई रचनाकार को अपने प्रश्नों से उकसाता है तब मन को प्रकट होने का एक भिन्न प्रयोजन मिल जाता है। ‘किताबघर प्रकाशन’ की बहुचर्चित और पाठकप्रिय पुस्तक  शृंखला ‘मेरे साक्षात्कार’ के इस संकलन में सुप्रसिद्ध  रचनाकार मृदुला सिन्हा ने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व के विभिन्न पक्षों पर बात की है। उनका कार्यक्षेत्र विस्तृत, अनुभव व्यापक और चिंतन बहुमुखी है, इसलिए उनके उत्तर जीवन व समय की गहराइयों में प्रवेश कर जाते हैं।
    एक प्रश्न के उत्तर में मृदुला सिन्हा कहती हैं, ‘साधारण से साधारण नारी बहुत कुछ दे जाती है और उसका यह देना ही मुझे आंदोलित करता है और मेरे साहित्य के लिए प्रेरणादायी प्रसंग बनता है। सामाजिक समस्याओं को सूचीबद्ध कर देना ही साहित्यकार का काम नहीं है। उसी समस्याग्रस्त समाज व्यवहार से समस्याओं का निदान ढूंढ़कर भी प्रस्तुत करना साहित्य का उद्देश्य है।’ स्पष्ट है कि वे वितर्कों या कुतर्कों की उलझनों से दूर रहकर समाज के सकारात्मक विश्लेषण में रुचि रखती हैं। उनको तुलसीदास के इस कथन पर भरोसा है—‘छूटहि मल कि मलहि के धेये, घृत कि पाव कोउ बारि बिलोये।’
    मृदुला सिन्हा के व्यक्तित्व के अनेक आयाम हैं। केवल लेखक के रूप में नहीं सामाजिक कार्यकर्ता, राजनीतिक चिंतक, महिला हित संरक्षक आदि के रूप में भी उन्होंने अपनी प्रखर पहचान बनाई है। कहानी, उपन्यास, कविता और ललित निबंध को वे जितना साहित्य में रचती हैं, उससे अधिक जीवन में जीती हैं। इसीलिए पाठक उनकी रचनाओं और बातों में अद्भुत प्रवाह महसूस करता है।
    ‘मेरे साक्षात्कार’ के अंतर्गत मृदुला सिन्हा ने जिन तमाम मुद्दों पर अपनी बात रखी है, उनका संबंध व्यापक भारतीय समाज से है। इस अर्थ में ये साक्षात्कार ज्ञानप्रद और प्रेरक हैं।
  • Samkalin Sahitya Samachar September, 2017
    Sushil Sidharth
    0

    Item Code: #September, 2017

    Availability: In stock

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rajendra Rao (Paperback)
    Rajendra Rao
    150

    Item Code: #KGP-503

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : राजेन्द्र राव
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार राजेन्द्र राव ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'उत्तराधिकार', 'लोकी का तेल', 'अमर नहीं यह प्यार', 'वैदिक हिंसा', 'बाकी इतिहास', 'घुसपेट','छिन्नमस्ता' 'असत्य के प्रयोग', 'शिफ्ट' तथा 'नौसिखिया'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक राजेन्द्र राव की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kahani Ka Abhaav (Paperback)
    Narendra Kohli
    60

    Item Code: #KGP-7095

    Availability: In stock


  • Nirogyogsadhna
    Manoj Kumar Chaturvedi
    300 270

    Item Code: #KGP-677

    Availability: In stock

    निरोगयोगसाधना
    आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम हर क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं और दिन-रात उसके लिए प्रयास करते रहते हैं। इस आपाधापी में व्यक्ति सबसे अहम चीज को जो नकार देता है वह है ‘स्वयं का स्वास्थ्य’। वह यह नहीं समझते कि इस संसार की प्रत्येक वस्तु तभी आपके लिए उपयोगी होगी जब आप उसका आनंद लेने के लिए तैयार होंगे। व्यक्ति यदि स्वस्थ नहीं तो संसार की कीमती से कीमती वस्तु भी उसके लिए बेकार है। स्वस्थ जीवन है तो जहान है। 
    योग द्वारा कैसे व्यक्ति मानसिक और शारीरिक रूप से संपूर्णतया स्वस्थ रह सकता है, इसका विस्तारपूर्वक वर्णन इस ‘निरोगयोगसाधना’ नामक पुस्तक के माध्यम से किया गया है।
    योग दर्शनशास्त्र में वर्णित सूत्र षड्दर्शन का ही छठा अंग है। ये षड्दर्शन वेदों के उपांग माने गए हैं। इसी कड़ी में आगे बढ़ते हुए शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निशक्त, छंद, ज्योतिष आदि वेदों के अंग कहलाते हैं जिनके द्वारा वेद मंत्रों के अर्थ का ज्ञान होता है।
    योग ऐसी कला है जो प्रकृति और मनुष्य के बीच के अंतर को स्पष्ट कर व्यक्ति के समक्ष प्रस्तुत करती है। अर्थात् व्यक्ति योग के माध्यम से इंद्रियों को अपने वश में करने लायक बन जाता है और माया के बंधन से भी स्वयं को तोड़कर मुक्त हो जाता है। योग अनादिकाल से चला आ रहा है और इसकी उपयोगिता व्यक्ति तभी समझ सकता है जब वह योग को स्वयं पर लागू करे, उसमें रम जाए। योग करने वाला व्यक्ति कभी बूढ़ा या बीमारी से ग्रसित नहीं होता।
    —भूमिका से
  • Gandhivaad Aur Hindi Kavya
    Bhakt Ram Sharma
    225 203

    Item Code: #KGP-890

    Availability: In stock

    महात्मा गांधी इस शताब्दी के महत्तम व्यक्तियों में गिने जाते हें। उनका चरित और चिंतन तपःपूत है। भारतीय इतिहास में महात्मा बुद्ध के अतिरिक्त ऐसा शक्तिशाली लोकनायक नहीं हुआ। उनके व्यक्तित्व का स्पर्श पाकर ‘कोई कवि बन जाए संभाव्य है’। मैथिलीशरण गुप्त, सियारामशरण गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, माखनलाल चतुर्वेदी, सोहनलाल द्विवेदी और भवानीप्रसाद मिश्र जैसी प्रतिभाएं उनके संपर्क में आकर उद्दीप्त हुई हैं। गांधीवादी काव्य की सबसे बड़ी शक्ति उज्जवल भारतीय परंपराओं का स्वीकार है। इन कवियों ने जीवन और काव्य के माध्यम से स्वातंत्र्य-आंदोलन में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। वस्तुतः हिंदी काव्य के इतिहास में गांधी-विचारधारण से प्रभावित रचनाओं के अनुशीलन के बिना तत्कालीन हिंदी साहित्य के विकास-क्रम को सम्यक् परिप्रेक्ष्य में समझना कठिन होगा। गांधी-विचारधारा के फलस्वरूप ही तत्कालीन कवियों ने शुद्ध, सात्त्विक, सुरुचिपूर्ण एवं स्वस्थ दृष्टिकोण संपन्न कृतियों की सृष्टि की। हिंदी साहित्य के इतिहास-लेखक ऐसे स्वस्थ साहित्य का सम्यक् मूल्यांकन नहीं कर पाए थे। सर्वप्रथम तो गांधी-विचारधारा को आत्मसात करना ही बड़ा दुष्कर कार्य हैं फिर दूसरा उस विचारधारा को काव्य में अनुम्यूत करना और भी कठिन कार्य है। ऐसे गांधीवादी साहित्य का पूर्वाग्रह से मुक्त मूल्यांकन ही इस ग्रंथ की महत्ता एवं मौलिकता है। गांधीवाद काव्य को कहां, कितना, किस रूप में प्रभावित, मुखरित करता है, लेखक ने प्रस्तुत ग्रंथ में यही सब जांचा-परखा है।
  • Datta
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    350 315

    Item Code: #KGP-575

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Narendra Kohli
    Narendra Kohli
    215 194

    Item Code: #KGP-2033

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : नरेन्द्र कोहली
    ऐसा कभी-कभी ही होता है कि आपका कोई पाठक, मित्र, समीक्षक, छात्र या कोई वास्तविक जिज्ञासु किसी प्रयोजन से या मात्र अपनी जिज्ञासा-शांति के लिए अपने सतह को कुछ छीलकर आपको तह तक नहीं तो कम से कम आपकी त्वचा के नीचे तक जानना चाहता है । वह लेखक के मानसिक संसार को उघाड़ना चाहता है । और मैंने प्रायः देखा है कि उस प्रकार की जिज्ञासा लिए हुए प्रश्नों का उत्तर मेरे पास भी बना-बनाया, तैयार नहीं होता । मुझे भी स्वयं अपने आप को टटोलना पाता है । अपने मानसिक संसार को पढ़ना पड़ता है । आश्चर्य होता से कि मैं तो स्वयं ही अपने आप को नहीं जानता था । नहीं जानता था कि मेरा 'स्व' क्या है । वे ऐसे प्रश्न होते हैं, जिनके माध्यम से लेखक स्वयं अपना आविष्कार करता है । अपने 'स्व' से परिचित होता है । उन प्रश्नों का उपकार मानता है कि उन्होंने उसे स्वयं अपने आप से परिचित कराया ।
    मेरा प्रयत्न है कि इस पुस्तक के माध्यम से कुछ ऐसे ही साक्षात्कार अपने पाठकों तक पहुंचा सकूँ । समय है कि वे उस लेखक नरेन्द्र कोहली को कुछ जान सकें, जो सामने पड़ने पर, मिलने-जुलने पर सामान्यत: आपसे मिलता नहीं है । वह नरेन्द्र कोहली अपने एकांत से है, जो सामान्यता सार्वजनिक रूप से सामने आना नहीं चाहता । आत्मीय जनों से मिलना और बात है और राह चलते लोगों को दिखना और । फिर भी...
    -नरेन्द्र कोहली
  • Vrihat Hindi Lokokti Kosh
    Bholanath Tiwari
    795 716

    Item Code: #KGP-2107

    Availability: In stock

    वृहत् हिन्दी लोकोक्ति कोश
    हमारी प्रभावी, पूर्ण और आकर्षक अभिव्यक्ति का सबसे समर्थ साधन लोकोक्तियाँ होती हैं। वे वह गागर होती हैं, जिनमें अर्थ के सागर भरे होते हैं। अभी तक हिन्दी लोकोक्तियों का कोई ऐसा बड़ा कोश प्रकाशित नहीं हुआ है, जिसमें अधिकाधिक लोकोक्तियों को लिया गया हो। प्रस्तुत कोश इसी दिशा में एक महत् प्रयास है।
    इस प्रसंग में यह ध्यान देने की बात है कि ‘लोकोक्ति’ लोक की उक्ति होती है, इसलिए मानक भाषा की तुलना में लोकभाषा में लोकोक्तियों का प्रयोग कहीं अधिक होता है और मानक भाषा में भी काफी लोकोक्तियाँ लोकभाषा से ही छनकर आती हैं, जिन्हें संक्षेप में यहाँ देखा जा सकता है।
    प्रस्तुत ‘लोकोक्ति कोश’ में उपर्युक्त दृष्टि से कई विशेषताएँ उल्लेखनीय हैं। एक तो यह कि इसमें हिन्दी में प्रचलित और प्रयुक्त काफी लोकोक्तियाँ ले ली गई हैं। निश्चय ही इस दृष्टि से अब तक प्रकाशित हिन्दी लोकोक्ति कोशों में यह सबसे बड़ा लोकोक्ति कोश है।
    दूसरे, इसमें हिन्दी की अधिकांश बोलियों की अनेक लोकोक्तियाँ भी ली गई हैं, जैसे—अवधी, कन्नौजी, कौरवी, गढ़वाली, छत्तीसगढ़ी, निमाड़ी, मालवी, मैथिली, राजस्थानी, हरियाणवी, हाड़ौती आदि।
    तीसरे, मानक हिन्दी की अधिकाधिक तथा हिन्दी की प्रायः सभी लोकोक्तियों तथा हिन्दी की बोलियों की अधिकाधिक लोकोक्तियों को लेने के अतिरिक्त अपने देश की असमिया, उर्दू, कश्मीरी, गुजराती, तमिल, तेलुगु, पंजाबी, बंगला, मराठी, मलयालम, सिंधी, संस्कृत आदि से भी काफी लोकोक्तियाँ तुलनात्मक रूप में यथास्थान दी गई हैं।
    चौथी विशेषता यह है कि उपर्युक्त लोकोक्तियों के अतिरिक्त इसमें देश के बाहर की अंग्रेज़ी, अरबी, उज़बेक, तुर्की, फारसी, रूसी आदि की भी जो तुलनात्मक लोकोक्तियाँ मिल सकी हैं, शामिल कर ली गई हैं।
    इस तरह यह कोश अपने आयाम में अब तक के लोकोक्ति कोशों से काफी अलग भी है और बड़ा भी।
    डॉ. तिवारी के लगभग 32-33 वर्षों के परिश्रम का परिणाम यह कोश निश्चय ही हिन्दी में अद्वितीय है। 

  • Pata Nahin Kal
    Pravesh Chaturvedi
    80 72

    Item Code: #KGP-1850

    Availability: In stock

    पता नहीं कल क्या गाऊँगा
    जैसे-जैसे हम सभ्य होते गए, नए-नए शब्दों से हमारी भाषा का विकास होता गया । हम समझदार होते गए-डॉक्टर-इंजीनियर-एडमिनिस्ट्रेटर, नेता-अभिनेता और पता नहीं क्या-क्या । 
    पहले जो दिल कहलाता था वह हार्ट कहलाने लगा हार्ट एनलार्जमेंट यानी बड़ा दिल । सो बड़े दिल वाला, जिसका हार्ट एनलार्ज हो गया हो।
    उसी भाषा में लाल रंग यानी इमरजेंसी !
    हम दिल की भाषा से दिमाग की भाषा बोलने लगे, लेकिन हमारा दिल तो दिमाग की जगह फिट हो गया है। इसीलिए हम दिल की बात सुनते हैं और दिल की बात कहते हैं ।
    अब नाम तो 'प्रवेश' है सो जहाँ भी अंतरंग प्रदेशों में जाना होगा वहीं मैं तुम्हारे सफल प्रयास का पहला द्वार होऊँगा-
    बिना मुझसे मिले तुम भीतर नहीं जा सकोगे!
    एक प्रयास असफल तो दूसरा 'प्रवेश द्वार' !
    यानी आशा के दीप से उजियारा !
    यह तो मुझे भी पता नहीं के कल क्या गाऊँगा
    लेकिन अपना अंतरंग सखा मैं
    भरी भीड़ में अकेला मिल जाऊँगा
    तब हम दोनों साथ-साथ कहेगे-सुनेंगे-
    कहाँ-कहाँ की लनतरानियाँ
    झुठी-सच्ची कुछ कहानियाँ। 

    -प्रवेश चतुर्वेदी
  • Rupantar
    Muni Rupchandra
    75 68

    Item Code: #KGP-1858

    Availability: In stock

    रूपान्तर
    कविता सृष्टि का रूपान्तर है । मुनि रूपचन्द्र जी इस रूपान्तर के अनोखे भाष्यकार है जो प्रचलित काव्यशैलियों में निरन्तर उस गहरे, अनिर्वच आत्म- गोपन को वाणी दे रहे है ।
    प्रचलित शब्दार्यों से आन्तरिक ध्वन्यार्थों को व्यंजित करने का चामत्कारिक कौशल इन कविताओं में है। इनमें अतिरिक्त रूप से कोई प्रदर्शन नहीं है। अत्यन्त सहज भाव से मानवीय आर्द्रता को रूप देने की साधना का ही जैसे यह प्रतिफल है ।
    एक लंबे अर्से से शब्दों के द्वारा मुनिश्री लयबद्ध या लेयमुक्त आधारों पर आन्तरिक लय का सृजन कर उस सेतु का निर्माण कर रहे है जिस पर चढ़कर आप लोकोत्तर अनुभवों का स्पर्श भी कर सकते हैं और लौटकर जैविक सृष्टि के सौन्दर्य का अनुभावन भी कर सकते हैं ।
    विचित्र सृष्टि विधान में क्रूरतम के बीच भी अविश्वसनीय रसधारा बहती है किन्तु मुनिश्री क्रूरतम के रसमय रुपाख्यान के रूपान्तर को वाणी देते हैं । सदियों से कवि साधना की पूर्णता की खोज में लगे है । और एक साधक सदियों की खोज के अनुभव के भीतर आवेग के उफनते सागर को शब्द, अर्थ, लय, इंगित के बीचोबीच आकृति में बाँधने, आत्मा के वर्णहीन रूप में ढालने में निरत है…क्या कविता भी साधना नहीं है...
  • Bhartiya Naari Aur Pashchimikaran
    Shanti Kumar Syal
    300 270

    Item Code: #KGP-602

    Availability: In stock

    भारतीय नारी और पश्चिमीकरण 
    पश्चिम की उपभोक्तावादी संस्कृति और सभ्यता के दुष्प्रभाव ने भारतीय समाज में नारी समाज के यथार्थ को बदल दिया है। पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित नारी स्वयं वंदनीय न मानकर स्वयं को पुरुषों के समान बनने के लिए आंदोलनरत है। सदियों से पीडित नारी का सब्र का बांध टूट गया है। प्राचीन परंपराओं की पकड़ से बाहर आ गई है। अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो रही है। आज की शिक्षित नारी अत्याचार के विरोध में बलपूर्वक खड़ी हो रही है। आधुनिक माहौल में तमाम लड़कियां घर की देहरी लांघकर स्वावलंबी हो रही है । आधुनिक भारतीय नारी अन्याय और अत्याचार को चुपचाप नहीं सहती, बल्कि उसका प्रतिकार कर समाज  में अपने लिए अलग जगह बनाती है। आज की नारी स्वतंत्रता चाहती है। वह पुरुष की अधीनता में रहना नहीं चाहती। वह पुरे प्राणवेग के साथ जाग उठी है।
    पश्चिमीकरण से नारी की दुनिया बदल रही है । उसके सपने, उसकी इच्छाएं, आकाक्षाएं, उसके जीने और सोचने का ढंग बदल रहा है। वह अब जानने लगी है कि अपने सपनों को कैसे पूरा किया जा सकता है । अब वह अपनी तरह अपनी शर्तों पर जीना चाहती है। वर्तमान युग में शिक्षित एवं अशिक्षित नारियां अकेलेपन की शिकार होने लगी हैं। यह समस्या आधुनिक युग की देन है। नारी घर की चारदीवारी को लांघकर पुरुषों से बराबरी करने, नौकरी करने निकली है किन्तु वह अपनी लज्जा, संस्कृति, सदाचारिता को पीछे छोड़ आई है। इस नारी स्वतंत्रयुग की नारियां पश्चिमी दौड़ में दौड़ती हुई, अपनी संस्कृति की मान-मर्यादा को पीछे छोड़ती हुई कहीं अंधकारमय युग में खो न जाएं... ।
  • Lauh Kapaat Ke Pichhe
    Shravan Kumar Goswami
    60 54

    Item Code: #KGP-1971

    Availability: In stock

    हर जेल के आगे एक अभेद्य लौहकपाट होता है । इसके पीछे एक दुनिया होती है, जो हमारी अपनी ही दुनिया का हिस्सा होते हुए भी, इस दुनिया से बिलकुल स्वतन्त्र एक अलग ही दुनिया होती है । इसके अपने कायदे-कानून होते हैं । यहां जो कुछ भी होता है, उसकी खबर किसी को भी नहीं मिलनी । इसकी चिंता न तो खोजी पत्रकारों को सताती है और न हमारी सरकारों को । इसकी सुधि न तो विरोधी दल के लोग लेते हैं और न न्यायाधीश । 'लौहकपाट के पीछे" वास्तव में जो होता है, उसकी सही जानकारी इसके भीतर रहने वाले बंदियों को भी नहीं मिल पाती है ।
    इस पुस्तक के लेखक ने किसी की हत्या नहीं की थी, उसने किसी के साथ बलात्कार भी नहीं किया था, उसने कोई डकैती भी नहीं की थी और न उसने किसी सरकार का तख्ता पलटने का षड़यन्त्र ही किया था, फिर भी बिहार सरकार ने श्रवणकुमार गोस्वामी को अपने विश्वप्रसिद्ध हजारीबाग के केंद्रीय कारागृह में कुछ समय के लिए कैद रखा था । अपने कारावास के दौरान लेखक ने जेल-जीवन को अत्यन्त समीप से केवल देखा ही नहीं, बल्कि उसे भोगा भी है । अपने इन्हीं अनुभवों का जो विवरण लेखक ने इस पुस्तक में प्रस्तुत किया है, वह केवल चौकानेवाला ही नहीं, अपितु सभ्य संसार के मुँह पर एक करारा तमाचा भी है ।
    मनोविज्ञान, अपराधशास्त्र, समाजशास्त्र तथा संस्मरण के चौराहे पर खडी यह पुस्तक एक ऐसी विरल कृति है, जो लेखक के उपन्यासों के समान ही अत्यन्त प्रवाहपूर्ण एवं रोचक है ।
    'लौहकपाट के पीछे' उन सभी व्यक्तियों की आंखें खोलने वाली एक अत्यन्त उत्तेजक, उपयोगी एवं पठनीय पुस्तक है, जो 'मनुष्य और समाज' के बारे में निरन्तर सोचते हैं और मनुष्य के'कल्याणमय भविष्य' के लिए चिन्तित भी रहते हैं। 
  • Bachchon Ke Chhah Naatak (Paperback)
    Jaivardhan
    100

    Item Code: #KGP-1383

    Availability: In stock

    जयवर्धन
    जयवर्धन उपनाम। पूरा नाम जयप्रकाश सिंह (जे.पी. सिंह)। प्रतापगढ़ (उ० प्र०) ज़िले के मीरपुर गाँव में वर्ष 1960 में जन्म। अवध विश्वविद्यालय से स्नातक। 1984 में लखनऊ विश्वविद्यालय से विधि-स्नातक। लखनऊ दूरदर्शन में दो वर्षों तक आकस्मिक प्रस्तुति सहायक के रूप में कार्य। श्रीराम सेंटर, दिल्ली में एक वर्ष मंच प्रभारी। वर्ष 1988-94 तक साहित्य कला परिषद, दिल्ली में कार्यक्रम अधिकारी। भारतीय नाट्य संघ, नीपा एवं अन्य कई संस्थाओं के सदस्य व सांस्कृतिक सलाहकार।
    रंगमंच में विशेष रुचि। अभिनव नाट्य मंडल, बहराइच (उ० प्र०) और रंगभूमि, दिल्ली के संस्थापक। कभी दर्पण, दिल्ली के सक्रिय सदस्य। लगभग 40 नाटकों में अभिनय। 20 नाटकों का निर्देशन तथा 70 नाटकों की प्रकाश परिकल्पना।
    कविता, गीत, एकांकी, नाटक, आलेख, समीक्षा, नुक्कड़ नाटक एवं सीरियल आदि का लेखन।
    प्रमुख पूर्णकालिक नाटक: ‘मस्तमौला’, ‘हाय! हैंडसम’, ‘अर्जेंट मीटिंग’, ‘मायाराम की माया’, ‘मध्यांतर’, ‘अंततः’, ‘कविता का अंत’, ‘झाँसी की रानी’, ‘कर्मेव धर्मः’ (नौटंकी)।
    बाल नाटक: ‘जंगल में मंगल’, ‘घोंघा बसंत’, ‘चंगू-मंगू’, ‘हम बड़े काम की चीज़’।
    संप्रति: साहित्य कला परिषद, दिल्ली में सहायक सचिव (नाटक) के पद पर कार्यरत। 

  • Anuvaad Vigyan : Siddhant Evam Pravidhi
    Bholanath Tiwari
    480 432

    Item Code: #KGP-539

    Availability: In stock

    अनुवाद विज्ञान : सिद्धांत एवं प्रविधि
    लंबे समय से अनुवाद पर एक ऐसी प्रामाणिक पुस्तक की कमी महसूस की जा रही थी जो सभी प्रकार के पाट्यक्रमों की ज़रूरत को तो पूरा करती ही हो, साथ ही शोधार्थियों, अनुवाद के शिक्षकों, प्राध्यापकों के लिए उपयोगी होने के साथ-साथ अनुवाद कार्य से जुडे अनुवादकों तया अनुवाद व्यवसाय से जुड़े सभी व्यक्तियों के लिए उपयोगी हो ।
    इस पुस्तक में अनुवाद विद्वान की समस्त प्रविधियों व सिद्धांतों का विवेचन-विशलेषण भी किया गया है तथा जुत्ताई, 2008 तक अनुवाद के क्षेत्र से हुए चिंतन एव शोधों को समाहित करते हुए इस अनुवाद पर अद्यतन एवं प्रामाणिक पुस्तक के रूप में तैयार किया गया है । इसलिए इसका पुराना नाम 'अनुवाद विज्ञान' न रखकर इसे अनुवाद विज्ञान : सिंद्धांत एवं प्रविधि' नाम दिया गया है, क्योंकि  यह पुस्तक नवीनतम उदभावनाओं व विचारों से युक्त है तथा  मेरे 30 वर्षों से भी अधिक के अनुवाद के अनुभवों को समेटे हुए है । मुझे विश्वास है कि यह पुस्तक अपने उद्देश्य में अवश्य ही सफल होगी तथा विद्यार्थियों, प्राध्यापकों, अनुवादकों व अनुवाद के गंभीर अध्येताओं के लिए भी समान रूप से उपादेय सिद्ध होगी ।
  • Yoon Banee Mahabharat (Paperback)
    Pratap Sehgal
    60

    Item Code: #KGP-1417

    Availability: In stock

    प्रताप सहगल
    कवि, नाटककार, कथाकार, आलोचक
    जन्म : 10 मई, 1945, झंग, पश्चिमी पंजाब (अब पाकिस्तान में)
    प्रकाशित रचनाएँ 
    कविता-संग्रह : 'सवाल अब भी मौजूद है', 'आदिम आग', 'अँधेरे में देखना', 'इस तरह से', 'नचिकेतास ओडिसी', 'छवियाँ और छवियाँ' 
    नाटक : 'अन्वेषक',  'चार रूपांत',  'रंग बसंती', 'मौत क्यों रात- भर नहीं आती', 'नौ लघु नाटक', 'नहीं कोई अंत', 'अपनी-अपनी भूमिका', 'पाँच रंग नाटक', 
    तथा 'छू मंतर' और 'दस बाल नाटक'
    उपन्यास : 'अनहद नाद', 'प्रियकांत' 
    कहानी-संग्रह : 'अब तक', 'मछली-मछली  कितना पानी'
    आलोचना : 'रंग चिंतन', 'समय के निशान', 'समय के सवाल', 
    विविध : 'अंशतः' (चुनिंदा रचनाओं का संग्रह)
    सम्मान एवं पुरस्कार : ० मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार ० 'रंग बसंती' पर साहित्य कला परिषद द्वारा सर्वश्रेष्ठ नाट्यालेख पुरस्कार ० 'अपनी-अपनी भूमिका' शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत  ० 'आदिम आग' व 'अनहद नाद' हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा पुरस्कृत ० सौहार्द सम्मान, उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ ० राजभाषा सम्मान, भारत सरकार ० साहित्यकार सम्मान, हिंदी अकादमी, दिल्ली और अन्य पुरस्कार । 
    संपर्क : एफ- 101, राजौरी गार्डन, नई दिल्ली- 110027
    फोन : 25100565, मो० : 9910638563
    ई-मेल : partapsehgal@gmail.com 

  • Panchtantra Ke Natak (Paperback)
    Shri Prasad
    50

    Item Code: #KGP-1363

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Vijendra (Paperback)
    Vijendra
    120

    Item Code: #KGP-7022

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Vijay Dan Detha (Paperback)
    Vijaydan Detha
    90

    Item Code: #KGP-7012

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : विजयदान देथा
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार विजयदान देथा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'लजवन्ती', 'दूजौ कबीर', 'फितरती चोर', 'बडा कौन', 'दूरि, 'सिकन्दर और कौआ', 'राजीनामा', रैनादे का रूसना', 'अनेकों हिटलर' तथा 'हाथी-कांड' । 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक विजयदान देथा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Chitra Mudgal
    Chitra Mudgal
    240 216

    Item Code: #KGP-619

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार चित्रा मुद्गल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'गेंद', 'लेन', 'जिनावर', 'जगदंबा बाबू गांव आ रहे हैं', 'भूख', 'प्रेतयोनि', 'बलि', 'दशरथ का वनवास', 'केंचुल' तथा 'बाघ'  ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक चित्रा मुद्गल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Jangal Juhi
    Ramesh Chandra Shah
    320 288

    Item Code: #KGP-443

    Availability: In stock

    रमेशचन्द्र शाह के डायरी-लेखन की पहली कृति 'अकेला मेला' में सन् 1981 से 1985 तक की प्रविष्टियाँ शामिल थी तो दूसरी कृति 'इस खिड़की से' 1986 से 2004 तक की डायरी को समाहित किए हुए थी। तीसरी 'आज और अभी' का फलक 2004 से 2009 तक पाँच वर्षों को अंतः प्रक्रियाओं को समेटे हुए है और, अब यह चौथी डायरी 'जंगल जुही' अद्यावधि और 'अद्यतन' को। इस डायरी में लेखक ने अपने प्राग और हैदराबाद प्रवास के अत्यंत रोचक और मूल्यवान् यात्रानुभवों को भी सहज ही स्वत:स्फूर्त ढंग से पिरो दिया है, जिनसे-पाठक पाएँगे कि-उनके अपने ही जिये और भोगे हुए में एक नया और अप्रत्याशित आयाम आ जुड़ा है।
    जैसा कि एक सुधी समालोचक का मंतव्य है-"एक ही विधा में अनेक विधाओं का कायंतरण और अर्थांतस्या कैसे होता है, यह रमेशचन्द्र शाह की डायरियों को पढ़कर जाना जा सकता हैं।" यह भी कि-"एक सर्जक अपनी निर्विकार चेतना में कितना बहुविध हो जाता हैं। शाह की डायरी केवल तिथिक्रम में घटित जीवन-लीलाओं का बयान नहीं है, बल्कि भाव-विपुल सौंदर्य और अनुभूतियों में निहित मर्म का उदघाटन है। यहाँ दर्शन है-साहित्य की तरह; साहित्य है संस्मरणों की समृद्धि की तरह; संस्मरण है-जीवन के धड़कते हर पल की तरह डायरियाँ अनुभवों की जीवंत गाथाओं के समान होती हैँ।
    वे कल्पना-प्रसूत कविता-कहानी न होकर भी अगर उन्हीं की तरह आंदोलित और आनंदित करती है तो मानना पड़ेगा कि डायरी-लेखक एक कल्पनाशील-विचारशील व्यक्ति के साथ भाषा- शिल्पज्ञ भी है।" शाह की डायरियाँ अर्थान्वेषण की गंभीरता के साथ-साथ आलोचनात्मक अंतर्दूष्टि, 'विट' और 'ह्यूमर' से भी परिपूर्ण होती हैं। पाठक देख सकते हैं कि उनकी काल-चेतना कितनी प्रखर, प्रबुद्ध और संवेदनशील है।
    रमेशचन्द्र शाह की डायरी एक और रसिक मर्मज्ञ के शब्दों मे-"महज डायरी नहीं है; इसमें सही  में साहित्य का वैश्वीकरण हो गया है, जिसने मनुष्य की बनाई सारी सरहदों को तोड़कर सारी धरती को अपना घर-कूटुंब मान लिया है।' कुल मिलाकर शाह का डायरी-लेखन देश-काल की हदों को लाँघ  हमें उस लेकि में ले जाता है जहाँ हम खुद को सच के आईने के सामने खड़ा पाते है, जहाँ अपने से बचना मुरिकल ही नहीं, नामुमकिन होता है।
  • Jangal Ke Jeev-Jantu (Paperback)
    Ramesh Bedi
    200

    Item Code: #KGP-178

    Availability: In stock

    अधिकांश जीवो की जानकारी देते हुए लेखक ने वन्य-जीवन के अपने अनुभवों का ही सहारा लिया है। पुस्तक को पढ़ते समय जंगल के रहस्य परत दर परत खुलते चले जाते हैं। जंगल के रहस्य-रोमांच का ऐसा जीवंत वर्णन इस पुस्तक में किया गया है कि जंगल की दुनिया का चित्र आंखों के सामने साकार हो जाता है। 
    जंगली जीवांे के बारे में लोक-मानस में प्रचलित कई अंधविश्वासों और धारणाओं का उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर खंडन कर सही तस्वीकर पाठकों के सामने रखी है। जंगल में स्वतंत्र रूप से विचरते जन्तुओं के जीवन पर आधारित यह पुस्तक पाठक को आद्योपांत अपनी विषय-वस्तु में रमाए रखती है। यह हमं वनों, वन्य-जीवों और पर्यावरण को संरक्षण प्रदान करने की प्रेरणा देती है।
  • Mere Chuninda Geet
    Bharat Bhushan
    295 266

    Item Code: #KGP-188

    Availability: In stock


  • Akasmaat Kuchh Kavitayen (Paperback)
    Surendra Pant
    160

    Item Code: #KGP-7216

    Availability: In stock

    हिंदी कवियों ने अपने काव्य-मुहावरों को यदि रसिकतापूर्ण काव्यरूपों से श्रृंगारित किया है तो कुछ कवियों ने कविताओं को चीखने की स्वतंत्रता भी दी है। मगर इस संगह की कविताओं में पाठक पाएंगे कि कवि का सरोकार बृहत्तर मानवता की उपस्थिति करने में कई बार वह संप्रेषणीयता की रूप-सज्जा की भी परवाह नहीं करता। व्यापक जनहितों की आकांक्षाओं के बीच से अंकुरित इन कविताओं को सच्चे ईश्वर, खरे अध्यात्म तथा खनकदार वर्तमान की चाहत है, जो भोले-भाले लोक को उसकी निष्कपटता लौटा सके। ‘मदर टेरेसा’ पर केंद्रित कविता को पढ़कर हमें कवि की मानवगत अवधारणाओं का समूचा अहसास होता है।
    पुलिस विभाग के अत्यंत महत्वपूर्ण एवं ‘संवेदनशील’ पद का निर्वहन करते हुए यह कवि समाज और राजनीति की ‘रणनीति’ में लाखों-लाख हंसते-रोते हैवानों-इंसानों के परम-चरम अनुभवों का साक्षी रहा है, इसीलिए ये कविताएं हमारे समय और समाज की धाराओं-उपधाराओं के रूप में कवि के सामने ‘पेशी’ पाकर शब्दांकित होती हैं। संभवतः इस अनुभवबहुलता ने कवि को किसी इकहरे विषय का मर्मज्ञ न रहने देकर, सर्वत्र का प्रवक्ता कवि भी बना दिया है। यह भी उल्लेखनीय है कि इस विविधता के बावजूद कवि का ध्यान अपने देश, संस्कृति और जन पर लगभग प्रत्येक कविता मंे कंेद्रीकृत हुआ है।
    कहना न होगा कि इन कविताओं के नए तेवर का आगमन भले ही अकस्मात् रूप में हुआ है, मगर निश्चित ही इनका सृजन गहरी विचारशीलता के बाद ही संभव हुआ होगा।
  • Computer Yaani Masheeni Dimaag
    Shuk Deo Prasad
    125

    Item Code: #KGP-1159

    Availability: In stock

    कम्प्यूटर यानी एक मशीन —'मशीनी दिमाग' (Electronic brain) , जिसके अंदर बिछा होता है अनगिनत तारों का मायाजाल। 
  • Jan, Samaaj Aur Sanskriti
    Vishnu Prabhakar
    35 32

    Item Code: #KGP-9141

    Availability: In stock

    वे कुछ भी क्यों न हों पर उनमें से अधिकांश के पीछे एक समान दृष्टि है । वह दृष्टि परंपरा को नकारती नहीं, बल्कि उसके मध्य से भावात्मक एकता की कल्पना की एकता-मूलक संस्कृति को समझने-पहचानने की कोशिश करती है । वह दृष्टि धर्म, समाज, संस्कृति और संप्रदाय के मोहातीत सही अर्थ जानने को भी व्यग्र है । उसमें न पूर्वाग्रह है, न विद्वत्ता का उदघोष, बल्कि जो उपलब्ध है, उसकी सहायता से खोज की, निरंतर खोज की छह है । इससे अधिक का दावा किया भी नहीं जा सकता क्योंकि सर्जक के सामने मंजिल होती ही नहीं, तलाश होती है । 
    तलाशो तलब में वह लज्जत मिली है 
    दुआ कर रहा हूँ की मंज़िल न आवे । 
  • Surakshit Pankhon Ki Uraan
    Alka Sinha
    100 90

    Item Code: #KGP-9294

    Availability: In stock

    बारूदी गंध और धुएं से स्याह आज के आकाश पर हवाई आतंक के मनहूस बादल निरंतर मंडरा रहे हैं। हर पिछली भयावह घटना को छोअी बनाती अगली घटना अपने को बड़ा सिद्ध कर रही है। 13 दिसंबर, 2001 को भारतीय ससंद पर हुए आतंकवादी हमले से देश की संप्रभुता को तो आघात पहुंचा ही है, सुरक्षा का मनोविज्ञान भी घायल हुआ है। आतंवाद की भयावहता शांति और सुरक्षा के प्रति राष्ट्र को आशंकित कर रही है, तो 11 सितंबर, 2001 को न्यूयार्क के वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हुआ हवाई हमला आतंकवाद को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप दे रहा है और हवाई आतंक के प्रति समूची धरती और आकाश के माथे पर चिंता और विषाद की लकीरें गहरा गई हैं। आज का समय बच्चे-बच्चे से सुरक्षा के प्रति जागरूक होने की मांग करता है दरवाजे खुले छोड़कर सोने का समय बहुत पीछे छूट गया। अब तो बंद दरवाजों में भी व्यक्ति खुद को असुरक्षित महसूस करता है। सुबह घर से निकला आदमी शाम को सकुशल लौट भी आएगा, कह पाना कठिन है। फिर भी जिंदगी चलती रहती है और चलते रहते हैं जिंदगी के कामकाज। सर्दी-खांदी की तरह भय और आतंक भी जिंदगी का हिस्सा बन गए हैं। ऐसी सूरत में कहानी का उद्देश्य किस्सागोई अथवा मनोरंजन कतई नहीं है। वे जमाने लद गए जब दादी-नानी के पेट से सटकर राजा-रानी की कहानियां सुनते-सुनते नींद आ जाती थी और सपनों में उड़ने वाला घोड़ा लेकर उतर आता था कोई राजकुमार।
    —अलका सिन्हा 
  • The Luck Of The Jews (Paperback)
    Michael Benanav
    395

    Item Code: #KGP-323

    Availability: In stock

    Over the course of ten years, writer and photographer Michael Benanav, investigated the extraordinary circumstances that enabled his father’s parents to survive the horrors of the Holocaust in Eastern Europe while most of their family and neighbors perished around them. From their story, he’s crafted an accomplished piece of literature, history, and thought, exploring both the events his grandparents lived through and his own struggles to find meaning in them. It’s a work of devastating emotional intensity that traces his own roots back to the terrible tragedy and incredible good fortune that together are THE LUCK OF THE JEWS.
  • Sangharsha-Meemaansa
    Ravi Sharma
    125 113

    Item Code: #KGP-9083

    Availability: In stock


  • Samkalin Sahitya Samachar July, 2017
    Sushil Sidharth
    0

    Item Code: #July, 2017

    Availability: In stock

  • Guru-Dakshina
    Sanjiv Jaiswal
    300 270

    Item Code: #KGP-784

    Availability: In stock

    गुरु-दक्षिणा
    "सर, आप चाहते थे कि मैं केवल दो रातों के लिए आपके पास आ जाऊं लेकिन आपका बेटा पूरी जिंदगी के लिए मुझे यहाँ लाना चाहता है," दीपा ने एक-एक  शब्द पर जोर देते हुए कहा ।
    सड़ाक...सड़ाक...सड़ाक...जैसे नंगी पीठ पर चाबुक पड़ रहे हों। प्रो. कुमार का सर्वांग कांप उठा। उन्होंने कभी स्वप्न में भी ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं की थी।  दीपा ने एक झटके में उनके चेहरे का नकाब नोच डाला था। अपने बेटे के सामने ही उन्हें नंगा कर दिया था। उनका चेहरा सफेद पड़ गया। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने सारा रक्त चूस लिया है।
    अवाक तो प्रकाश भी रह गया था। चंद क्षणों तक तो उसकी समझ में ही नहीं आया कि क्या करें। फिर उसने दीपा की बाहों को पकड़ झिंझोड़ते हुए कहा, "दीपा, तुम होश में तो हो। तुम्हें मालूम है कि तुम क्या कह रही हो?"
    "अच्छी तरह मालूम है लेकिन शायद तुम्हें नहीं मालूम कि तुम्हारे डैडी रिसर्च पूरी कराने के लिए मुझसे क्या गुरु-दक्षिणा मांग रहे थे । यदि सत्य उजागर किए बिना मैं तुमसे शादी कर लेती तब तुम्हारे डैडी जिंदगी भर मुझसे आंखें न मिला पाते । वे भले ही गुरु का धर्म भूल गए हों लेकिन मैं शिष्या का धर्म नहीं भूली हूँ। इसलिए अपनी बहू के सामने आजीवन जलील होने की जलालत से मैं उन्हें मुक्ति देती हूँ। यही मेरी गुरु-दक्षिणा होगी ।"

    -इसी संग्रह से
  • Kavi Ne Kaha : Neelesh Raghuvanshi
    Nilesh Raghuvanshi
    240 216

    Item Code: #KGP-7816

    Availability: In stock

    किसी कवि का कथन है कि कविता हमारे चारों ओर चीज़ों, घटनाओं, गतियों, स्थितियों, ध्वनियों, आहटों और अंतरालों में हर समय मौजूद होती है, वह हमारे आसपास तैरती रहती है और एक समर्थ कवि उसे पहचानकर एक परिचित शक्ल दे देता है। नीलेश रघुवंशी अपने दौर के पुरुष और महिला कवियों से इस रूप में अलग हैं कि उनके लिए कविता हमारे सामान्य निम्नमध्यवर्गीय जीवन से अलग, विभिन्न या उससे उच्चतर काम नहीं है बल्कि वह उसी जीवन के भीतर घटित होती है। उनकी कविता अपने समय के भौतिक और मानसिक द्वंद्वों को अनदेखा करके अभिव्यक्ति का कोई अपरिचित लोक नहीं रचती। वह जीवन को जारी रखने वाले कामों का निषेध नहीं करती बल्कि उन्हीं कामों में से अपने को उत्पन्न करती रहती है।
    --मंगलेश डबराल

    जीने की उष्मा और ललक से भरी ये कविताएँ समकालीन कविता में नीलेश की नई पहचान को रेखांकित करती हैं। ‘पहली रुलाई तक की डायरी’ जैविक स्त्री-बोध का क्रमिक दस्तावेज है, जो शायद हिंदी में पहली बार इतनी प्रामाणिकता के साथ दर्ज हुआ है। इस काव्यात्मक डायरी को जो बात सबसे अधिक  विश्वसनीय बनाती है, वह अजन्मे शिशु के साथ माँ की वह चुहल है, जो प्रायः इसके हर टुकड़े में मिल जाएगी। ‘जन्म देना एक यातना से गुजरना है’--इस पंक्ति को लिखने वाली यह कवयित्री ही यह क्रीड़ाभरी पंक्ति भी लिख सकती है--‘मैं लिख रही हूँ डायरी और तुम बंदर बने हुए हो--तुमने तो मेरे पेट को खेल का मैदान बना रखा है।’ जन्म देने के सर्जनात्मक उल्लास से भरी ये कविताएँ समकालीन कविता में कुछ नया जोड़ती हैं।    
    --केदारनाथ सिंह


  • Chaar Lambi Kahaniyan
    Aruna Sitesh
    200 180

    Item Code: #KGP-9156

    Availability: In stock

    इस संग्रह में प्रस्तुत हैं डॉ. अरुणा सीतेश की चार बहुचर्चित कहानियां, जो धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, सारिका आदि में लंबी कहानी अथवा लघु उपन्यास के रूप में प्रकाशित एवं प्रशंसित होकर उनके विभिन्न संग्रहों में सम्मिलित हैं । 
  • Kokh
    Roshan Premyogi
    300 255

    Item Code: #KGP-287

    Availability: In stock

    कोख
    सन् 1984 से एक किशोरी एक राजा की हवश का शिकार बनती है । उसकी कोख से जन्मे बच्चे के मन से करीब 25 साल बाद अपने सांवले रंग और नयन-नक्श को लेकर संदेह पैदा होता है । सदेह पुख्ता होता है तो वह पिता से लड़ता है अपनी माँ के लिए ।
    उपन्यास में तीन महिला पात्र हैं । इनमें मधुरिमा सिंह ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया । वह पहले मुझे सौतेली मां की तरह लगी, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती  गई, वह धरती की तरह धैर्यवान और समुद्र की तरह गरमाहट से भरपूर मां लगी । आई.ए.एस. प्रभुनाथ सिंह  पहले खलनायक लगते हैं, लेकिन जब कहानी खुलती है तो तमाम पूर्वाग्रह ध्वस्त हो जाते है । शैलजा तो बहुत ही प्यारी और समझदार लड़की है, वह सीमान्त को बिखरने से बचाती है । दरअसल शैलजा खंड-खंड होकर नष्ट होने को तत्पर कुछ लोगों को फिर से एक परिवार बनने के लिए प्रेरित करती है । देखा जाए तो अपने व्यक्तित्व से शैलजा ही इस उपन्यास को बडा बनाती है । उसके प्यार को थोड़ा और स्पेस मिलना चाहिए था ।
    गायत्री देवी का संघर्ष और दंश मन को झकझोर देता है । कहानी अंत तक बांधे रखती है मन को, लेकिन यह थोड़ा अजीब लगता है कि गायत्री देवी के दंश को लेखक ने बेटे के प्यार और नैतिकता के बोझ तले दबा दिया, वैसे यह पुरुषप्रधान समाज की रीति है ।
  • Dil Ko Mala Kare Hai
    Vishnu Chandra Sharma
    80 72

    Item Code: #KGP-2007

    Availability: In stock

    दिल को मला करें है
    हिंदी  बहुत कम लेखकों ने जीवन के रग-रेशे को इतना करीब से बनते-बनाते, बिगड़ते-सँवरते देखा है, जैसा कि विष्णुचन्द्र शर्मा ने । प्रस्तुत उपन्यास आदि से अंत तक मनुष्य  जीवन-संघर्ष की गाथा है, जिसमें दुख  सुख है, राग है, विराग है, हर्ष है, विषाद है । जीवन  तमाम उतार-चढाव अपनी संपूर्णता में व्यक्त हुए है ।
    'दिल को मला की है' स्मृति-आख्यान है। लेखक ने अपनी पत्नी के अवसान के बाद कलम-कागज से जुगलबंदी की, जिसका सुफल है यह औपन्यासिक कृति । पली की मृत्यु के बाद घर-आँगन, रसोई-बगीचा कैसे बिखरता है, दरो-दीवार कैसे टूटती है, बिलखती है ! उपन्यास का कथाक्रम ठीक मनुष्य के जीवन की तरह है । किसी आत्मीय जन का हँसते-बतियाते 'टुक' चुप हो जाना या ऐसी यात्रा पर निकल जाना, जहाँ से वापसी संभव नहीं, निस्संदेह शोक का कारण बनता है लेकिन बकौल उपन्यासकार इसी शोक से जीवन का राग फूटता है ।
    पत्नी की स्मृतियों को खँगालते तथा डरो-दिवार में उसकी तलाश करने के क्रम में ढेरों पात्रों की जीवंत  उपस्थिति उपन्यास की रोचकता बढाती है । सरि पात्र जस के तस ।  बिना किसी शाब्दिक बुनावट के। मनुष्य मात्र मनुष्य होता है देवता या राक्षस नहीं। जिजीविषा ही उसकी पहचान है । काल भैरव, सादतपुर से लेकर यूरोप तक स्थितियाँ तथा विडंबनाएँ एक हैं, पर कोई भी पात्र निराश या हतोत्साहित नहीं दिखता ।
  • Naani
    Dronvir Kohli
    350 315

    Item Code: #KGP-522

    Availability: In stock


  • Naaz
    Inaytullah
    80 72

    Item Code: #KGP-2098

    Availability: In stock


  • Moh-Bandh
    Indu Rashmi
    50 45

    Item Code: #KGP-9066

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Vishnu Prabhakar
    Vishnu Prabhakar
    160 144

    Item Code: #KGP-13

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार विष्णु प्रभाकर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'बँटवारा', 'क्रान्तिकारी', 'पर्वत से भी ऊँचा', 'ठेका', 'पिचका हुआ केला और क्रान्ति', 'चितकबरी बिल्ली', 'एक मौत समन्दर किनारे', 'एक और कुन्ती', 'पैड़ियों पर उठते पदचाप' तथा 'पाषाणी'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार विष्णु प्रभाकर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Door Van Mein Nikat Man Mein
    Ajit Kumar
    360 324

    Item Code: #KGP-868

    Availability: In stock

    दूर वन में निकट मन में
    मनुष्य एक-दूसरे को सुख-दुःख देते किन नातों के जाल में बँधते-जुड़ते रहते हैं? उनके संबंधों की आधारभूमि क्या है? एक-दूसरे के सारे मीठे-कड़वे अनुभव कालांतर में एक भाव, एक स्मृति, एक टीस बनकर रह जाते हैं! उस भाव का महत्त्व क्या है?
    ‘दूर वन में’ अजितकुमार द्वारा रचित कुछ प्रसिद्ध व्यक्तियों के संस्मरणों का संग्रह है। इसमें कुछ प्रसिद्ध-अप्रसिद्ध विशेषकर ऐसे लोग हैं जो अब भूले से जा रहे हैं, पर अपने ज़माने के विशिष्ट व्यक्तित्व रहे हैं। अधिकांश संस्मरण पारिवारिक दायरे में आने वाले लोगों के हैं। 
    ‘निकट मन में’ भी अजितकुमार के संस्मरणों का संग्रह है।  इन पुस्तकों के शीर्षकों में तुक तो अनायास मिल गया है, उनकी तान, लय और समझ में भी पाठकगण उस निरंतरता का, तारतम्य का आभास पाएँगे, जो अजितकुमार की कविता और गद्य-रचना का स्वाभाविक गुण है।
    संस्मरणों के माध्यम से अजितकुमार अतीत को नहीं पगुराते, हिसाब-किताब भी बराबर नहीं करते, वे अनुभव तथा संवेदना का पथ प्रशस्त करते हैं। इस नाते, ये संस्मरण जितने उनके हैं, लगभग उतने ही या उससे भी अधिक औरों के अपने हो सकेंगे।
    अजितकुमार के संस्मरणों की ये दो पुस्तकें एक ही जिल्द में प्रस्तुत हैं। प्रसिद्ध कवि अजितकुमार एक समर्थ और सशक्त गद्यकार भी हैं। इनके गद्य की ताकत का नमूना तो ये संस्मरण हैं ही, उनके संवेदनशील, सजग, जागरूक व्यक्तित्व का भी परिचय देते हैं।
  • Himalaya Gaatha-1 (Dev Parampara)
    Sudarshan Vashishath
    450 405

    Item Code: #KGP-166

    Availability: In stock

    हिमालय गाथा-1 (देव परंपरा)
    महापंडित राहुल सांकृत्यायन के बाद संस्कृति पर लेखन और यात्रा-वृत्तांत जैसे साहित्य की धीरे-धीरे कमी होती गई । बहुत ही कम ऐसे साहित्यकार रहे, जिन्होंने आसपास की संस्कृति पर कलम चलाई । ऐसे बिरले साहित्यकारों में सुदर्शन वशिष्ठ एक ऐसा नाम है, जिसने सशक्त कथाकार और कवि होने के साथ-साथ संस्कृति-लेखन में भी बराबर पैठ बनाए रखी। आठवें दशक के आरंभ से लेकर इनके सांस्कृतिक लेख सामने आते रहे । 'धर्मयुग', 'साप्ताहिक हिंदुस्तान', 'कादम्बिनी', 'संस्कृति', 'योजना' जैसी पत्रिकाओं तथा सभी समाचार-पत्रों के सांस्कृतिक पृष्ठों में ये बराबर लिखते रहे। कुल्लू के मलाणा गणतंत्र को यही सबसे पहले सामने लाए । 'धर्मयुग' के फागुन अंक में 'फागुन में मलाणा' लेख छपा ।
    ‘आँखिन देखी' और उसका कथात्मक शैली में वर्णन वशिष्ठ के संस्कृति-लेखन की विशिष्टता रही है । पढ़ते हुए ऐसा लगता है, आप यह उत्सव स्वयं देख रहे हैं । सरल और स्पष्ट भाषा से रोचकता के साथ संस्कृति के गंभीर पहलुओं का विश्लेषण, उनकी वैज्ञानिक व्याख्या, पुरातन को आधुनिकता के साथ जोड़ना इनकी लेखनी की विशेषता रही है ।  संस्कृति का कोई ऐसा पहलू अछूता नहीं रहा है, जिस पर वशिष्ठ ने लेखनी न चलाई हो। इतिहास और परंपरा, धर्म और संस्कृति, मंदिर और पुरातत्त्व, मेले और उत्सव, लोक-परंपरा और लोक-वार्ता कोई पक्ष ऐसा नहीं है, जो अछूता रहा हो । लेखक की यायावर प्रवृत्ति ने हिमाचल के दूरस्थ क्षेत्रों की यात्राएँ की ।
    यदि इनके अभी तक प्रकाशित हजारों लेखों और दर्जनों पुस्तकों को देखा जाए तो इन्हें दूसरा राहुल कहा जा सकता है । राहुल जी ने बहुत जगह पूरे के पूरे गजेटियर उतार डाले । वशिष्ठ ने ऐसा नहीं किया । इन्होंने संस्कृति को बहुत करीब से देखा । जो देखा, वह लिखा । संस्कृति को निष्पक्ष नजरिए से देखा, परखा, समझा है और फिर लेखनीबद्ध किया है । आशा है, यह संस्कृति श्रृंखला पाठकों, शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी सिद्ध होगी ।
  • Anuvaad Aur Bhaashik Sanskriti Hindi Ke Prayojanparak Sandarbh
    Rita Rani Paliwal
    325 293

    Item Code: #KGP-528

    Availability: In stock

    हिंदी लंबे समय से अनुवाद कर्म करने के बावजूद हम अनुवाद को भाषायी गतिविधियों से सकारात्मक और सर्जनात्मक ढंग से जोड़ने में बहुत सफल नहीं हो पाए हैं। अनुवाद के माध्यम से हिंदी को अभिव्यक्ति की सहजता से, उसकी बोलियों की अपनी कमाई हुई शब्दावली और भंगिमाओं से, जीवन संदर्भों की निकटता से जोड़ते हुए भाषायी पैनेपन को निखार नहीं पाए हैं।
    भूमंडलीकरण के दौर में दुनिया भर की भाषाओं के लिए कई तरह की चुनौतियां हैं। हिंदी को उन चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए अपनी भाषिक संस्कृति को न केवल पहचानना होगा बल्कि उस भाषिक सांस्कृतिक परिवेश को कायम रखने का हर प्रयास करना होगा, जिसमें हिंदी भाषी समाज का सामूहिक अवचेतन और जातीय स्मृति संचित है; साथ ही जिसमें हिंदी भाषी समाज की मौजूदा और भावी पीढ़ियों की आशाएं, आकांक्षाएं अपना विस्तार और प्रसार पाती हैं और पाएंगी। भाषायी अस्मिता केवल बोलचाल, घरेलू व्यवहार, मनोरंजन से संचित और समृद्ध नहीं होती। उसके लिए उच्चकोटि के सर्जनात्मक साहित्य और साहित्य-विमर्श के साथ-साथ आवश्यक होती है उस भाषा में ज्ञान-संपदा की, दैनंदिन जीवन के बड़े से बड़े कार्यकलाप के संचालन, प्रयोजन और चिंतन की निरंतर और सिलसिलेवार मौजूदगी।
    प्रस्तुत पुस्तक हिंदी भाषा-संस्कृति के इन्हीं व्यापक सरोकारों से संबंधित है।
  • Naamdev Rachanavali
    Govind Rajnish
    240 204

    Item Code: #KGP-146

    Availability: In stock

    नामदेव रचनावली
    नामदेव ऐसे समर्थ और प्रतिभाशाली रचनाकार थे, जिन्होंने मराठी और हिंदी में समान रूप से रचनाएँ कीं। वे 54 वर्षों तक उत्तर भारत में रहे और हिंदी-संत-काव्य के लिए प्रेरक सिद्ध हुए। उनकी पद-शैली, भाव-बोध, दार्शनिक विचारों, बिम्बों, प्रतीकों और उपमानों का प्रभाव हिंदी के निर्मुणपंथी कवियों पर पडा ।
    स्वानुमूतिजन्य सत्यान्वेषण, सदगुरु के महत्त्व का प्रतिपादन, परम तत्त्व की सर्वव्यापकता, तन्मयमूलक भक्ति, नाम-स्मरण, कर्मकांड और पाखंडों का निषेध, आंतरिक शुचिता पर बल, बाह्याडंबरों की व्यर्थता और विषमता-विरोध ऐसे तत्त्व हैं, जो परवर्ती संत कवियों के काव्य में समान रूप से पाए जाते हैँ। इसीलिए समकालीन एवं परवर्ती संत कवियों ने उनका स्मरण श्रद्धा के साथ किया है।
  • Debt-Free Forever (Personal Finance)
    Gail Vax-Oxlade
    495 446

    Item Code: #KGP-9015

    Availability: In stock

    TIRED OF GETTING TO THE END OF THE MONEY BEFORE YOU GET TO THE END OF THE MONTH? WISH YOU WERE IN CONTROL?
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    ~ prepare for a rainy day so it doesn’t mean a major setback
    ~ set goals for your new, debt-free life
    Make no mistake, getting out of debt isn’t easy. But in Debt-Free Forever, Gail gives you a clear strategy and the steps needed to implement it. So if you’re finished with excuses, overdue notices, and maxed-out credit cards, pick up this book, follow Gail’s plan, and start becoming Debt-Free Forever.
  • Kavi Ne Kaha : Leela Dhar Jaguri (Paperback)
    Leeladhar Jaguri
    80

    Item Code: #KGP-1442

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: लीलाधर जगूड़ी
    अपनी कविताओं का चुनना आज़ादी है और आज़ादी का पहला लक्षण है चुनाव की स्वतंत्रता जो कि लिखने की स्वतंत्रता से कतई कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। कोई अपने लिए क्या और क्यों चुनता है, इसके सामाजिक और व्यक्तिगत कारण हो सकते हैं लेकिन अपने में से अपने को चुनने के लिए ज्ञानात्मक समीक्षा दृष्टि और संयम आवश्यक है जिसका अभाव इस मौके पर भी मुझे काफी परेशान किए रहा। क्या अपनी ये चुनी हुई कविताएँ ही मेरा सम्यक् अभीष्ट हैं? शायद हाँ, शायद नहीं। क्योंकि इस चयन को इस चयन में से अभी पाठकों द्वारा भी चुना जाना है। चुने हुए में से चुनना और बढ़िया विचारपरक हो सकेगा। निर्दोष चयन तो काफी कठिन काम है फिर भी चुनने के स्वार्जित अधिकार से पैदा हुई व्याख्या का अपना स्थान है। वह स्थान तभी दिख सकता है और समझ में आ सकता है जब विवेचन दोष रहित दूषण सहित हो। इन कविताओं में कितना पैनापन है, कितनी प्रखरता है यह तभी समझा जा सकेगा जब सुकोमल और सुंदर पक्षों को उन पात्रों की घटनाओं के माध्यम से चिद्दित किया जा सके। यह अनुभव की महिमा और अनुभूति के विन्यास को खुद अपने अस्तित्व के अनुरूप कारणों से चुनवा सकेगा।
  • Lokmanya Baalgangadhar Tilak : Jeevan Darshan (Paperback)
    M.A. Sameer
    160

    Item Code: #KGP-490

    Availability: In stock

    1857 की क्रांति ने जो बयार बहाई, उसने घर-घर में मन को छुआ और अगले स्वातंत्र्य समर की—जो अनवरत था और शांत भले ही था, लेकिन थमा नहीं था—रूपरेखा बना दी। इस उत्तरार्द्ध में केवल जोशीले राष्ट्रभक्त ही नहीं हुए बल्कि बौद्धक क्रांति का बिगुल बजाने वाले लोकमान्य बालगंगाधर तिलक असाधारण चिंतक और वक्ता थे जिन्होंने अंग्रेजों की नींद उड़ा दी।
    यह पुनर्जागरण का काल था, जिसने समूचे राष्ट्र को एक सूत्र में बांध। इस काल में अनेक राष्ट्रभक्तों का योगदान रहा, जिनमें बालगंगाधर तिलक को राष्ट्रीय आंदोलन की गरम विचारधारा का प्रणेता माना गया। तिलक वह नेता थे, जिनकी अगुवाई में राष्ट्रभक्तों ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश कर दिया। यह पुस्तक ‘लोकमान्य बालगंगाधर तिलक : जीवन दर्शन’ इसी गाथा को अपने में समेटे हुए है।
  • Moldeviya Ki Lokkathayen
    Sanjiv Thakur
    175 158

    Item Code: #KGP-195

    Availability: In stock

    मोल्देविया की लोककथाएँ
    मोल्देविया (वर्तमान नाम मोलदोव (Moldova)) उक्रेन के पास एक छोटा-सा देश है। वहाँ  लोककथाओं की अच्छी-खासी परंपरा रही है। लोककथाओं के साथ-साथ वहीं लंबी-लंबी परीकथाएँ भी कही-सुनी जाती रही हैं। इस संग्रह मेँ उनमें से कुछ लोककथाएँ और परीकथाएँ प्रस्तुत की गई हैं। संग्रह में प्रस्तुत लोककथाओं में जहाँ जनजीवन से जुडी बाते है, वहीँ परीकथाओं में अदभुत कल्पनालोक दिखाई देता है । इन्हें पढ़कर मोल्देविया के सामान्य लोगों के कल्पनाशील होने का पता चलता है तो अपने समाज के यथार्थ के प्रति उनके जागरूक होने का पता भी चलता है। एक तीसरी धारा हास्य की है जो मोल्देविया के जन-मानस में बहती दिखाई देती है ।
    राजा, राजकुमारी, राजकुमार, जमींदार, पादरी, गरीब आदमी, गड़रिया, ड्रैगन, दैत्य आदि अच्छे-बुरे पात्रों के द्वारा कही गई ये कथाएँ अच्छाई, बुराई, चालाकी, दुष्टता, बुद्धिमानी, मूर्खता, शत्रुता, मित्रता जैसी चीजो से पाठकों का परिचय अनायास करवा सकती है ।
    मोल्देविया के लोक-मानस की थाह दिलाने वाली ये कथाएँ बच्चों और बडों को समान रूप से आकर्षित करने की सामर्थ्य रखती हैं ।
  • Vyangya Samay : Shrilal Shukla (Paperback)
    Shree Lal Shukla
    225

    Item Code: #KGP-7217

    Availability: In stock

    कालजयी कृति ‘राग दरबारी’ के महान् रचनाकार श्रीलाल शुक्ल युगांतरकारी व्यंग्यकार हैं। उनका व्यंग्य लेखन ‘सुबुक सुबुक वादी’ भावुकता और जड़ीभूत जीवनदृष्टि के प्रतिरोध से प्रारंभ होता है। साहित्य में ‘प्रतिभा’ क्या होती है, यह श्रीलाल शुक्ल को पढ़कर जाना जा सकता है। वे पूर्वानुमानित या राजनीति से उत्सर्जित विषयों की ओर कभी नहीं गए। उनके द्वारा रचे गए व्यंग्यों के शीर्षक ही यह बताने के लिए यथेष्ट हैं कि समाज, संस्कृति, साहित्य और साहित्य के धूसर धुंधले इलाकों से होकर वे किस तरह गुजरते हैं। क्लासिक व्यंग्य लेखन के सर्वोत्तम उदाहरण देतीं श्रीलाल शुक्ल की रचनाएं अविस्मरणीय हैं। भाषा के अनेक विस्मयकारी प्रयोग उन्होंने किए हैं। हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल और ज्ञान चतुर्वेदी व्यंग्य रचना में प्रत्युत्पन्नमति, वचनवक्रता, समासोक्ति, अन्योक्ति आदि के लिए विशेषतः उल्लेखनीय हैं। श्रीलाल शुक्ल विश्व साहित्य में व्यंग्य की परंपरा के अद्भुत ज्ञाता थे। उनके व्यंग्य विश्वस्तरीय व्यंग्य साहित्य में प्रसन्नतापूर्वक शामिल किए जा सकते हैं। मनुष्य मन के अतल में छिपी प्रवृत्तियों को उजागर करते हुए उन्होंने व्यापक सभ्यता समीक्षा की है। 
    ‘व्यंग्य समय’ में श्रीलाल शुक्ल के चयनित व्यंग्य उनके विस्तृत व्यंग्य लेखन से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। पाठकों को रचनाकार को समग्रता में पढ़ने और उन्हें पुनः पाठ के लिए प्रेरित करने का उद्देश्य भी इस उपक्रम में निहित है।
  • Gamna
    Habib Kaifi
    70 63

    Item Code: #KGP-9071

    Availability: In stock


  • Parvat-Gatha
    Hari Krishna Devsare
    425 383

    Item Code: #KGP-617

    Availability: In stock

    पर्वत गाथा
    पर्वतों और मनुष्य का रिश्ता आदिकाल से चला आ रहा है। पर्वतों पर उगने वाले वन, उनसे प्राप्त होने वाले खनिज, वनोपज आदि मनुष्य के उपयोग की वस्तुएँ रही हैं। आज भी आदिवासी और गाँवों के लोग वनोपजों से अपनी जीविका अर्जित करते हैं। पर्वतों के जंगलों से लकड़ी मिलती है। पर्वतों से देश की जलवायु अत्यधिक प्रभावित होती है। यदि भारत के उत्तर में हिमालय न होता तो मानसूनी हवाएँ सीधे मध्य तथा उत्तरी एशिया में पहुँचकर पानी बरसातीं और भारत एक रेगिस्तान बन जाता। हिमालय पर्वत सर्दियों में उत्तरी एशिया से आने वाली बेहद ठंडी हवाओं से भी भारत की रक्षा करता है।
    पर्वत मनुष्य के जीवन में विभिन्न रूपों में जुड़े रहे हैं और उनका महत्त्व आज भी है। ‘महानता’ के अर्थ में ‘पर्वत’ के अलावा कोई दूसरी उपमा नहीं दी जाती। आज मनुष्य ने पर्वतों को काटकर रास्ते बनाने में सफलता पा ली है।
    जीवन में सफलता की ऊँचाइयों की तुलना पर्वत शिखरों से की गई है। हमारे देश में अनेक गौरवशाली पर्वत हैं और उनके प्रति लोगों में अटूट आस्था है। उन पर्वतों पर लोग पूजा करते हैं, मेले लगते हैं और मन की मुराद पूरी करते हैं। भारत के ऐसे ही पूज्य, गौरवशाली, इतिहास- प्रसिद्ध और धार्मिक आस्था के प्रतीक पर्वतों की गाथा है यह पुस्तक।

  • She (Paperback)
    Dixy Gandhi
    245 221

    Item Code: #KGP-332

    Availability: In stock

    A first ever collection of stories centered around Women’s lives in Modern Times

    Society in modern times is changing very fast, and so is changing the situation and role of women in facing and dealing with them. With the expansion of education among them, they are taking things with gusto and intelligence, at times coming out with unexpected results. Their understanding is different, approach is different and what they present is also not only engrossing but also enlightening.
    It is time women wrote with themselves at the centre of happenings and here is perhaps the first such collection of exciting stories by the upcoming author Dixy Gandhi who shows great promise and quality.
  • Kavi Ne Kaha : Rajesh Joshi
    Rajesh Joshi
    190 171

    Item Code: #KGP-384

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : राजेश जोशी
    राजेश जोशी अपने अनुभव को कविता में सिरजते वक्त शोकगीत की लयात्मकता नहीं छोड़ते । लय उनकी कविताओं में अत्यंत सहज भाव से आती है जैसे कोई कुशल सरोदवादक धीमी गति में आलाप द्वारा भोपाल राग का विस्तार कर रहा हो । इस दृष्टि से राजेश जोशी के शिल्प को एक सांगीतिक संरचना कहा जा सकता है । वे स्थानीयता के रंग में डूबकर भी कविता के सार्वजनिक प्रयोजनों को रेखांकित करते हैं । उनकी कविता अपने उत्कृष्ट रूप में एक शहर की कविता होते हुए भी मनुष्य के व्यापक संकट का बयान है । -ऋतुराज़
    समकालीन हिंदी कविता में राजेश जोशी की उपस्थिति एक दिलेर उपस्थिति है-कविता लिखना और उसके लिए लड़ना भी । उनमें एक काव्य व्यक्तित्व भी है, जो कविताएं लिखने वाल कई कवियों में नहीं भी हुआ करता है । उनकी यह उपस्थिति एक लोकतांत्रिक उपस्थिति है, जहां आप ढेर सारा संवाद कर सकते हैं।
    राजेश जोशी की कविता में एक टूट-फूट और संगीत का अवसाद है, लेकिन उठ खड़े होने की कोई मूलगामी संरचना भी  है । पस्ती का महिमामंडन नहीं है और पराजय में पराजित की उधेड़बुन नहीं है । इसलिए कौन-सी भंगिमा कब प्रतिकार में बदल जाएगी और एक कॉस्मिक रुप अख्तियार कर लेगी कोई नहीं जानता । तो साधारण की, पिछडे हुए की, मिटा दिए गए की, भुला दिए गए की, विजय होगी ऐसा कोई यूटोपियाई प्रतिवाद उनमें निरंतर मिलता  है। तो नैतिक श्रेष्ठता में विश्वास कभी खंडित नहीं होता।
  • Chhor
    Bhairppa
    400 360

    Item Code: #KGP-886

    Availability: In stock

    छोर
    कुशाग्र बुद्धि अमृता ने चाची के कुचक्र की ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया और अपनी पढ़ाई-लिखाई में ही व्यस्त रही। कुछ समय उपरांत पिता भी स्वर्गवासी हुए और तब घर-परिवार तथा व्यापार पर चाची का वर्चस्व स्थापित हो गया। अमृता की संपत्ति धीरे-धीरे और भीतर ही भीतर चाची तथा उसके बच्चों की ओर खिसकने लगी। अमृता की संपत्ति पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए चाची ने अमृता को बहला-फुसलाकर उसका ब्याह अपने छोटे भाई से करा दिया।
    हालात को स्वीकार करके मजबूर अमृता एक कॉलिज में अध्यापन करने लगी और अपने दो बच्चों के साथ बागान से दूर पिता की एक पुरानी कोठी में रहने लगी। वहीं उसकी मुलाकात वास्तुकार सोमशेखर से हुई जो बंबई छोड़कर मैसूर आ गया था। दोनों धीरे-धीरे एक-दूसरे की ओर आकृष्ट होने लगे। इस बीच अमृता को चाची के कुचक्रों का भी आभास होने लगा। परिस्थितियों ने उसके स्वभाव में अजीब चिड़चिड़ापन, जीवन के प्रति अरुचि, कुंठा और विकर्षण को जन्म दिया। उसे जीवन बेमानी लगने लगा किंतु बेटों के प्रति मोह और सोमशेखर के प्रति अस्पष्ट आकर्षण उसे बार-बार आत्महत्या की कगार से लौटा लाता। अमृता की जिंदगी में जीवन और मृत्यु की ऊहापोह, उसकी कुंठा ही उसकी जिंदगी के दो छोर हैं जिनके बीच वह बार-बार झोंटे खाती रहती है।
    यह उपन्यास रोचक होने के साथ-साथ एक विशेष मनोवैज्ञानिक परिस्थितियाँ पैदा करता है। जो यथार्थ के साथ-साथ विचित्र भी हो गई हैं। यहाँ है भैरप्पा की कल्पनामय यथार्थ शैली का अद्भुत चमत्कार!
  • Kashmir : Raat Ke Baad (Paperback)
    Kamlesh Pandey
    80

    Item Code: #KGP-7027

    Availability: In stock

    कश्मीर : रात के बाद
    हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार कमलेश्वर का कश्मीर से पुराना और गहरा लगाव रहा है । 'कश्मीर : रात के बाद' में लेखक के इस पुराने और गहरे कश्मीरी लगाव को शिद्दत से महसूस किया जा सकता है । एक गल्पकार की नक्काशी, एक पत्रकार की निर्भीकता, एक चेतस इतिहास-द्रष्टा की पैनी नज़र तथा इन सबके मूल में जन सामान्य से प्रतिश्रुत मानवीय सरोकारों से लैस यह यात्रा-वृत्तांत लेखक कमलेश्वर का एक और अप्रतिम योगदान है ।
    'कशमीर : रात के बाद' संभवत: हिंदी में पहला ऐसा मानक प्रयास भी है जो कैमरा और कलम को एक साथ इस अंदाज़ से प्रस्तुत करता है ताकि दोनों की अस्मिता पूर्णतः मुक्त भी रहे । शायद इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस यात्रा-रिपोर्ताज में कश्मीर के बर्फीले तूफानों और चट्टानों के खिसकी का शाब्दिक 'रोमांच' मात्र नहीं है बल्कि यहाँ है-इतिहास और धर्म (युद्ध) को अपनी एकल परिभाषा देने के मंसूबों को तर्क  और विवेक के बल पर ध्वस्त कर सको की सहमतिजन्य प्रतिभा । कशमीर की राजनीति में, बल्कि कहे कि अराजक 'अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिज्' में यह लेखक मात्र पत्रकार का तटस्थ और निष्फल बाना धारण करके प्रवेश नहीं करता बल्कि वह एक ऐसे सच्चे और खरे इंसान के रूप में हस्तक्षेप करता है जो भारतीयता को जानता है और कश्मीरियत को पहचानता है । वह प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य-पाशा में बँधा, प्रकृति के अप्रत्याशित रौद्र रूप को, जान की बाजी लगाकर देखता है, तो वह आतंकवादियों के विष-की ठिकानों को भी अपने कलम और कैमरे के माध्यम से उदघाटित करता है । वास्तव में यही साहस इस यात्रा-वृतांत को अविस्मरणीयता सौंपता है ।
    इस पुस्तक में कश्मीर की कुछ खंडित यात्राएँ भी हैं जिनमें जन सामान्य के प्रति लेखक की प्रतिबद्धता को शब्द-दर-शब्द पढ़ा  और महसूस किया जा सकता है । परवर्ती यात्रा के रूप में कमलेश्वर ने सुलगते कश्मीर की उस झुलसन को शब्द दिए है, जिसे तमाम तकनीकी विकास के बाबजूद कैमरा पकड नहीं पाता । यह किताब मुद्रित शब्द और कैमरे के आधुनिक युग की सामर्थ्य  और सीमा का भी संभवत: अनुपम दस्तावेज साबित होगी ।
  • Sahitya : Vividh Vidhayen
    Shashi Sahgal
    240 216

    Item Code: #KGP-755

    Availability: In stock

    साहित्य: विविध विधाएं
    हिंदी साहित्य का संसार जितना विपुल है, उसी अनुपात में साहित्य की विधाओं का भी विस्तार हुआ है। साहित्य की विकास-यात्रा में भले ही एक विधा का प्रवेश दूसरी विधा में हो रहा है, फिर भी प्रत्येक विधा के कुछ ऐसे लक्षण हैं, जिनसे हम उस विधा की पहचान करते हैं। मसलन नाटक और उपन्यास या फिर कहानी और डायरी आदि सभी विधाओं के कुछ ऐसे बुनियादी तत्त्व हैं जो साहित्य की एक विधा से दूसरी विधा को अलग पहचान देते हैं। शशि सहगल की पहचान एक कवि, आलोचक एवं अनुवादक के रूप में है। 
    एक लंबे समय तक दिल्ली विश्वविद्यालय में पठन-पाठन करते हुए उन्होंने जिस जरूरत को खुद महसूस किया, यह पुस्तक उन्हीं बिंदुओं एवं अनुभवों से प्रेरित है और साहित्य की विविध विधाओं के बुनियादी तत्त्वों से जुड़े भारतीय एवं पाश्चात्य विचारकों की धारणाओं को संक्षेप रूप में सामने रखती है। 
    प्रस्तुत पुस्तक का महत्त्व इसलिए और भी बढ़ जाता है कि इसमें बुनियादी सिद्धांतों को रेखांकित करने के साथ-साथ कुछ प्रमुख लेखकों या प्रमुख रचनाओं के बहाने प्रत्येक विधा की अद्यतन जानकारी भी दी गई है। इस मायने में यह किताब साहित्य की प्रत्येक विधा का सैद्धांतिक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पाठक के सामने रखती है। 
    इस प्रकार ‘साहित्य: विविध विधाएं’ साहित्य के आम जिज्ञासु पाठकों, छात्रों, शिक्षकों एवं शोधकर्ताओं के लिए एक उपयोगी और जरूरी किताब बन जाती है।
  • Kissa Maujpur Ka
    Jaivardhan
    160 144

    Item Code: #KGP-1819

    Availability: In stock

    'किस्सा मौजपुर का' नाटक को वर्ष 2012 के दस श्रेष्ठ नाटकों में से एक श्रेष्ठ नाटक चुना गया । 'भारतेंदु नाट्य उत्सव' के अंतर्गत 23 मार्च, 2013 को इसका पुनः जोरदार प्रदर्शन हुआ । नाटक देखकर लेखक और वरिष्ठ रंगकर्मी श्री रेवती सरन शर्मा ने कहा था कि इस विषय पर कोई नाटक ऐसे भी लिखा जा सकता है, कम से कम मैं नहीं सोच सकता ।
  • Lekhak Ki Chherchhar
    Kashi Nath Singh
    350 315

    Item Code: #KGP-434

    Availability: In stock

    लेखक की छेड़छाड़ 
    आलोचना की भाषा और रचना की भाषा एक नहीं हो सकती–इस मानने वाले लोग हैं लेकिन काशीनाथ सिंह ऐसे लेखक हैं जिनका प्रबल विश्वास है कि आलोचना भी रचना है । 'लेखक की छेड़छाड़' में उनके इस विश्वास के आधार देखे जा सकते हैं । काशीनाथ सिंह के मूल स्वभाव यहाँ भी देखा जा सकता है–बतकही, चुहल और मजे-मजे में जमाने भर की बात कह देना । वे अपने साथ चलने वाले समकालीनों के काम पर नजर डालते हैं तो अग्रजों को अघर्य  भी देते हैं । उनके अपने कहानी लेखन के अंतरसूत्रों को जानना हो या अभी-अभी के नए कथा परिदृश्य का सिंघावलोकन, यहाँ सब मौजूद है । 'अपना मोर्चा' और 'कशी एक अस्सी' जैसे कालजयी उपन्यासों की रचना-प्रक्रिया में केवल शोधार्थियों की ही दिलचस्पी नहीं हो सकती और न ही लेखक की सामाजिक भूमिका पर बहस पर किन्हीं ख़ास पाठकों की। यह एक अनुपम गद्य सर्जक के ही बुते की बात है कि वह धूमिल जैसे कवि पर आलेख लिखता है तो गोदान का नए जमाने में महत्त्व भी खोज पाता है । यहां भी काशीनाथ सिंह की पहले दर्जे की गद्य सर्जन का आस्वाद लिया जा सकता  है जो आलोचना, लेख, मूल्यांकन, समीक्षा या स्मृति लेख के रूप में आए हैं । यह लेखक की छेड़छाड़ तो है लेकिन इस छेड़छाड़ की व्यंजन गहरी है और मार दूर तक जाने वाली है । 
  • Aaj Aur Abhee
    Ramesh Chandra Shah
    220 198

    Item Code: #KGP-406

    Availability: In stock

    ...डायरी इतनी अंतरंग होती है कि आप खुद जैसे अपनी आत्मा से बात कर रहे हों। तो इसे छपने के लिए क्यों दे देते हैं। आखिर क्या बात है कि हमें जरूरी लगता है कि यह छपना चाहिए। ...रमेशचन्द्र शाह जी की डायरी के कुछ अंश पढ़ लेने के बाद मुझे लगा कि जो मैं आगे लिखने वाला था, वह अब नहीं लिखूँगा। कारण, कि इतना अंतरंग है यह। सुनिए 5 मार्च, 1982 की डायरी का एक अंश: 
    आड़ू के फूलों की गंध..., नीबू की पत्तियों की गंध,...कालिका मंदिर के पिछवाड़े नारंगी की गंध, लकड़ियों के पूले बाँधते हुए, चिरे हुए रामबाँस की गंध,...किलेखाई के निंगाले की गंध,...हनुमान मंदिर में साधुओं के चिलम की गंध,...चमेली और चरणामृत की गंध,...बाबू की जेब से तंबाकूमिले प्रसाद की गंध,...जाने कितनी और तरह-तरह की गंध...
    मुझे लगता है कि हमारी पूरी जिंदगी और आसपास की जिंदगी की सारी जितनी महकें हो सकती हैं,...उन महकों को...डायरी की अंतरंगता के साथ जब वे आती हैं तो मुझे लगता है कि जैसे हमारा अपना भारत, हमारी अपनी धरती, हमारा अपना घर, हमारा अपना खेत, हमारा अपना मंदिर और हमारे अपने फल एकाएक महकने लगते हैं। कुल दस पंक्तियाँ इतनी गहरी बात कह जाती हैं कि लगता है कि समूची पूरी पहचान ये छोटी-छोटी सी पंक्तियाँ ही दे देती हैं। ...डायरी कभी-कभी वह बात कह जाती है जो बात और कोई नहीं सह सकता। लेकिन डायरी का कागज कहीं न कहीं वह बात सह लेता है और सहने के साथ-साथ आपको बर्दाश्त करने का धीरज भी दे देता है। मुझे लगता है कि यह भी डायरी का एक बहुत बड़ा सार्थक पक्ष है। 
    -कमलेश्वर (समकालीन साहित्य समाचार, जनवरी, 2007)
  • Aag-Paani Aakaash
    Ramdhari Singh Diwakar
    280 252

    Item Code: #KGP-796

    Availability: In stock


  • Virajbahu
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    150 135

    Item Code: #KGP-80

    Availability: In stock


  • Nau Laghu Naatak
    Pratap Sehgal
    120 108

    Item Code: #KGP-2088

    Availability: In stock

    नौ लघु नाटक
    हिंदी में नाट्य-लेखन संस्कृत नाटय-परंपरा और लोक-नाट्य के विविध रूपों से जुड़कर विकसित हुआ हैं । बाद में उस पर ग्रीक त्रासदी, पारसी शैली  और पश्चिमी रंग-शैलियों का असर भी दिखाई देता है ।  मंचीय नाटक बनाम पाठ्य नाटक की बहस भी हिंदी  में होती रही है । इधर हिंदी नाटय-लेखक और हिंदी  रंगमंच अपनी-अपनी दर्पमंडित घोषणाओं के वावजूद एक-दूसरे के पास ही आया है। एकांकी नाटकों-लेखन के विकास के पाशर्व में जहाँ रेडियो की  भूमिका महत्त्वपूर्ण रही है, वहीं स्कूलों एवं कॉलेजों की नाट्य-संस्थाओं द्वारा महसूस की जाने वाली एकांकी नाटकों की ज़रूरत भी एक कारण रही है ।
    अजब बात है कि इधर एकांकी-लेखन कम हुआ है, पर उसकी जगह लघु नाटक एव नुक्कड़ नाटक ने ली है ।
    प्रताप सहगल रंगमंच से जुड़े हुए नाटककार के रूप में विख्यात हैं । उनके नाटक 'रंग बसंती', 'मौत को रात भर नहीं जाती' तथा 'अँधेरे में' आदि के मंचन बार-बार हुए हैं। अपने पिछले नाटक 'अन्वेषक' से उन्हें विशेष ख्याति मिली है ।
    'नौ लघु नाटक' में समय-समय पर लिखे गए नौ लघु नाटक संग्रह के रूप में आ रहे हैं । प्रताप सहगल का नाट्य-लेखन परंपरा एवं प्रयोगशीलता के संतुलन बिंदु पर खडा नजर आता है । अपनी इसी छवि के अनुरूप उनके इन लघु नाटकों में भी कहीं परंपरा की गंध मिलेगी तो कहीं प्रयोगशीलता की ललक । कहीं मूल्यों का भंजक रूप मिलेगा तो कहीं चरित्रों कै भीतर सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक पेठ। इनमें से अनेक नाटक कई-कई बार मंचित हुए हैं और कई एक प्रकाशित होकर अपना पाठक वर्ग बना चुके हैं ।
    छोटे-छोटे शहरों, कस्बों तथा कॉलेजों एवं स्कूलों की नाट्य-मंडलियों को अच्छे लघु नाटकों की प्राय: तलाश रहती है। इस दृष्टि से भी यह संकलन महत्त्वपूर्ण है और लघु नाटकों के विकास की दृष्टि से भी ।
  • Hindi : Kal Aaj Aur Kal
    Prabhakar Shrotiya
    300 270

    Item Code: #KGP-679

    Availability: In stock

    यह पुस्तक आजादी के बाद उत्पन्न राष्ट्रभाषा की बहुचर्चित समस्या को निराले अंदाज में उठाती है। डाॅ. श्रोत्रिय समस्या की तह तक गए हैं। उन्होंने हिंदी से संबंधित लगभग सभी पक्षों को छुआ है। आज जब भारत में अंग्रेजी का दबदबा बढ़ता जा रहा है, यह पुस्तक हमें इससे उत्पन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय खतरों से सावधान करती है।
    डाॅ. श्रोत्रिय जब अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में भाग लेने के लिए धुर उत्तर के देश नार्वे में आमंत्रित हुए, तब वहां दिए गए वक्तव्य और सोच को लेकर लिखा उनका लेख अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ में हिंदी के स्वरूप और समस्या पर नई रोशनी डालता है।
    ‘वागर्थ’ और ‘ज्ञानोदय’ के संपादकीय के रूप में उन्हांेने हिंदी के प्रश्न कई तरह से उठाए हैं, वे भी इस पुस्तक में शामिल हैं।
    इस तरह यह पुस्तक एक लंबे समय से अब तक हिंदी के संबंध में व्यक्त उनके विचारों की प्रतिनिधि पुस्तक है।
  • Mujhse Kaisa Neh
    Alka Sinha
    200 180

    Item Code: #KGP-395

    Availability: In stock

    मुझसे कैसा नेह
    बहुचर्चित कहानीकार अलका सिन्हा ने अपने पहले ही कहानी-संग्रह 'सुरक्षित पंखों की उडान' की टेक्नोलिटररी कहानियों से अपनी अलग पहचान बनाई । इस संग्रह के लगातार प्रकाशित हो रहे संस्करणों और इस पर संपन्न शोध-कार्य आदि पाठकों की पुरजोर स्वीकृति के प्रमाण हैं ।
    अलका सिन्हा का दूसरा कहानी-संग्रह 'मुझसे कैसा नेह' भूमंडलीकरण और बाजारवाद के दौर में आधुनिक संदर्भों  और बदलते समीकरणों का खुलासा करता है, बहुत कुछ हासिल कर चुकने के बाद भी भीतर से रिक्त होते जा रहे व्यक्ति की पहचान कराता है । आज के जटिल यथार्थ से उपजे संघर्ष, तनाव और एकाकीपन के धरातल पर खडी ये कहानियां घर-परिवार के बीच से निकलती हुई वैश्विक परिदृश्य की साक्षी बन जाती हैं ।
    मानवीय मूल्यों की पक्षधर इन कहानियों के पात्र तयशुदा ढर्रे से हटकर नए विकल्पों की खोज करते हैं । बेहतरी के नाम पर ये अपने देशकाल या परिस्थितियों से पलायन नहीं करते, न ही अपने स्त्री-पात्रों को जबरन 'बोल्ड' बनाकर स्त्री-विमर्श का झंडा उठाते हैं । दैहिक विमर्श से आगे अपनी अस्मिता के प्रति चेतना संपन्न ये स्त्रियां आधुनिकता की ओट में अमर्यादित नहीं होती तथा उच्छ्रंखल  और उन्मुक्त हुए बिना भी स्त्री मुक्ति की अवधारणा को संपुष्ट करती हैं ।
    स्फीति से बचती दूश्य-प्रधान भाषा-शैली पाठक को एक नई दुनिया का हिस्सा बना देती है और वह सहज ही इन पात्रों से तादात्म्य स्थापित कर लेता है । भाव प्रवणता के साथ-साथ वैचारिक चिंतन से दीप्त ये कहानियाँ साधारण व्यक्ति की असाधारण भूमिका की संस्तुति करती हैं और अपने यथार्थ को कोसने के बदले अभिनव संकल्पनाओं की जमीन तोड़ती हैं ।
  • Kahanikar Kamleshwar : Punarmulyankan
    Pushp Pal Singh
    450 405

    Item Code: #KGP-879

    Availability: In stock

    ‘नयी कहानी’ की प्रसिद्ध त्रयी के प्रमुख पुरोधा रूप में उभरे कमलेश्वर निश्चय ही प्रेमचंदोत्तर समय के सर्वाधिक महत्वपूर्ण और अत्यंत लोकप्रिय कहानीकार हैं। ‘नयी कहानी’ के समय से लेकर नयी शती के प्रथम दशक तक अपने को उन्होंने निरंतर सृजनशील रखा, एक से एक बढ़कर उम्दा और सशक्त कहानियां रचकर। ‘राजा निरबंसिया’, ‘खोई हुई दिशाएं’, ‘जार्ज पंचम की नाम’, ‘मांस का दरिया’ से लेकर ‘मानसरोवर के हंस’, ‘इतने अच्छे दिन’, ‘तुम्हारा शरीर मुझे पाप क लिए पुकारता है’, ‘सफेद सड़क’ जैसी कितनी ही कालजयी और विश्वस्तरीय श्रेण्य कहानियां उनके खाते में हैं जिन्होंने हिंदी कहानी का चेहरा पूरी तरह बदलकर रख दिया। सहास विश्वास नहीं होता कि कहानी के ललित कोमल स्वरूप में उन्होंने बौद्धिकता का ऐसा निर्मोक प्रदान कर दिया कि वह चिंतन-स्तर पर पाठक को इतना उद्वेलित कर सकने की क्षमता से युक्त हो सकी है। 
    प्रख्यात कथा-समीक्षक डाॅ. पुष्पपाल सिंह ने अपनी प्रखर और पूर्ण निष्पक्ष दृष्टि से कमलेश्वर के समग्र कहानी-साहित्य का यह अत्यंत सुचिंतित अध्ययन प्रस्तुत किया है, यदि वे कमलेश्वर की कहानियों के श्रेष्ठ पर रीझकर उनका पूर्ण निस्संग और उन्मुकत भाव से विश्लेषण करते हैं तो उनके श्याम पक्ष और न्यूनताओं का भी रेखांकन इसी बेबाकी से करते हैं।
  • Mere Saakshatkaar : Ashok Vajpeyi
    Ashok Vajpayee
    125 113

    Item Code: #KGP-2037

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : अशोक वाजपेयी
    देश के सर्वाधिक विवादास्पद संस्कृतिकर्मी, कवि और आलोचक अशोक वाजपेयी गत तीन दशकों से हिन्दी साहित्य और संस्कृति के परिदृश्य पर छाए हुए हैं। कविता और आलोचना के साथ-साथ समय साहित्य और कलाओं के प्रति बहुलतावाद के पक्षधर श्री वाजपेयी पर अब तक जितने वैचारिक हमले हुए हैं, वे यह सिद्ध करने के लिए काफी है कि उनको भूलकर स्वातंत्र्योत्तर साहित्य की बहस अधुरी रहेगी ।
    'मेरे साक्षात्कार' श्रृंखला की यह पुस्तक उन तमाम आरोपों और बहसों का एक दस्तावेज है जो गत तीस वर्षों में होती रहीं है । इनमें अशोक वाजपेयी ने बहुत सफाई से अपने पर लगाए जाते रहे आरोपों का खंडन किया है और साहित्य की सार्थक भूमिका को रेखांक्ति किया है । बातचीत में शामिल मुद्दे वहीं है जो वर्षो से साहित्यिक परिदृश्य पर उठते रहे है । इन मुद्दों में कला और साहित्य की स्वायत्तता तथा उसकी प्रजातांत्रिकता, कलादृष्टियों की लोकतांत्रिकता का सम्मान, साहित्य की समाज-सापेक्षता, कलावाद की जरूरत, कविता और विचार का द्वंद्व , उत्तर-आधुनिकता की उपादेयता और जीवन में साहित्य के सरोकार जैसे मुद्दे इस पुस्तक में बसी मुस्तैदी से उठाये गए है जिनका सटीक, सार्थक और दोटूक ज़वाब देते हुए अशोक वाजपेयी ने अपनी संघर्ष-यात्रा की सार्थकता प्रमाणित की है । पशिचमी अवधारणओं पर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने वाले कथित आलोचकों को भी वे करारा झटका देते है जब कहते है कि 'उत्तर- आधुनिकता भरत में प्राक आधुनिकता है ।'
    अशोक बाजपेयी हिन्दी ही नहीं देश के दो-तीन ऐसे आलोचकों- भावकों में हैं जिनके लिए कलाओं का भी उतना ही मूल्य है जितना कि साहित्य का । पुस्तक में कई स्थलों पर संगीत, नृत्य, रूपंकर आदि कलाओँ पर बात करते हुए श्री वाजपेयी ने कलाओं की पारस्परिक्ता और मित्रता के कई ऐसे सूत्रों का भी खुलासा किया है जिनकी चर्चा हाल में अधिक मुखर हुई है । कहना चाहिए कि यह पुस्तक अपनी बेबाकी और उपादेयता के कारण उन सबको पसंद आएगी जो साहित्य को महज़ हथियार नहीं, संख्या भी मानते हैं ।
  • 20-Best Stories From Europe
    Prashant Kaushik
    545 491

    Item Code: #KGP-9318

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. European short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.

    With stories like Elsi, The Unusual Farm Maid by Jeremias Gotthelf, The Jews’ Beech-tree by Annette Von Droste-hülshoff, The Broommaker of Rychiswyl by Jeremias Gotthelf, Fair Eckbert by Ludwig Tieck, How Joggeli Finds A Wife by Jeremias Gotthelf, A Little Legend of the Dance by Gottfied Keller, this book is a compilation of 20 famous European short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Europe.
  • Ek Qatara Khoon (Paperback)
    Ismat Chugatai
    250

    Item Code: #KGP-97

    Availability: In stock


  • Neeraj Ke Prem Geet
    Gopal Das Neeraj
    150 135

    Item Code: #KGP-59

    Availability: In stock

    नीरज के प्रेमगीत

    लड़खड़ाते हो उमर के पांव,
    जब न कोई दे सफ़र में साथ,
    बुझ गए हो राह के चिराग़
    और सब तरफ़ हो काली रात,
    तब जो चुनता है डगर के खार-वह प्यार है ।

    ० 

    प्यार में गुजर गया जो पल वह
    पूरी एक सदी से कम नहीं है,
    जो विदा के क्षण नयन से छलका
    अश्रु वो नदी से कम नहीं है,
    ताज से न यूँ लजाओ
    आओं मेरे पास आओ
    मांग भरूं फूलों से तुम्हारी
    जितने पल हैं प्यार करो 
    हर तरह सिंगार करो,
    जाने कब हो कूच की तैयारी !

    ० 

    कौन श्रृंगार पूरा यहाँ कर सका ?
    सेज जो भी सजी सो अधूरी सजी,
    हार जो भी गुँथा सो अधूरा गुँथा,
    बीना जो भी बजी सो अधूरी बजी,
    हम अधुरे, अधूरा हमारा सृजन,
    पूर्ण तो एक बस प्रेम ही है यहाँ
    काँच से ही न नज़रें मिलाती रहो,
    बिंब का मूक प्रतिबिंब छल जाएगा ।

    [इसी पुस्तक से ]
  • Paarijat (Paperback)
    Nasera Sharma
    290 261

    Item Code: #KGP-299

    Availability: In stock


  • Shankar Shesh : Samagra Naatak (3 Vols.)
    Shanker Shesh
    1600 1440

    Item Code: #KGP-725

    Availability: In stock

    शंकर शेष: समग्र नाटक (3 खण्डों में)
    डॉ. शंकर शेष हिंदी नाट्य साहित्य के अत्यंत प्रतिष्ठित रचनाकार हैं। पार्थिव शरीर से हमारे साथ न होते हुए भी अपनी रचनाओं के माध्यम से वे निरंतर अपने पाठकों के मन में रहते हुए एक संवाद में लीन अनुभूत होते हैं। 
    डॉ. शेष ने लगभग बीस पूर्ण अंकी नाटक, एकांकी, उपन्यास और कुछ लेख आदि लिखकर साहित्यिक जगत् में जितनी प्रतिष्ठा अर्जित की, चलचित्र जगत् में पटकथा लेखक के रूप में वे उससे कम चर्चित नहीं रहे, बल्कि उनकी विशेषता रही कि उन्होंने सिनेमा जगत् में कम काम किया, किंतु उसके लिए कोई समझौता नहीं किया।
    प्रस्तुत ‘शंकर शेष: समग्र नाटक’ (तीन खंड) में उनके प्रकाशित-अप्रकाशित सभी नाटक-एकांकी संकलित हैं। केवल शेष वही रहा है, जिसका रूप इतना अधूरा था कि उसे पूरा करते तो फिर वह डॉ.  शेष का न रहकर संशोधक या पूरा करने वाले का हो जाता।
    डॉ.  शेष के जीवन के उतार-चढ़ाव के साथ उनकी रचनाधर्मिता में भी वह उतार-चढ़ाव देखा जा सकता है और वह व्यक्ति जितना सहज था, इसका प्रमाण भी उनकी रचनाओं में बिखरा पड़ा है। प्रस्तुत तीन खंडों में उनका नाटककार रूप संश्लिष्ट होकर पाठक के सामने आता है। 
    हमें आशा ही नहीं, विश्वास है कि इन खंडों में पाठकों को शंकर शेष की रचनात्मकता के कई स्तर और आयाम मिलेंगे।
  • Vichaar Bindu
    Atal Bihari Vajpayee
    245 221

    Item Code: #KGP-9019

    Availability: In stock

    विचार-बिन्दु
    हमने अपने दैनिक जीवन में स्वतंत्रता, समानता और सहिष्णुता के सिद्धांतों क्रो संजोकर रखा है । यदि 21वीं शताब्दी में विश्व को अब तक के विश्व से अच्छा बनाना है तो इन मूल्यों को अपनाना जरूरी  है । इतिहास भी साक्षी है कि इन मूल्यों को अपनाने का उपदेश देना तो आसान है, परंतु इन पर अमल करना मुश्किल है । लेकिन अब, जबकि हमारी परस्पर निर्भरता बढ़ रही है, इसका कोई विकल्प नहीं है । विश्व और इसके नेताओं को पूरी इच्छाशक्ति के साथ समय की मांग को देखते हुए नए युग में एक नए दृष्टिकोण के साथ प्रवेश करना चाहिए । हमारी सामने यही कार्य है और मैं घोषणा करता हूँ कि भारत आने वाली परीक्षा की घडी में अपना पूरा  योगदान देने के लिए तैयार है ।

    राष्ट्रीय जीवन में एक असहिष्णुता जाग रही है, दूसरे को सहन न करने की प्रवृत्ति । लोकतंत्र में यह प्रवृत्ति नहीं चल सकती । हमने हमेशा चारों तरफ से आने वाली हवाओं का स्वागत किया । इस देश के द्वार सबके लिए खुले रहे है । जब और जगह आतंक था, शोषण था, भय था, मजहब के नाम पर उत्पीड़न था, तो लोग अपनी पवित्र अग्नि को जलाए हुए भारत में आए । और यहाँ भारतमाता के आँचल में उन्होंने विश्राम पाया । किसी ने उनसे यह नहीं पूछा कि यहाँ कैसे आए, क्यों आए, पराए हो । यह इस देश की मिट्टी का रंग है, यह इस देश की संस्कृति का गुण है ।
    -अटल  बिहारी वाजपेयी
  • Premchand Ki Amar Kahaniyan (Paperback)
    Kamlesh Pandey
    120

    Item Code: #KGP-7215

    Availability: In stock

    साहित्य की सभी विधाओं में सर्वाधिक सशक्त एवं आकर्षक विधा के रूप में 'कथा' को स्वीकृति प्राप्त हैं । लघु कलेवर होने के कारण कहानी समय-साध्य तो है ही, उसने जीवन के आभिजात्य से भी संबंध स्थापित किया है ।
    प्रस्तुत पुस्तक कथाकार प्रेमचंद की कुछ महत्वपूर्ण कहानियों का संकलन है । इनकी कहानियों में मनोवैज्ञानिक अंत:स्पर्श, मानसिक अंतर्द्वद्व  की तीक्ष्ण एवं आकुल अभिव्यक्ति, भाषा की कथानुरूप प्रस्तुति, शिल्प की प्रांजल चेतना विद्यमान है । प्रेमचंद की कहानियाँ जीवन के मानसिक एवं सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज है । उन्होंने अपनी रचनाओं में जहाँ एक ओर समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं विषमताओं पर करारा प्रहार किया वहीं दूसरी ओर भारतीय जनजीवन की अस्मिता की खोज भी की है तथा समाज के विभिन्न वर्गों की अनेक ज्वलंत समस्याओं को लेकर प्रगतिशील दृष्टिकोण का परिचय दिया है ।
    प्रेमचंद साहित्य को मानव-संसार का एक सशक्त माध्यम मानते थे। उनकी साहित्यिक दृष्टि अन्य कथाकारों से सर्वथा भिन्न थी । उन्होंने मानव-जीवन के दुःख - दर्द का स्वयं अनुभव किया और पूरी ईमानदारी से उसका वर्णन किया ।
  • Suraj Se Puchhen
    Neelam Kanvdia
    60 54

    Item Code: #KGP-9035

    Availability: In stock

    सूरज से पूछे
    रचना कब, क्यों, कहां, कैसे, कैसी जन्म लेती है,
    यह रचनाकार स्वयं भी नहीं जानता, न बता
    सकता है । लेकिन जीवन में कभी ऐसा पल, अवसर
    या प्रसंग आ जुटता है जो रचनारत करता है, तो
    कभी रचनाकर्म को एक नया आयाम,
    नए क्षितिज दे जाता है ।
    श्रीमती नीलम कावडिया के जीवन में ऐसा एक
    अवसर आया, रक्षाबंधन के दिन भानुजी के
    राखी बंधवाने के लिए घर आने पर ।
    राखी बाँधकर नीलमजी ने अपनी एक कविता
    भानुजी को सुनाई। उस पुरस्कृत कविता
    को सुनकर भानुजी गंभीर हो आए ।
    बाद को एक दिन वह प्रसंग उठाने पर भानुजी ने
    जो उत्तर दिया उसे सुनकर नीलमजी तत्काल
    तो मौन रह गई लेकिन वह मौन कहीं
    अंतरतम में बार-बार, लगातार गुंजित होता रहा,
    मथता रहा रचनाकार को,
    उनकी सोच, समझ और दृष्टि को ।
    अनंतर जब अंतरतम की वह गुँज बाहर मुखरित हुई
    तब सामने आई ये कविताएँ, जिन्होंने न केवल
    नीलमजी की दिशा ही बदल दी,
    साहित्य-जगत को मिली एक अनूठी काव्यकृति
    'सूरज से पूछें'। 
  • Yogiraj Shri Krishna
    Lala Lajpat Rai
    250 225

    Item Code: #KGP-101

    Availability: In stock

    योगिराज श्रीकृष्ण
    परवर्ती काल में कृष्ण के उदात्त तथा आर्योचित चरित्र को समझने में चाहे लोगों ने अनेक भूलें ही क्यों न की हों, उनके समकालीन तथा अत्यन्त आत्मीय जनों ने उस महाप्राण व्यक्तित्व का सही मूल्यांकन किया था । सम्राट युधिष्ठिर उनका सम्मान कस्ते थे तथा उनके परामर्श को सर्वोपरि महत्व देते थे । पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण तथा कृपाचार्य जैसे प्रतिपक्ष के लोग भी उन्हें भरपूर आदर देते थे ।
    आर्य जीवनकला का सर्वांगीण विकास हमें कृष्ण के पावन चरित्र में दिखाई देता है । जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जिसमें उन्हें सफलता नहीं मिली । सर्वत्र उनकी अदभुत मेधा क्या सर्वग्रासिनी प्रतिभा के दर्शन होते हैं । वे एक ओर महान् राजनीतिज्ञ, क्रान्तिबिधाता, धर्म पर आधारित नवीन साम्राज्य के स्रष्टा राष्ट्रपुरुष के रूप में दिखाई पडते हैं तो दूसरी ओर धर्म, अध्यात्म, दर्शन और नीति के सूक्ष्म चिन्तक, विवेचक क्या प्रचारक भी हैं। उनके समय में भारत देश सुदूर गांधार से लेकर दक्षिण की सह्याद्री पर्वतमाला तक क्षत्रियों के छोटे-छोटे, स्वतंत्र किन्तु निरंकुश राज्यों में विभक्त हो चुका था । उन्हें एकता के सूत्र में पिरोकर समय भरतखण्ड को एक सुदृढ़ राजनीतिक इकाई के रूप में पिरोने वाला कोई नहीं था ।
    एक चक्रवर्ती सम्राट के न होने से विभिन्न माण्डलिक राजा नितान्त स्वेच्छाचारी तथा  प्रजापीड़क हो गये थे । मथुरा का कंस, मगध का जरासंध, चेदिदेश का शिशुपाल तथा हस्तिनापुर के दुर्योधन प्रमुख, कौरव सभी दुष्ट, विलासी, ऐश्वर्य-मदिरा में प्रमत्त तथा दुराचारी थे । कृष्ण ने अपनी नीतिमत्ता, कूटनीतिक चातुर्य तथा अपूर्व सूझबूझ से इन सभी अनाचारियों का मूलोच्छेद किया तथा धर्मराज कहलाने वाले अजातशत्रु युधिष्ठिर को आर्यावर्त के सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर आर्यों के अखण्ड, चक्रवर्ती, सार्वभौम साम्राज्य  को साकार किया ।
    जिस प्रकार वे नवीन सामाज-निर्माता तथा  स्वराज्यस्रष्ठा युगपुरुष के रूप में प्रतिष्ठित हुए, उसी प्रकार अध्यात्म तथा तत्त्व-चिन्तन के क्षेत्र में भी उनकी प्रवृतियाँ चरमोत्कर्ष पर पहुँच चुकी थीं । सुख-दु:ख को समान समझने वाले, लाभ और हानि, जय और पराजय जैसे द्वंद्वो  को एक-सा मानने वाले, अनुद्विग्न, वीतराग तथा जल में रहने वाले कमल पत्र के समान सर्वथा निर्लेप, स्थितप्रज्ञ व्यक्ति को यदि हम साकार रूप में देखना चाहें तो वह कृष्ण से भिन्न अन्य कौन-सा होगा ? प्रवृत्ति और निवृत्ति, श्रेय और प्रेय, ज्ञान और कर्म, ऐहिक और पारलौकिक जैसी आपातत: विरोधी दीखने वाली प्रवृत्तियों में अपूर्व सामंजस्य स्थापित का उन्हें स्वजीवन में चरितार्थ करना कृष्ण जैसे महामानव के लिए ही सम्भव था । उन्होंने धर्म के दोनों लक्ष्यों अभ्युदय और नि:श्रेयस के उपलब्धि की । अत: यह निरपवाद रूप से कहा जा सकता है कि कृष्ण का जीवन आर्य आदर्शों  की चरम परिणति है ।
  • Mahan Deshbhakt Swami Shraddhanand
    Jagat Ram Arya
    140 126

    Item Code: #KGP-9111

    Availability: In stock

    महान् देशभक्त स्वामी श्रद्धानन्द
    धर्मवीर, कर्मवीर, निर्भीक संन्यासी, जिनके नाम से अंग्रेज सरकार भी डरती थी, जिनको महात्मा गांधी ने अपना गुरु माना, उन्हीं स्वामी श्रद्धानन्द जी  के बारे में आज तकभारतीय जनता यही समझनी रही है कि वे आर्य संन्यासी थे— उन्होंने केवल आर्यसमाज का ही प्रचार किया, लेकिन वास्तविकता कुछ और ही है । स्वामी श्रद्धानन्द जी ने आर्यसमाज के प्रचार के साथ-साथ देश की एकता के लिए, देश को विदेशी सरकार की गुलामी से आजाद कराने के लिए, साम्प्रदायिकना का बीज नाश काने के लिए, देज्ञा का गौरव बढाने के लिए जो महान कार्य किए उसी के फलस्वरूप आज भारत स्वतंत्र  है। प्रस्तुत जीवनी में स्वामी जी  के राष्ट्रीय जीवन पर विशेष रूप से प्रकाश डाला गया है ।

  • Na Dainyam Na Palaynam
    Atal Bihari Vajpayee
    120 108

    Item Code: #KGP-33

    Availability: In stock

    सचाई यह है कि कविता और राजनीति साथ-साथ नहीं चल सकती । ऐसी राजनीति, जिसमें प्राय: प्रतिदिन भाषण देना जरूरी है और भाषण भी ऐसा जो श्रोताओं को प्रभावित कर सके, तो फिर कविता की एकान्त साधना के लिए समय और वातावरण ही कहीं मिल पाता है । मैंने जो थोडी-सी कविताएँ लिखी है, वे परिस्थिति-सापेक्ष हैं  और आसपास की दुनिया को प्रतिबिम्बित करती हैं ।
    अपने कवि के प्रति ईमानदार रहने के लिए मुझे काफी कीमत चुकानी पडी है, किन्तु कवि और राजनीतिक कार्यकर्ता के बीच मेल बिठाने का मैं निरन्तर प्रयास करता रहा हूँ । कभी-कभी इच्छा होती है कि सब कुछ छोड़-छाड़कर वहीँ एकान्त में पढ़ने, लिखने और चिन्तन करने में अपने को खो दूँ, किन्तु ऐसा नहीं कर पाता ।
    मैं यह भी जानता हूँ कि मेरे पाठक मेरी कविता के प्रेमी इसलिए हैं कि वे इस बात से खुश है कि मैं राजनीति के रेगिस्तान में रोते हुए भी, अपने हृदय में छोटी-सी स्नेह-सलिला बहाए रखता हूँ ।
    --अटल बिहारी वाजपेयी
  • Anhad Naad
    Pratap Sehgal
    250 225

    Item Code: #KGP-35

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Nagarjun
    Nagaarjun
    300 270

    Item Code: #KGP-15

    Availability: In stock


  • Samkalin Sahitya Samachar April, 2017
    Sushil Sidharth
    0

    Item Code: #April, 2017

    Availability: In stock

  • Shaayad Vasant
    Pranav Kumar Bandhopadhyaya
    100 90

    Item Code: #KGP-1920

    Availability: In stock

    शायद बसंत
    उत्तर कोरिया सामाजिक या आर्थिक रूप में एक बहुख्यात देश तो नहीं है, लेकिन उसकी राजनीति और व्यवस्था की अपनी पहचान है । जापानी और अमेरिकी सामरिक शक्तियों के विरुद्ध रक्तिम संघर्षों ने उस देश को जख्मी जरूर किया है, लेकिन वहाँ अब स्थापित है आत्मविश्वास से भरपूर एक प्रगतिशील राष्ट्र । वहाँ सामान्य रूप में पर्यटकों के जाने को अनुमति अवश्य नहीं है, किंतु मित्र देशों के कुछ बुद्धिजीवी समय-ममय पर आमंत्रित किए जाते रहे है । ऐसे ही एक अवसर पर कवि-कथाकार प्रणवकुमार वंद्योपाथ्याय उत्तर कोरिया  की यात्रा पर जाकर वहाँ के पहाडों, दर्रों, नगरों और गाँवों में घूमते रहे । उस यात्रा की साहित्यिक फसल है शायद वसंत, जो अनौपचारिक डायरी के पन्नों से निकलकर अब प्रस्तुत है एक पुस्तक के रूप में ।
    उत्तर कोरिया पर हिंदी में यह पहली पुस्तक है, जो पाठकों को उस देश की भूमि, पहाड़, समुन्द्र और मनुष्य की आंतरिक बनावट से एक अगम्य अनुभव के साथ परिचित कराती है ।
  • Thank You! Saddaam Husain
    Kshma Sharma
    75 68

    Item Code: #KGP-9076

    Availability: In stock


  • Tumhare Liye
    Himanshu Joshi
    200 180

    Item Code: #KGP-2030

    Availability: In stock

    तुम्हारे लिए
    आग की नदी!
    नहीं, नहीं, यह दर्द का दरिया भी है, मौन-मंथर गति से निरंतर प्रवाहित होता हुआ ।
    यह दो निश्छल, निरीह उगते तरुणों की सुकोमल स्नेह-गाथा ही नहीं, उभरते जीवन का स्वप्निल कटु यथार्थ भी है कहीं । वह यथार्थ, जो समय के विपरीत चलता हुआ भी, समय के साथ-साथ, समय का सच प्रस्तुत करता है ।
    मेहा-विराग यानी विराग-मेहा का पारदर्शी, निर्मल स्नेह इस कथा की भावभूमि बनकर, अनायास यह यक्ष-प्रश्न प्रस्तुत करता है-प्रणय क्या है? जीवन क्या है ? जीवन की सार्थकता किसमें है ? किसलिए ?
    ० 
    बहुआयामी इस जीवंत मर्मस्पर्शी कथा में अनेक कथाधाराएँ हैं। अनेक रूप हैं, अनेक रंग। पर ऐसा क्या है इसमें कि हर पाठक को इसके दर्पण में अपना प्रतिबिम्ब दीखने लगता है ?
    ० 
    हिंदी के बहुचर्चित उपन्यासों में, बहुचर्चित इस उपन्यास के अनेक संस्करण हूए । मराठी, पंजाबी, कन्नड़, तमिल, उर्दू, अंग्रेजी आदि अनेक भाषाओं में अनुवाद भी । दूरदर्शन से धारावाहिक रूप में प्रसारण भी हुआ । ब्रिटेन की एक कंपनी ने आडियो कैसेट भी तैयार किया, जो लाखों श्रोताओं द्वारा सराहा गया ।
  • Rang Hawa Mein Phail Raha Hai
    Ubaid Siddqi
    300 270

    Item Code: #KGP-547

    Availability: In stock

    हक़ीक़त चाहे जो भी हो, शाइर और अदीब आज भी इस ख़ुशफ़हमी में मुबतिला हैं कि वो अपनी रचनात्मकता के द्वारा इस दुनिया को बदसूरत होने से बचा सकते हैं और समाज में पाई जाने वाली असमानताओं को दूर कर सकते हैं। उबैद सिद्दीक़ी की शाइरी का एक बड़ा हिस्सा इसी ख़ुशफ़हमी का नतीजा मालूम होता है:
    जाने किस दर्द से तकलीफ़ में हैं
    रात दिन शोर मचाने वाले
    ये सब हादसे तो यहां आम हैं
    ज़माने को सर पर उठाता है क्या
    आधुनिकता के जोश में हमारी शाइरी, ख़ास तौर पर ग़ज़ल ने समाजी सरोकारों से जो दूरी बना ली थी उबैद ने अपनी ग़ज़लों में इस रिश्ते को दोबारा बहाल करने का एक सराहनीय प्रयास किया है:
    धूल में रंगे-शफ़क़ तक खो गया है
    आस्मां तू कितना मैला हो गया है
    बहुत मकरूह लगती है ये दुनिया
    अगर नज़दीक जाकर देखते हैं
    सदाए-गिर्या जिसे एक मैं ही सुनता हूं
    हुजूमे-शहर  तेरे दरम्यां से आती है
    अपने विषयवस्तु और कथ्य से इतर उबैद की शाइरी अपनी मर्दाना शैली और अन्याय के खि़लाफ़ आत्मविश्वास से परिपूर्ण प्रतिरोध की भी एक उम्दा मिसाल है:
    शिकायत से अंधेरा कम न होगा
    ये सोचो रौशनी बीमार क्यों है
    मैं फ़र्दे-जुर्म तेरी तैयार कर रहा हूं
    ए आस्मान सुन ले हुशयार कर रहा हूं
  • Ullanghan (Paperback)
    Bhairav Prasad Gupt
    190

    Item Code: #KGP-1544

    Availability: In stock

    डॉ. एस.एल. भैरप्पा
    (जन्म: 1934)
    पेशे से प्राध्यापक होते हुए भी, प्रवृत्ति से साहित्यकार बने रहने वाले भैरप्पा ऐसी गरीबी से उभरकर आए हैं जिसकी कल्पना तक कर पाना कठिन है। आपका जीवन सचमुच ही संघर्ष का जीवन रहा। हुब्बल्लि के काडसिद्धेश्वर कालेज  में अध्यापक की हैसियत से कैरियर शुरू करके आपने आगे चलकर गुजरात के सरदार पटेल विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के एन.सी.ई.आर.टी. तथा मैसूर के प्रादेशिक शिक्षा कालेज में सेवा की है। अवकाश ग्रहण करने के बाद आप मैसूर में रहते हैं।
    ‘धर्मश्री’ (1960) से लेकर ‘मंद्र’ (2002) तक आपके द्वारा रचे गए उपन्यासों की संख्या 19 है। उपन्यास से उपन्यास तक रचनारत रहने वाले भैरप्पा ने भारतीय उपन्यासकारों में अपना एक विशिष्ट स्थान बना लिया है। 
    केंद्रीय साहित्य अकादेमी तथा कर्नाटक साहित्य अकादेमी (3 बार) का पुरस्कार, भारतीय भाषा परिषद का पुरस्कार--ऐसे कई पुरस्कारों से आप सम्मानित हुए हैं। अखिल भारतीय कन्नड़ साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता का, मराठी साहित्य सम्मेलन के उद्घाटन करने का, अमेरिका में आयोजित कन्नड़ साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता करने आदि का गौरव भी आपने अर्जित किया है।
    देश-विदेश की विस्तृत यात्रा करने वाले भैरप्पा ने साहित्येतर चिंतनपरक कृतियों की भी रचना की है। आपकी साहित्यिक साधना से संबंधित कई आलोचनात्मक पुस्तकें भी प्रकाशित हो  चुकी  हैं।
  • Jansampark : Avadharana Evam Badalata Svaroop
    Kri. Shi. Mehta
    250 225

    Item Code: #KGP-297

    Availability: In stock

    जनसंपर्क, जनसंचार का एक ऐसा घटक है जो एक ओर तो जनसंचार को जीवंत रखता है, वहीं दूसरी ओर उसके प्रभाव अथवा परिणाम के संबंध में विषय विशेषज्ञ भी कोई निश्चित दावा नहीं कर सकते। उसके इस अनिश्चित चरित्र का प्रमुख कारण जनसंपर्क के भागीदार त्रिमूर्ति के बीच विचित्र संगम, समन्वय एवं संप्रेक्षण के अभाव में निहित है। जनसंपर्क वह सूत्र है जो इस त्रिमूर्ति-यानी संदेश, माध्यम तथा हितग्राही को सक्रिय करने में अपनी अहम भूमिका का निर्वाह करता है। आज तक किसी ऐसे नियम या मंत्र की खोज नहीं हो पाई है जो जनसंपर्क के प्रभाव ओर उसके परिणाम की सफलता अथवा असफलता का पूर्वानुमान लगा सके।
    जनसंपर्क निरंतर प्रवाहित होने वाली ऐसी प्रक्रिया है, जिस पर उस देश की भौगोलिक संरचना, ऐतिहासिक परंपरा, संस्कृति, स्थानीय बोलियां एवं भाषा, सामाजिक एवं धार्मिक आचार-विचार, स्थानीय मान्यताओं इत्यादि अनेक बातों तथा घटनाओं का प्रभाव उस परिवेश की त्रिमूर्ति पर निरंतर प्रतिबिंबित होता रहता है। प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से यह जनसंपर्क के अनिश्चित चरित्र के कारण हो सकते हैं।
    आज एक ओर मीडिया के आधुनिक उपकरणों ने अनायास ही जनसंपर्क के सर्वथा नए द्वार खोल दिए हैं और भविष्य में भी ऐसे अनेक द्वार खुलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, वहीं दूसरी ओर भारत की तेजी से बढ़ती हुई आर्थिक एवं औद्योगिक प्रगति के साथ शैक्षणिक विकास ने हितग्राहियों की रुचि, सामाजिक जीवन एवं संस्कृति के क्षेत्र में उथल-पुथल मचा रखी है।
  • Saahasi Bachchon Ke Kaarnaame
    Sanjiv Gupta
    150 135

    Item Code: #KGP-52

    Availability: In stock

    जब मैं छोटा था तो दूसरे बच्चों की तरह खुद भी काॅमिक्स वगैर पढ़ने का शौक रखता था। कुछ बड़ा हुआ तो सोचा कि ये काॅमिक्स बच्चों का मनोरंजन भले ही करते हों, लेकिन न तो उनका चरित्र-निर्माण ही कर पाते हैं और न उन्हें सही राह ही दिखा पाते हैं। मुझे लगा कि बच्चों के लिए ऐसे साहित्य की रचना होनी चाहिए जो वास्तवित धरातल से जुड़ा हो, उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा भी दे तथा एक अच्छा मनुष्य बनाए।
    पत्रकारिता से जुड़ा और प्रतिवर्ष राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार पाने वाले बच्चों से बात करने, उनकी कवरेज करने का अवसर मिला तो मन में दबी यह इच्छा फिर से बलवती होने लगी।
    वर्ष 2003 के प्रारंभ में बहादुर बच्चों से मिलने का अवसर मिला तो सोचा कि इस बार उसी प्रयास को और बेहतर ढंग से अंजाम दिया जाए। इस बारमैंने कहानियों को बहादुर बच्चों से बातचीत की शैली में तैयार कियाताकि उनमें और अधिक वास्तविकता आ सके। कहानियों की संख्या भी दस से बढ़कर उन्नीस है और उनका प्रस्तुतिकरण भी अधिक आकर्षक हैं पहली पुस्तक की तुलना में यह पुस्तक और भी कई मायनों में बेहतर स्वरूप संजोए है। 
    —संजीव गुप्ता
  • Hinsaabhas
    Deepak Sharma
    60 54

    Item Code: #KGP-9109

    Availability: In stock

    हिंसाभास
    सामाजिक परिवेश में रची-बसी इस संग्रह की कहानियाँ आज के संघर्षरत मानव की मर्मान्तक पीडा का चित्रण अत्यन्त मर्मस्पर्शी तथा हृदयबेधक भाषाशैली में करती हैं । हमारे दैनंदिन जीवन में विषमता, नीरसता और विरक्ति का जो जहर घुल चुका है उससे हमें आगाह भी करती हैं। मानव-मानव के बीच बढती विषमता और कटुता की खाई को यदि समय रहते पाटा न गया, और सौहार्द व सदभात्र की भावना को न रोपा गया तो हम विघटन और विनाश की जोखिम-भरी जिन्दगी जीने के लिए बाध्य होकर रह जायेगे ।

  • Shatabdi Ki Kaaljayi Kahaniyan (Vol.-3)
    Kamleshwar
    625 563

    Item Code: #KGP-1578

    Availability: In stock


  • Boomraing
    Rekha Rajvanshi
    225 203

    Item Code: #KGP-877

    Availability: In stock

    बूमरैंग
    इस पुस्तक की संपादक रेखा राजवंशी को आस्ट्रेलिया के प्रमुख कवियों को जोड़ने और पुस्तक-प्रकाशन का विचार तब सूझा जब कैनबरा और सिडनी में आयोजित कवि-सम्मेलनों में किशोर नंगरानी, अब्बास रजा अलवी, शैलजा चतुर्वेदी, हरिहर झा तथा सुभाष शर्मा जी से उनकी मुलाकात हुई । पर्थ के प्रेम माथुर जी व अनिल वर्मा जी की कविताएं भी उन्हें यहीं सुनने को मिली । बाद में जब वह होली के कवि-सम्मेलन में मेलबर्न गईं तो सुभाष जी से इस बारे से चर्चा हुई और उनके सहयोग तथा ई-पत्रों के माध्यम से इस विचार को आकार मिला । बाद में एडीलेड से राय कूकणा जी व पर्थ से रेनू शर्मा जी को भी इसने सम्मिलित किया गया । 
    रेखा राजवंशी के अनुसार, पुस्तक का नाम 'बूमरैंग' इसलिए रखा गया, क्योंकि 'बूमरैंग' आस्ट्रेलिया की आदिवासी देशीय जनजाति का प्रतिनिधित्व करता है । यह एक ऐसा हथियार है, जिसे किसी भी दिशा में फेंका जाए, यह फेंकने वाले के पास ही वापस आ जाता है । तात्पर्य यह कि भारतीय कवि कहीं भी रहें, उनका हृदय बार-बार अपने देश भारत की और ही वापस जाता है। यानी हर भारतीय प्रवासी चाहे- अनचाहे ही 'बूमरैंग' बन जाता है ।
  • Honour Killing Tatha Anya Kahaniyan (Paperback)
    Malti Joshi
    80

    Item Code: #KGP-1269

    Availability: In stock


  • Mahasagar (Paperback)
    Himanshu Joshi
    25

    Item Code: #KGP-1212

    Availability: In stock


  • Nirogyogsadhna (Paperback)
    Manoj Kumar Chaturvedi
    180

    Item Code: #KGP-7070

    Availability: In stock

    निरोगयोगसाधना
    आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम हर क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं और दिन-रात उसके लिए प्रयास करते रहते हैं। इस आपाधापी में व्यक्ति सबसे अहम चीज को जो नकार देता है वह है ‘स्वयं का स्वास्थ्य’। वह यह नहीं समझते कि इस संसार की प्रत्येक वस्तु तभी आपके लिए उपयोगी होगी जब आप उसका आनंद लेने के लिए तैयार होंगे। व्यक्ति यदि स्वस्थ नहीं तो संसार की कीमती से कीमती वस्तु भी उसके लिए बेकार है। स्वस्थ जीवन है तो जहान है। 
    योग द्वारा कैसे व्यक्ति मानसिक और शारीरिक रूप से संपूर्णतया स्वस्थ रह सकता है, इसका विस्तारपूर्वक वर्णन इस ‘निरोगयोगसाधना’ नामक पुस्तक के माध्यम से किया गया है।
    योग दर्शनशास्त्र में वर्णित सूत्र षड्दर्शन का ही छठा अंग है। ये षड्दर्शन वेदों के उपांग माने गए हैं। इसी कड़ी में आगे बढ़ते हुए शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निशक्त, छंद, ज्योतिष आदि वेदों के अंग कहलाते हैं जिनके द्वारा वेद मंत्रों के अर्थ का ज्ञान होता है।
    योग ऐसी कला है जो प्रकृति और मनुष्य के बीच के अंतर को स्पष्ट कर व्यक्ति के समक्ष प्रस्तुत करती है। अर्थात् व्यक्ति योग के माध्यम से इंद्रियों को अपने वश में करने लायक बन जाता है और माया के बंधन से भी स्वयं को तोड़कर मुक्त हो जाता है। योग अनादिकाल से चला आ रहा है और इसकी उपयोगिता व्यक्ति तभी समझ सकता है जब वह योग को स्वयं पर लागू करे, उसमें रम जाए। योग करने वाला व्यक्ति कभी बूढ़ा या बीमारी से ग्रसित नहीं होता।
    —भूमिका से
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Khushwant Singh (Paperback)
    Khushwant Singh
    80

    Item Code: #KGP1289

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : खुशवंत सिंह 
    किताबघर प्रकाशन की महत्वाकांक्षी कथा-सीरीज़ 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' को विस्तार देते हुए इसे अब अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान किया गया है । अर्थात् इस सीरीज़ में अब सभी भारतीय भाषाओँ के शीर्ष कथाकारों की प्रतिनिधि कहानियां उपलब्ध कराये जाने की योजना है ।
    सीरीज़ के इस नव्यतम सेट में शामिल कथाकार हैं : अमरकान्त, कृष्ण बलदेव वैद, खुशवंत सिंह, गोविन्द मिश्र, ज्ञानरंजन, देवेन्द्र सत्यार्थी, निर्मल वर्मा, प्रतिभा राय, शनी, शेखर जोशी तथा शैलेश मटियानी । विभिन्न भाषाओँ के इन भारतीय कथाकारों ने अपनी सर्जनात्मकता के बल पर स्वयं को आधुनिक कथा के जिस शीर्षस्थ स्थान पर स्थापित किया है वह अपने आप में एक उपलब्धि है । इसी 'उपलब्धि' को एक सीरीज़ के माध्यम से पाठक तक पहुँचाकर हम गौरवान्वित है ।
    इन कहानियों में आदमी के मनुष्य हो जाने की अनुभूतियों के जिस तरलता और सरलता से पिरोया गया है, वह सचमुच एक अदभुत पाठकानुभव है । 
    कहानीकार के कथाकर्म का प्रतिनिधि एवं केंद्रीय स्वर, गहन आत्मीयता से यहाँ सामने लाया गया है । यह कथाकार की अपनी कथाभूमि तो है ही, लगता है, हम सबकी सगी दुनिया भी यही है । टूटती-ढहती और फिर से बनती-सँवरती दुनिया । मानवताकामी शुभेच्छा की यह आकांक्षा ही इस सीरीज़ की वह शक्ति है जो आज के तमाम चालू कथा- सीरीज़ों से इसे अलग खड़ा करती है ।

    तो, प्रस्तुत हैं खुशवंत सिंह की दस प्रतिनिधि क्लानियाँ ।
  • Ratangarbha
    Shanker Shesh
    40 36

    Item Code: #KGP-2087

    Availability: In stock


  • Main Sadiyon Ki Pyaas
    Naresh Shandilya
    125 113

    Item Code: #KGP-1918

    Availability: In stock

    नरेश शांडिल्य और उसकी ग़ज़लों से मेरी शनासाई पिछले कुछ वर्षों से है, लेकिन बहुत पुरानी लगती है । मैंने जब-जब उसकी गज़लें पढ़ीं या सुनी, कुछ न कुछ-शे'र जरूर जी को लगे ।
    नरेश शांडिल्य ग़ज़ल-विधा और उसकी नजाकतों से खूब वाकिफ़ है । यह न केवल विभिन्न बहरों और रदीफ़-काफियों का अच्छा ज्ञान रखता है बल्कि शब्दों का भी मिजाज आश्ना है । वह अपने जज़्बात और अहसासात को अशआर के पेराए में अभिव्यक्त करने का गुर जानता है । उसकी ग़ज़लों से व्यक्ति, समाज और समय हाथ में हाथ लिए साथ-साथ चलते नजर जाते हैं ।
    मैं सदियों की प्यास नरेश शांडिल्य की ताजा ग़ज़लों  का संकलन है । मुझे यकीन है कि हिन्दी ग़ज़लों के शैदाई  इसे मुद्दतों याद रखेंगे ।
    -प्रोफेसर सादिक
    उर्दू विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय
  • Anuvaad Vigyan
    Bholanath Tiwari
    250 225

    Item Code: #KGP-735

    Availability: In stock

    अनुवादविज्ञान
    अनुवाद को उसके पूरे परिप्रेक्ष्य में लें तो वह मूलतः अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के अंतर्गत आता है। साथ ही अनुवाद करने में व्यतिरेकी भाषाविज्ञान से भी हमें बड़ी सहायता मिलती है। इस तरह अनुवाद भाषाविज्ञान से बहुत अधिक संबद्ध है।...
    जहाँ तक अनुवाद का प्रश्न है, विद्यार्थी-जीवन में पाठ्यक्रमीय अनुवाद की बात छोड़ दें तो सबसे पहले अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘नेहरू अभिनंदन ग्रंथ’ में मुझे अनुवाद करने का अवसर मिला। उसी समय कुछ भाषा-संबंधी लेखों के मैंने अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद किए। ‘गुलनार और नज़ल’ नाम से एक अंग्रेज़ी पुस्तक का संक्षिप्तानुवाद 1952 में पुस्तकाकार भी छपा था। 1962-64 में रूस में अपने प्रवास-काल में कुछ उज़्बेक, रूसी तथा इस्तोनियन कविताओं का भी मैंने हिंदी-अनुवाद किया था। ताशकंद रेडियो में 1962 में मेरे सहयोग से हिंदी विभाग खुला था। वहाँ प्रतिदिन आध घंटे के कार्यक्रम के लिए रूसी, उज़्बेक, अंग्रेज़ी आदि से हिंदी में अनुवाद किया जाता था, जिसका पुनरीक्षण मुझे करना पड़ता था। 1968 में भारतीय अनुवाद परिषद् ने अपनी त्रैमासिक पत्रिका ‘अनुवाद’ के संपादन का भार मुझे सौंपा और समयाभाव के कारण, न चाहते हुए भी, कई मित्रों के आग्रह से मुझे यह दायित्व लेना पड़ा।
    प्रस्तुत पुस्तक की सामग्री के लेखन का प्रारंभ मूलतः ‘अनुवाद’ पत्रिका का सिद्धांत विशेषांक निकालने के लिए कुछ लेखों के रूप में हुआ था। विशेषांक के लिए कहीं और से अपेक्षित सामग्री न मिलने पर धीरे-धीरे मुझे अपनी सामग्री बढ़ानी पड़ी, किंतु अंत में सामग्री इतनी हो गई कि विशेषांक में पूरी न जा सकी। वह पूरी सामग्री कुछ अतिरिक्त लेखों के साथ प्रस्तुत पुस्तक के रूप में प्रकाशित की जा रही है।  -भोलानाथ तिवारी
  • Ek Na Ek Din
    Rajni Gupt
    600 510

    Item Code: #KGP-220

    Availability: In stock


  • Bhartiya Sahitya Siddhant
    Dr. Tarak Nath Bali
    250 225

    Item Code: #KGP-9120

    Availability: In stock

    भारतीय साहित्य सिद्धांत
    हिंदी समीक्षा का आरंभ दो धाराओं के रूप में हुआ। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भारतीय साहित्य सिद्धांतों में से सहृदय की अनुभूति रस को केंद्रीय प्रतिमान के रूप में स्वीकार किया और उसी के अंतर्गत कुछ पाश्चात्य समीक्षा सिद्धांतों को समाविष्ट करने का प्रयास किया। दूसरी ओर बाबू श्यामसुन्दर दास ने पाश्चात्य समीक्षा सिद्धांतों को ही हिंदी साहित्य में आवश्यकतानुसार प्रस्तुत किया। सैद्धांतिक स्तर पर ये दोनों धाराएं आज तक हिंदी आलोचना में लक्षित होती हैं। आश्चर्य की बात है कि विविध सिद्धांतों के बीच के अंतःसंबंधों के विश्लेषण की ओर हिंदी आलोचकों का विशेष ध्यान नहीं गया। एक ओर तो भारतीय साहित्य सिद्धांतों मं से चार सिद्धांतों-अलंकार, सिद्धांत, रीति सिद्धांत, ध्वनि सिद्धांत और वक्रोक्ति सिद्धांत का संबंध प्रधान रूप से काव्य-भाषा तथा गौण रूप से काव्यवस्तु के गंभीर विश्लेषण से है तथा इन सिद्धांतों के अंतःसंबंधों के विवेचन की अपेक्षा आज भी बनी हुई है। दार्शनिक व्याख्या के कारण रस सिद्धांत प्रधान रूप से सहृदय की अनुभूति में ही केंद्रित हो गया जब कि वह वस्तुतः विभावादि के रूप में काव्य वस्तु, काव्य भाषा तथा अभिनय को अपने में समेटे हुए हैं। उधर पश्चिम में भाषा केंद्रित सिद्धांतों-शैली विज्ञान, नई समीक्षा तथा विखंडनवाद आदि को हिंदी समीक्षकों ने स्वीकार किया किंतु संभवतः संस्कृत के काव्यभाषा के सिद्धांतों के गंभीर ज्ञान के अभावत के कारण भारतीय तथा इन नवीन पाश्चात्य सिद्धांतों की तुलनात्मक समीक्षा और मूल्यांकन की ओर उनका ध्यान नहीं गया जबकि पंडितराज जगन्नाथ ने सत्राहवीं शती में ही काव्य को शाब्दिक रचना कहा था। प्रस्तुत पुस्तक इन विविध काव्य सिद्धांतों के अंतःसंबंधों और भारतीय काव्य सिद्धांतों की आधुनिक प्रासंगिकता के विश्लेषण की दृष्टि से प्रथम व्यापक प्रयास है जिसमें भारतीय साहित्य सिद्धांतों के विविध पक्षों का विवेचन है जिसके अंतर्गत प्रसंगानुसार उनकी आधुनिक प्रासंगिकता को भी रेखांकित किया गया है। इस सैद्धांतिक एंव व्यापक विवेचन को आधुनिक हिंदी कविता के उदाहरणों से स्पष्ट करने की कोशिश भी की गई है। आशा है इस प्रथम प्रयास में व्यक्त विविध स्थापनाओं एवं संकेतों को आगे विकसित करने के कार्य की ओर विद्वानों का ध्यान जाएगा। 
  • Bheer Mein Akela
    Vishv Nath Gupta
    35 32

    Item Code: #KGP-1917

    Availability: In stock

    भीड़ में अकेला
    गाँव से पलायन करके शहर में आने वाला आदमी अपने गम के सागर में इस तरह डूब जाता है कि उससे बाहर निकलने की कोई राह उसे नजर नहीं आती । शहर में नया होने के कारण शुरू-शुरू में उसे भ्रम होता है । जल्दी ही उसका वह भ्रम टूट जाता है । जब वह शहर की भीड़ में गुम होता है तो उसे अहसास होता है कि उसका अस्तित्व वहाँ पर वैसा ही है जैसा समुद्र में एक लहर का । अपने दिल की बात वह किसी से कहना चाहता है, लेकिन उसे सुनने की किसी को फुर्सत ही नहीं है । उसे अपनी जिन्दगी ज़हर- सी लगती है ।  उसका मन उडने के लिए छटपटाता है, लेकिन एक परले परिन्दे की तरह वह कहीं उड़ नहीं सकता । बेबस-सा, असहायता झेलता रहता है वह उस गम की जिन्दगी को और पीता रहता है उसके जहर को ।
    गाँव के आदमी की इसी त्रासदी को रूपायित किया है कवि विश्वनाथ गुप्त ने अपनी गज़लों में, जो सीधे-सादे शब्दों में, बिना किसी लाग-लपेट के उसकी दास्तां बया करती है ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rita Shukla
    Rita Shukla
    350 280

    Item Code: #KGP-657

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार ऋता शुक्ल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'प्रतीक्षा', 'छुटकारा', 'देस बिराना', 'विकल्प', 'जीवितोअस्मि…!', 'रामो गति देहु सुमति...', 'निष्कृति', 'सलीब पर चढे सूरज का सच', 'उबिठा बनाम उभयनिष्ठा...' तथा 'हबे, प्रभात हबे' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखिका ऋता शुक्ल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kavi Ne Kaha : Uday Prakash_120 (Paperback)
    Uday Prakash
    120

    Item Code: #KGP-226

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : उदय प्रकाश
    सादगी उदय प्रकाश की कविताओं की जान है जो हर उस आदमी से तुरंत रिश्ता कायम कर लेती है जो सामाजिक अन्याय और शोषण की मार उन लोगों के बीच बैठा सह रहा है, जिनके पास आंदोलन और नारे नहीं हैं, सिर्फ खाली अकेले न होने का अहसास भर है... । . . .ये कविताएँ पाठक की संवेदना में बहुत कुछ ऐसा तोड़फोड़ कर जाती हैं, जिनके सहारे वह फिर कुछ नया रचने की ज़रूरत महसूस करने लगता है । किसी भी यातना को कवि बिना उस यातना से मानसिक रुप से गुज़रे हुए प्रेषित नहीं कर सकता । उदय प्रकाश की कविताएँ काफी कुछ इसकी दुर्लभ मिसाल है । -सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 
    कविताओं में उदय प्रकाश की एक और कलात्मक विशेषता गौरतलब है । वे एक ओर वर्तमान के अलग-अलग संदर्भों और  स्थितियों को लेते हैं, पृथक और विच्छिन्न दुनियाओं को साथ-साथ रख देते हैं, ये पिघलकर एक इकाई बन जाते हैं । इनके 'फ्यूजन' से एक समग्र समय बनता है हम इन पृथक और विभिन्न दिखते संदर्भों और स्थितियों के भीतर की तारतम्यता तक पहुंचते हैं। यहीं कविता का अभीष्ट है। कुछ कविताओं में उदय प्रकाश ने बीज से वृक्ष बनने तक की पूरी प्रक्रिया को उलट दिया है । जैसे कोई विपरीत दिशा में चलती फ़िल्म हो । यह एक रचनाकार का नियति के क्रम में हस्तक्षेप है । -विजय कुमार 
    क्यों ऐसा नहीं हुआ कि उदय प्रकाश की कविताओं में छिपे उनके कथाकार और उनकी कहानियों में छिपी कविता पर सतर्क पाठको का ध्यान जाता और मूल्यांकन की कोई और नई समावेशी पद्धति जन्म लेती ! जिस जादुई यथार्थवाद के लिए …. उदय प्रकाश की कहानियों अनेकार्थी जान पड़ती हैं और एक से अधिक पाठ के लिए पाठकों को उत्युक बनाती हैं उससे मिलती-जुलती अपरिचयीकरण (डिफेमिलियराइजेशन) सरीखी काव्ययुक्ति का इस्तेमाल करके ही उनकी कविताएँ अधिक सार्थक बन सकी हैं । -परमानंद श्रीवास्तव
  • Million Dollar Not Tatha Anya Kahaniyan (Paperback)
    Malti Joshi
    60

    Item Code: #KGP-1419

    Availability: In stock

    मिलियन डॉलर नोट तथा अन्य कहानियां
    अम्मा ने जैसे ही पाउच आगे बढाया, मीनू ने एक झटके से हाथ हटा लिया, जैसे उसे बिजली का करंट लग गया हो, "नहीं अम्मा । अब मैं यह हार नहीं लूंगी ।"
    "क्यों? मेरी चीज है । मैं दे रही हूँ।"
    "हाँ, पर इस हार को लेकर तुम पता नहीं क्या-क्या सोच गई थीं। तुमने तो भाभी को भी कठघरे में खडा कर दिया था । कल को भाभी भी ऐसा कर सकती है । भाभी तो यही सोचेगी कि यह चीज तीन साल पाले ही तुमने मुझे दे दी होगी और किसी को बताया तक नहीं । वह तो सोचेंगी कि इस तरह तुमने और भी बहुत कुछ दिया होगा, जिसका उसे पता नहीं है । मैं तो शर्म के मारे भैया के सामने खडी भी न हो सकूंगी।  "
    "इसमें शर्म की क्या बात है ! क्या मुझे इतना भी हक नहीं है ?”
    "अम्मा, तुम्हारे हक से भी महत्त्वपूर्ण है भैया-भाभी का विश्वास, जो मैं तोड़ना नहीं चाहती । रिश्ते नाजुक होते हैं अम्मा, दर्पण की तरह । एक बार दरक गए तो किसी मतलब के नहीं रहते । और मैं इन रिश्तों को सहेजना चाहती हूँ। मैं चाहती हूं कि तुम्हारे जाने के बाद भी इस घर में मेरा दाना-पानी बना रहे । मैं जब-जब भारत आऊं, इस घर के दरवाजे मुझे खुले मिले ताकि मैं तुम्हारी यादों को फिर से जी सकूं । कल को मेरे बच्चों की शादियां हों तो मैं हक के साथ भात मांगने आ सकूं । ये मेरे पीहर की देहरी है अम्मा । मेरे लिए किसी भी हार से ज्यादा कीमती है । प्लीज, इसे मुझसे मत छीनो ।" और यह बात कहते- कहते मीनू का गला भर आया । आंखें छलछला आईं ।
    अम्मा ने आगे बढ़कर उसे गले से लगा लिया और उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए बोली, "अरे वाह, मेरी लाडो तो मुझसे भी ज्यादा समझदार हो गई है ।" और यह कहते हुए उनकी भी आवाज भीग गई थी। 
    -(इसी संग्रह की कहानी 'चंद्रहार' से)
  • Kavi Ne Kaha : Madan Kashyap (Paperback)
    Madan Kashyap
    80

    Item Code: #KGP-1277

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : मदन कश्यप
    'मदन कश्यप सिर्फ लोक-जीवन की मासूम लगती सतह पर ही नहीँ रहते, उसमें पैठत्ते हैं, उसकी नई जड़ों तक जाते है और शायद यही वजह है कि कई कविताओं में जनता की बोली-बानी के नए शब्द, नई अभिव्यक्तियाँ हिंदी की काव्यभाषा को दे जाते है ।‘
    'बोली से लाए गए 'फाव' और 'मतसुन' जैसे शब्द हों या बहेलियों का पेशागत शब्द 'कुरूज' -इन सबके द्वारा कवि अपने अनुभव और भाषा-दोनों के विस्तार की सूचना देता है और इस तरह अपने पूरे काव्य-बोध को अधिक विश्वसनीय बनाता है । इस कवि का अपना एक देशी चेहरा है, जिसे अलग से देखा और पहचाना जा सकता है ।'
    'उनका मानसिक क्षितिज कितना विस्तृत है यह उनकी कविताओं से जाना जा सकता है । एक खास  बात यह कि मदन कश्यप के पास राजनीति से लेकर विज्ञान तक की गहरी जानकारी है, जिसका वे अपनी कविताओं में बहुत सृज़नात्मक उपयोग करते हैं ।'
    'बदलते समय-सन्दर्भ को पकड़ने और उसे व्याख्यायित करने में मदन कश्यप को महारत हासिल है ।'
  • Mere Saakshatkaar : Ramnika Gupta
    Ramnika Gupta
    240 216

    Item Code: #KGP-623

    Availability: In stock


  • Sant Ravidas Ki Ramkahani
    Devendra Deepak
    250 225

    Item Code: #KGP-732

    Availability: In stock

    'संत रविदास की रामकहानी' कवि देवेन्द्र दीपक की संत  रविदास के जीवन-दर्शन पर अपने किस्म की प्रथम औपन्यासिक रचना है । इसमें सृजन और अध्यात्प चेतना के आस्थाशील आयाम उदघाटित हुए हैं । लेखक ने रविदास के अंतत् से उतरने, उसके चिंतन के मर्म को उकेरने का सफल प्रयास किया है । इसमें संत के मन-आत्म की पारदर्शी निर्मलता तथा हाथ के श्रम के प्रति गहरी आस्था भी व्यक्त  हुई है । अपने समाज के श्रमशील उज्जवल समुदाय को दलित बना दिए जाने की पीडा के साथ भारतीय मूल्यों की पड़ताल करते हुए सामाजिक न्याय, समता, संवेदना की हितैषी स्थापनाएँ भी हुई है ।
    संत रविदास की वाणी से पौराणिक आख्यानों, भक्ति-ज्ञान-कर्म के योग विषयक विचारों, लोक में व्याप्त पारंपरिक इनके रंरा-रूपों को यथावश्यक प्रयुक्त करके देवेन्द्र दीपक ने एक बड़े अभाव की पूर्ति कर बड़ा काम किया है । भारतभूमि पर बहने वाली पुण्य-सलिला नदियों-गंगा, यमुना, सरस्वती को मानव शरीर से कार्यशील-इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना से जोड़कर योग-अध्यात्म को तथा राष्ट्रीयता के चिंतन-दर्शन को पुष्ट किया है ।
    वसुधैव कुटुंबकम के वैश्विक विचार को रविदास की समूची वाणी में लक्षित-रेखांकित कर भारतीय अस्मिता एवं लोक-आस्था के प्रति छीजती निष्ठा को पुनः सृजनात्मक आधार प्रदान किया है तो जात-पांत, ऊँच-नीच के सामाजिक संताप को मन और मनोरथ की स्पंदनशीलता, सुचिता, मानवीयता के समक्ष व्यर्थ एवं अमानवीय सिद्ध किया है । भारतीय समाज में फैले धार्मिक पाखंड को निरस्त करती एवं रविदास के ब्रह्मांड व्यापी राम तथा गुरु रामानंद की देशना को रूपायित करती यह रचना अपने काव्यात्मक ललित गद्य के कारण आकर्ष और पठनीय है ।
  • Tan Man
    Shivram Karant
    100 90

    Item Code: #KGP-2086

    Availability: In stock

    भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता शिवराम कारंत का अत्यन्त लोकप्रिय उपन्यास 'तन मन' कन्नड़ साहित्य की अनुपम कृति है ।
    चिरन्तन काल से विवाहेतर स्त्री-पुरुष सम्बन्ध विषयक प्रवृत्ति ने 'विश्व के सबसे पुराने पेशे' को जन्म दिया । यह पेशा आज भी जीवित है । पुरुष ने नारी को शब्दों में जितने सम्मान का नाटक रचा है, अपनी प्रवृति से उसे निरीह और भोग्य ही रखा है । कल की देवदासी और आज की मॉडल या सुन्दरियों का चुनाव क्या है ? इसी जीवन्त समस्या को लेखक ने काफी गहरे उतरकर अपने अनुपम शिल्प में बाँधा है । इसमें एक ही प्रधन-स्वर बार- बार ध्वनित होता है—आखिर यह कबतक, आखिर यह कब तक...?
  • Man Ki Baat
    Acharya Janki Vallabh Shastri
    220 198

    Item Code: #KGP-724

    Availability: In stock

    मन की बात आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री के निबंधों का संग्रह है, जिसे उन्होंने सहज भाव से ‘ललित निबंध’ कहा है। यद्यपि आलोचनात्मक एवं वैयक्तिक निबंधों के इस संग्रह में कई भाव-भूमियाँ हैं। शास्त्री जी अपने निबंधों में विधा की बंदिशों को स्वीकार नहीं करते, जिसकी अपेक्षा पेशेवर निबंध लेखकों से की जाती है। वैदुष्य और लालित्य के  रचनात्मक बिंदु पर खड़े उनके निबंधों का अपना रंग है। यह एक कवि का गद्य तो है ही, एक ऐसे साहित्य मनीषी की मनोभूमि का ललित विस्तार भी है, जो अपना उदाहरण स्वयं है।
    –गोपेश्वर सिंह
  • Hindi Vyakaran : Ek Navin Drishticon
    Kavita Kumar
    550 440

    Item Code: #KGP-65

    Availability: In stock

    यह पुस्तक सामान्य विद्यार्थियों की सामान्य समस्याओं को ध्यान में रखते हुए सम्पूर्ण व्याकरण को छोटी-छोटी इकाइयों-भाषा-ढांचों-में विभाजित करके सुगम, सुबोध एवं सामान्य भाषा में प्रस्तुत करने का एक छोटा-सा प्रयास है। एक शुष्क विषय को रेखाचित्रण द्वारा सजीव व आकर्षक बनाकर, यथासंभव व्याकरणिक पारिभाषिक शब्दावली का कम से कम प्रयोग, आवश्यकतानुसार पुस्तक में स्थान-स्थान पर वर्तनी तथा विराम चिह्नों के प्रयोग संबंधी निर्देश, वाक्य-रचना पर विशेष ध्यान एवं प्रत्येक व्याकरणिक बिंदु पर प्रचुर उदाहरणों सहित प्रस्तुतीकरण इस पुस्तक की विशिष्टता है।
    -कविता कुमार
  • Navjaagran Aur Mahadevi Verma Ka Rachana-Karm Stri-Vimarsh Ke Svar
    Krishna Dutt Paliwal
    445 401

    Item Code: #KGP-624

    Availability: In stock

    नवजागरण और  महादेवी वर्मा का रचना-कर्म स्त्री-विमर्श के स्वर
    महादेवी वर्मा के जन्मशताब्दी वर्ष में यह सोचकर हृदय में  पीडा होती है कि उन जैसी भारतीय स्वाधीनता-आंदोलन की लय से निमग्न कवयित्री के साथ हिंदी-आलोचना के मर्दवाद ने ऐसा सलूक क्यों किया?
    उनके सृजन के नवजागरणवादी  पक्ष को अनदेखा करते हुए 'रहस्यवाद-अध्यात्मवाद' में लपेटकर उसे पूरी तरह छिपा दिया गया । आखिरकार क्यों?
    ऐसा क्यों हुआ कि देश और समाज के लिए किया गया उनका मौन-मुखर विद्रोह पूरी तरह 'विस्मृति' के अंधकार में धकेल दिया गया ?
    आज इस स्थिति पर दूर तक स्त्री-विमर्श की अवधारणाओं से सोचने की ज़रूरत है ।
  • Naya Vidhaan (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    120

    Item Code: #KGP-203

    Availability: In stock


  • Shesh Ant Mein
    Ashwani Kumar Dubey
    275 248

    Item Code: #KGP-2019

    Availability: In stock

    शेष अंत में
    'शेष अंत में' सामाजिक पूष्ट्रभूमि पर आधारित एक यथार्थवादी पारिवारिक उपन्यास है । सन् '42 के 'भारत छोडों’ अन्दोलन से लेकर बीसवीं सदी के अंत तक के समय को शिद्दत के साथ  पकड़ने और उसको जीवंत चित्रण की कोशिश इस उपन्यास में  हम पाते हैं  । बीजापुर गांव के एक संयुक्त परिवार की कथा के माध्यम से  मध्यवर्गीय जीवन के सरोकारों, आदर्शों, विडंबनाओं और परिणतियों से हमारा साक्षात्कार होता है । समकालीन उपन्यास लिखने के दौर में जहाँ एक ओर निम्नवर्गीय जीवन और उसकी आकांक्षाओं पर खूब लिखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर उच्चवर्गीय जीवन के मृत्युबोद्य, काल्पनिक चिंतन और वायवीय क्षणों पर । इसके विपरीत यह उपन्यास इस अर्थ में विशिष्ट है कि मध्यवर्गीय जीवन को उसकी संपूर्ण विशेषताओं एवं असंगतियों के साथ चित्रित करता है । उपन्यास को पढ़ते हुए संयुक्त परिवार की इस विलक्षणता से हम रू-ब-रू होते है, जहाँ घर में छोटे-छोटे सुख भी बड़े लगते हैं और बड़े दुख भी राई जितने छोटे । संयुक्त परिवार के विघटन के बाद नई परेशानियों और स्थितियों का विस्तार हम इस उपन्यास में पाते  जहाँ सन् '42 से 2000 तक के समय और संयुक्त परिवार से अकेले होते परिवार की त्रासदी प्रश्न  बनकर उभरती है कि शताब्दी के अंत तक पहुंचते-पहुँचते हमने क्या पाया, क्या खोया ? 
    बीजापुर गांव के बब्बा जी के चार बेटों में संयुक्त परिवार के कपहैंधार बने गिरधर, उसके अन्य छोटे भाई मदन, श्याम और राधे के साथ गिरधर की पत्नी और भवहों (छोटे भाई की पत्नियां) के चरित्र विश्वसनीय रूप में उभरकर सामन जाते है, लेकिन सथा-नायक गिरधर और उसकी पत्नी के चरित्रांकन में अश्विनीकुमार दुबे को विशेष सफलता हाथ लगी हे। वे इस उपन्यास के यादगार चरित्र बन गए हैं । आर्थिक महत्वाकांक्षाओं और समय की राजनीतिक उथल-पुथल को यह उपन्यास अधिक कारगर ढंग से प्रस्तुत करता है । विकास के नाम पर अंधी दौड़  में टूटते और मिटते भारतीय जीवन-मूल्य हमें सोचने के लिए बाध्य करते  हैं ।
    उपन्यास की रोचक पाठकीयता, घटनाओं की विश्वसनीयता और भाषा की रवानगी से निर्मित हुई है । भाषा की जीवंतता और सजगता उल्लेखनीय है । आंचलिक शब्दों के स्थानीय स्पर्श  में गहराइयां हैं । लेखकीय संवेदना ने इसे एक यादगार उपन्यास बनाया है । -मिथिलेश्वर
  • Nadi Phir Laut Aaee
    Rajjan Trivedi
    90 81

    Item Code: #KGP-2015

    Availability: In stock

    उपन्यास
  • Parakh (Paperback)
    Malti Joshi
    100

    Item Code: #KGP-1371

    Availability: In stock

    परख
    "तुमने अपने बचपन में मुझे एक सपना दिखाया था कि तुम पढ़-लिखकर बड़े आदमी बनोगे, तुम्हारा एक बड़ा-सा बँगला होगा, बँगले में मेरा भी एक कमरा होगा, कमरे से लगी बालकनी में एक झूला पड़ा होगा, उस झूले पर बैठकर मैं तुम्हारे बच्चों को कहानियाँ सुनाऊँगी, उनके लिए स्वेटर बुनूँगी।
    "अब तुम बड़े आदमी बन गए हो। तुम्हारे पास बड़ा-सा बँगला भी है, घर में बाल-गोपाल भी हैं, पर मेरा सपना तो अधूरा ही रह गया न ! अभी तुमने मेरे लिए इतने ठिकाने गिनाए, पर एक बार भी नहीं पूछा कि जिया, मेरे घर रह सकोगी ? देखो, मुझसे जैसा बना, मैंने तुम्हारा बचपन सँवारा था। अब तुम मेरा बुढ़ापा सुधार रहे हो। हिसाब बराबर हो गया।"
    "कैसी बात कर रही हो जिया !" वीरेश आवेश में एकदम उठकर खड़ा हो गया, "कसम ले लो जो आज तक मैंने कभी तुम्हें आया समझा हो।" उसका स्वर एकदम तरल हो आया, "अपनी जन्मदायिनी माँ को तो मैंने बस तस्वीर में ही देखा है। उनकी कोई याद मेरे मन में नहीं है। पर सच कहता हूँ, बाहर रहते हुए जब भी घर की याद आई है, माँ के रूप में तुम्हारी छवि मन में उभरी है। मुझे दुःख है तो इसी बात का कि इस रिश्ते को कोई वैधानिक दर्जा नहीं मिल सका, नहीं तो मैं वृद्धाश्रमों की खाक क्यों छानता ! तुम्हें साधिकार, ससम्मान सीधे अपने घर ले जाता।"
    "यह तुम्हारा वहम है बेटे ! इसे अपने मन से निकाल दो। वैधानिकता रिश्तों को गारंटी नहीं देती, नहीं तो तुम्हारे उस पाँचसितारा वृद्धाश्रम में इतने लोग आकर क्यों बसते !"           
    -[इसी संग्रह की कहानी ‘अनिकेत’ से]

  • Kasturigandh Tatha Anya Kahaniyan
    Poonam Singh
    180 162

    Item Code: #KGP-302

    Availability: In stock

    कस्तूरीगंध तथा अन्य कहानियाँ
    ‘कस्तूरीगंध तथा अन्य कहानियाँ’ पूनम सिंह का दूसरा कहानी-संग्रह है। इस संग्रह की कहानियों में व्यक्ति भी है, परिवार भी और समाज भी। विस्तार, गहराई और संपूर्णता के साथ। इसलिए ये कहानियाँ स्त्री द्वारा रचित होने पर भी सिर्फ स्त्री-समस्याओं तक सीमित नहीं हैं। इनमें स्त्रीवादी लेखन की शक्ति का स्वीकार भी है और उसकी सीमाओं का अतिक्रमण भी। इस तरह हिंदी में हो रहे स्त्री-कथा-लेखन को ये कहानियाँ नया आयाम देती हैं।
    प्रस्तुत संग्रह की कहानियाँ परंपरा और आधुनिकता के द्वंद्व की उपज हैं। इनमें परंपरा के जीवित तत्त्वों का स्वीकार आधुनिकता के दायरे में किया गया है। ‘कस्तूरीगंध’, ‘उससे पूछो सोमनाथ’ तथा ‘पालूशन मानिटरिंग’ जैसी कहानियाँ इस कथन के सर्वोत्तम उदाहरण के रूप में देखी जा सकती हैं। इनमें परंपरा के उस पक्ष का अस्वीकार है, जो आधुनिक सोच के विरुद्ध है। इन कहानियों की आधुनिकता नई जीवन स्थितियों के बेहतर रूप का सृजनधर्मी आयाम है, जिसे कहानी-लेखिका ने सीधे, पर सधे शिल्प में उपलब्ध किया है।
    पूनम सिंह की कथा-चेतना बृहत्तर मानवीय और सामाजिक सरोकारों से आत्मीय जुड़ाव का प्रतिफल है, जिसके कारण उनकी कहानियाँ घर-आँगन और सेक्स के भूगोल तक सीमित नहीं हैं। इसके साथ इनमें सादगी से भरा प्यारा घरेलूपन भी है, जो उनकी निजता के संस्पर्श के साथ आंतरिक लहर-सा मंद-मंद प्रवाहित होता रहता है। उनकी कथा-चेतना सामान्यीकृत होकर अपने समय के साथ है तो विशिष्टीकृत होकर अलग से रेखांकित करने लायक भी है। इसका उदाहरण इस संग्रह की लगभग सभी कहानियाँ प्रस्तुत करती हैं।
    कहा जा सकता है कि ‘कस्तूरीगंध तथा अन्य कहानियाँ’ समकालीन हिंदी कहानी में नए सृजन का सुंदर और श्रेष्ठ उदाहरण है।
  • Utho Annapoorna Saath Chalen
    Usha Mahajan
    100 90

    Item Code: #KGP-9127

    Availability: In stock

    दांपत्य दो समान व्यक्तियों एकीकरण का नाम है। दंपति का संधिविच्छेद करें तो बनता है दम् (घर) $ पति। अर्थात् दोनों ही घर के बराबर के पति हैं। लेकिन कितनी समानता है हमारे समाज में आज भी पति और पत्नी के स्तर में? किस प्रवृत्ति का प्रतीक है सत्तर के दशक से दहेज-हत्याएं कही जाने वाली शादीशुदा औरतों की अप्राकृतिक मौतों का दौर? क्या कारण हैं हिंदू समाज में दांपत्य-संबंधों में बढ़ती दरारों के? जिस समाज मंे स्त्री के लिए पति परमेश्वर के समान माना जाता है, वहीं दिल्ली-मद्रास जैसे महानगरों में डेढ़ से दो हजार कुंवारी लड़कियां हर माह डाॅक्टरों से गर्भपात करवाती हैं, सगे पिता अपनी मासूम बेटियों का यौन-शोषण करते हैं। सेक्स विशेषज्ञों, मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों से मिलंे, तो वे बताते हैं कि पहले पुरुषों के ही अवैध संबंध हुआ करते थे, पर अब औरतें भी उनके मुकाबले में विवाहेत्तर और विवाह-पूर्व संबंध रख रही हैं। अदालतों में जाकर देखें तो अनगिनत दंपति एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते, गाली-गलौज करते और यहां तक कि जूते-चप्पल चलाते भी आपको मिल जाएंगे।
  • Rigveda : Yuvaon Ke Liye
    Dr. Pravesh Saxena
    300 270

    Item Code: #KGP-115

    Availability: In stock

    ऋग्वेद : युवाओं के लिए यहाँ ऋग्वेद के मन्त्रों की व्याख्याएँ उसे सर्वथा नवीन परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत कर रही हैं, जिनसे आज का 'कंप्यूटर-सेवी' युवा किसी भी स्थिति में निरपेक्ष नहीं रह सकेगा । पारंपरिक ज्ञान की अमूल्य धरोहर उसके हाथों में रखने का प्रयास है यह पुस्तक ।
  • Muhim
    Sitesh Alok
    280 252

    Item Code: #KGP-291

    Availability: In stock

    कहानियाँ किसी अन्य अनजान लोक से नहीं आतीं...हमारे बीच, हमारे आसपास ही उपजती और पनपती रहती हैं...किंतु कोई साहित्यकार ही अपनी पारखी दृष्टि से चुनकर और संवेदना से सँवारकर उन्हें शब्दों के संसार में स्थापित करता है। 
    बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ. सीतेश आलोक ने गत तीन दशकों में साहित्य की अनेकानेक विधओं में अपने अवदान द्वारा एक विशिष्ट स्थान प्राप्त किया है। उपन्यास, कहानी, कविता, यात्रा-वृत्तांत, व्यंग्य, समसामयिक विषयों पर लेख आदि पर लिखी डॉ. आलोक की अनेक पुस्तकों को न केवल पाठकों ने सराहा, कई संस्थाओं ने सम्मान भी प्रदान किया। मौलिकता इनके लेखन की एक विशेषता है। इनके चरित्र एवं कथानक न तो किसी साँचे में ढलकर आते हैं और न किसी वाद से प्रभावित होकर रूपाकार ग्रहण करते हैं।
    डॉ. सीतेश आलोक उन इने-गिने लेखकों में से हैं जिनमें लीक से हटकर अनेक ऐसे विषयों पर भी लिखने का साहस है, जिन्हें अधिकांश लेखक छूने से भी कतराते हैं।
    इस संग्रह की अनेक कहानियाँ वागर्थ, साक्षात्कार, समकालीन भारतीय साहित्य, कथादेश, साहित्य अमृत, नयी धारा आदि में प्रकाशित एवं आकाशवाणी से प्रसारित हो चुकी हैं।
  • Bantadhar
    Nisha Bhargva
    150 135

    Item Code: #KGP-1804

    Availability: In stock

    निशा भार्गव की कविताएँ गहरे मानवीय सरोकारों का प्रतिनिधित्व करती हैं । गम्भीरता से, सपाट भाव से किसी बात या संदेश को व्यक्त कर देना शायद हमें आसान लगे लेकिन हास्य-व्यंग्य के माध्यम से 'सर्व' को अभिव्यक्ति 'स्व' से आसान नहीं । यहीं निशा भार्गव अपनी कविताओं की भाषा-शैली और प्रवृति से भीड में अपना अलग स्थान बनाती हैं । उनकी अपनी खास शैली है जो अन्यत्र दिखाई नहीं पड़ती । छंदमुक्त, इन कविताओं में एक प्रवाह होता है, गीत जैसी लयात्मकता होती है। यथा -
    "सड़क पर चक्का जाम हो गया
    ये अंजाम बहुत आम हो गया
    मीडिया भगवान हो गया
    देश का कर्णधार हो गया ।" 
    निशा भार्गव की कविताएँ सामाजिक मुददों को जीवंतता से उठाती हैं, समाधान ढूंढती हैं, व्यवस्था पर प्रहार करती हैं, लाचारी पर हँसती हैं, समाधान का मार्ग भी प्रशस्त करती हैं । यथा -
    "मँहगाई ने सबका दिल तोडा
    घर-घर का बजट मरोड़ा
    फिर सबको दी सीख
    छोडो ये शिकायत ये खीझ
    समस्या का समाधान करना सीखो
    बिन बात यूँ ही मत खीझो ।"
    इसी तरह 'बंटाधार' कविता वर्तमान सामाजिक, राजनैतिक व्यवस्थाओं पर जमकर प्रहार करती है । 'बंटाधार' ही क्यों संग्रह को अन्य कविताओं में भी अलग-अलग प्रसंग हैं, व्यंग्य की अनूठी छटा हैं । ये कविताएँ मन को लम्बे समय तक गुदगुदाने के साथ-साथ कुछ सोचने पर भी बाध्य करती हैं ।
    —डा. अमर नाथ 'अमर'
  • Baat Meri Kavita
    Trilochan
    325 293

    Item Code: #KGP-1907

    Availability: In stock

    बात मेरी कविता
    त्रिलोचन भले बोलते न दिख रहे हों, उनकी कविता बोल रही है और बोलती रहेगी--इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता।
    ऐसे सैकड़ों शब्द हैं, जिनका आधुनिक कविता में प्रयोग त्रिलोचन के अलावा किसी ने नहीं किया। हिंदी कविता इसलिए भी उनके प्रति हमेशा कृतज्ञ रहेगी कि एक ऐसे युग में, जिसमें कविता की शब्द-संपदा लगातार घटती गई है, वह उन बिरलों में से थे, जो इस संपदा में कुछ नया बराबर जोड़ते रहे और इस तरह हिंदी की प्राणधारा को पूर्णतया बनाए रखने की चेष्टा की।
    यह निरी भाषिक विविधता का मामला नहीं है। यह विविधता आती ही है जीवन की उस सहज विपुलता से, जिसके त्रिलोचन एक लगभग ज़िद्दी कवि हैं।
    --अशोक वाजपेयी
    ० 
    त्रिलोचन की कविता में आवेगों की रास तनी रहती है। वह उसे उन्मुक्त नहीं छोड़ते। कविता का स्वर सधा हुआ है। पिच बहुत ऊपर-नीचे नहीं जाता। रोमैंटिक कविता से बने पाठकीय संस्कार के साथ त्रिलोचन की कविता के करीब आना इसलिए कई बार बहुत कठिन होता है। उसे पढ़ने के लिए एक अभ्यास और कविता का एक अलग संस्कार चाहिए। उसमें एक क्लासिकीय काव्य-संयम है। --राजेश जोशी
  • Safar Baavajood
    Sidhesh
    140 126

    Item Code: #KGP-1947

    Availability: In stock

    सफर बावजूद
    सिद्धेश की कहानियाँ कहानी-आंदोलन के उस दौर की उपज  हैं, जब कहानी में कलावाद की यथार्थवाद का संघर्ष चल रहा था । गुटबाजी, शिबिरबद्धता चरम पर थी । सिद्धेश  को यह शोर-शराबा पसंद न था । वे मौन भाव से सृजनरत थे । तटस्थ बने रहने का खामियाजा यद्यपि उन्हें भुगतना पडा । उनकी कहानियां फॉर्मूलाबद्ध लेखन तथा किताबी नुस्खों से मुक्त हैं । सिद्धेश ने कहानियों में शिल्पगत चमत्कार, भाषा की पच्चीकारी की जगह सहजता को महत्त्व दिया है । वे मुख्यत: नागर-मानसिकता के कहानीकार हैं, पर उनकी कहानियां सामाजिक सरोकारों से प्रतिबद्ध हैं।
    संग्रह की इन कहानियों से विषयवस्तु की विविधता के साथ ही मानवीय दृष्टि और संवेदना का विस्तार है । ये कहानियाँ अपने समय और परिवेश के स्पंदनों को पहचानने की कोशिश करती हैं । मानव-मन की सूक्ष्म परख की कला  में माहिर हैं सिद्धेश । वे विचारधारा से अधिक मनुष्य और उसकी संवेदनाओं को महत्व देते हैं। उनके अनुसार, "संवेदना के स्रोत में बहने के लिए अपने चारों तरफ के परिवेश, चरित्रों और घटनाओं के प्रति सजग दृष्टि रखनी पडती है ।" सृजन को सिद्धेश 'जीने के मकसद' से जोड़कर देखते  । संघर्षों, अभावों से जूझते हुए ही उन्होंने अपनी रचना-दृष्टि अजित की है।
    सहजता और सार्वज़निकता इन कहानियों का वैशिष्ट्य है। कहानी का रूप-गठन और रचना-विधान कुछ इस तरह है कि आधुनिक नागरिक जीवन के अनेक अनछुए तथा मार्मिक प्रसंगों का मनोवैज्ञानिक चित्रण बिना किसी अतिरंजना के यहाँ चित्रित हुआ है ।
  • Maansik Svasthya Aur Manahchikitsa
    Asha Rani Vhora
    160 144

    Item Code: #KGP-1095

    Availability: In stock

    मानसिक स्वास्थ्य और मन:चिकित्सा 
    विसंगतियों और विद्रूपताओं, भागदौड़ और आपाधापी के संघर्ष और तनाव के माहौल में व्यक्ति या तो भीड़ का अंग होकर रह गया है या फिर आत्मकेंद्रित हो अकेले जूझने के लिए विवश हो गया है । आज लगभग हर व्यक्ति को अपना मानसिक संतुलन कायम रखने में कठिनाई आ रही है । यही संतुलन अधिक गडबडा जाने पर वह अनेक मानसिक आधियों-व्याधियों से घिरने लगता है । अधियां, यानी मानसिक समस्याएँ और व्याधियां, यानी मानसिक रोग । लेकिन दूर मानसिक रोग पागलपन नहीं होता, न ही लाइलाज, जबकि हमारे समाज में फैली अनेक भ्रांतियों के कारण एक ओर लोग सामान्य मानसिक रोगों को भूत-प्रेत-बाधा मान लेते हैं और झाढ़-फूँक के चक्कर में बिना इलाज रोग को और बढा लेते हैं, दूसरी और मामूली मानसिक समस्या के समाधान के लिए भी मानसिक विशेषज्ञ के पास जाने पर व्यक्ति को संदेह की वृष्टि से देखा जाने लगता है । एक स्वस्थ समाज की रचना के लिए पहले व्यक्तियों का मानसिक स्वास्थ्य ठीक होना चाहिए । अत: मानसिक स्वास्थ्य व्यक्ति, समाज, राष्ट्र, सभी स्तरों पर अपेक्षित है । इसी अपेक्षा, आकांक्षा, आवश्यकता-पूर्ति की दिशा में एक सदप्रयास है प्रस्तुत पुस्तक ।

  • Shyamji Krishna Verma : Jeevan Darshan (Paperback)
    Mukesh Parmar
    90

    Item Code: #KGP-1272

    Availability: In stock

    भारतभूमि पर बलिदानी क्रांतिकारियों की संख्या असंख्य है किंतु विदेश में जाकर भारत की स्वाधीनता के लिए संग्राम करने वालों में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस और महात्मा गांधी का नाम अग्रिम पंक्ति में लिखा जाता है। इसी क्रम में श्यामजी कृष्ण वर्मा का नाम भी उल्लेखनीय है। विचारों की भिन्नता और कार्यशैली में अंतर अवश्य हो सकता है किंतु नेताजी और श्यामजी कृष्ण वर्मा की परिस्थितियों और कार्यशैली में ज्यादा अंतर नहीं है। श्यामजी ने देश-विदेश में अपनी कार्यकुशलता, संगठनशक्ति और भारतीय स्वाधीनता का जो शंखनाद किया उसने भारत सहित समूचे यूरोप और विशेषकर ब्रिटिश साम्राज्य को कंपित कर दिया। ऐसी क्रांति के युद्धवीरों में श्यामजी कृष्ण वर्मा का नाम अग्रिम पंक्ति में रेखांकित करने योग्य है। 
  • Aacharya Hazari Prasad Dwivedi : Kuchh Sansmaran
    Kamal Kishore Goyenka
    500 450

    Item Code: #KGP-1571

    Availability: In stock

    हजारीप्रसाद द्विवेदी वस्तुत: हिंदी भाषा और साहित्य के आचार्य थे। पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, संस्कृत, हिंदी और बांग्ला आदि भाषाओँ के तलस्पर्शी ज्ञान ने उनके चिंतन व सृजन को विलक्षण आयाम प्रदान किए। शातिनिकेतन से शिवालिक के बीच विस्तृत आचार्य द्विवेदी को कीर्तिकथा हिंदी का गौरव है। आचार्य द्विवेदी के जीवन और कृतित्व पर प्रभूत मात्रा में लिखा गया है। उन्हें आकाज्ञाधर्मी गुरु और व्योमकेश दरवेश कहकर सखोंधित किया गया। 'आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी : कुछ संस्मरण' इस संदर्भ में एक स्थायी महत्व की पुस्तक है। आचार्य द्विवेदी पर विख्यात व्यक्तित्वों द्वारा लिखे गए महत्वपूर्ण संस्माणों की इस पुस्तक का संपादन सुप्रसिद्ध साहित्यकार कमलकिशोर गोयनका ने किया है। पुस्तक को भूमिका में वे लिखते हैं, 'आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की किसी लेखक द्वारा जीवनी लिखने या उनके जीवन को जानने को जिज्ञासा जब भी पाठकों के मन में उत्पन्न होगी तब-तब ये संस्मरण उसे आत्मीय-जीवत एवं सार्थक प्रतीत होने के साथ उनको स्मृति को अक्षुष्ण बनाने में सहायक सिद्ध होगे।'
    इस पुस्तक को विशेषता यह है कि द्विवेदी जी का संस्परणात्मक मूल्याकन प्राय: सभी पक्षों से किया गया है। इस अर्थ में इसे आलोचना की आंख से भी पढा जा सकता है। समग्रत: एक विराट व्यक्तित्व और उसके कालजयी कृतित्व का समवेत संस्मरणात्मक अनुशीलन। पठनीय व संग्रहणीय पुस्तक ।
  • 20-Best Stories From China
    Prashant Kaushik
    295 266

    Item Code: #KGP-9312

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. Chinese short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.

    With stories like Taoist Novice, Chang And Cheng, Supernatural Wife, Taoist Priest, Man Thrown In A Well, Rat Wife, this book is a compilation of 20 famous Chinese short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from China.
  • Haasya-Vinod Kavya Kosh
    Prem Kishore Patakha
    500 450

    Item Code: #KGP-1810

    Availability: In stock

    हास्य-विनोद काव्य कोश
    हास्य-व्यंग्य काव्य में अभिरुचि रखने वाले काव्य-प्रेमियों, शोधार्थियों हेतु यथेष्ट सामग्री संयोजित है इस 'हास्य-विनोद काव्य कोश' में । 
    आज के आपाधापी के युग में मानसिक तनाव, द्वेष, द्वंद्व और अतृप्त आकांक्षाओं से पीडित लोगों को क्षण भर के लिए हँसने-मुस्कराने का एक सार्थक प्रयास ।
    इन रचनाओं में हास्य भी है और सामाजिक समस्याओँ पर आधारित प्तार्थक कचोटते व्यंग्य भी ।
    पिछले दशक से आज़ तक के जाने-अनजाने, पहचाने-पुराने हास्य-व्यंग्य के सौ से अधिक कवियों का संक्षिप्त परिचय और उनकी चुनिंदा रचनाओं का एक यादगार गुदगुदाता गुलदस्ता ।
  • Hansi Oth Per Aankhen Nam Hain
    Ramdarash Mishra
    75 68

    Item Code: #KGP-9039

    Availability: In stock

    मेरी समग्र ग़ज़लें यहाँ रचना-तिथि के क्रम से दी जा रही है । शुरू की ग़ज़लों पर मैंने रचना-तिथि नहीं लिखी थी अत: यहाँ अनुमान से उनके रचना-वर्ष का उल्लेख कर दिया गया है । कुछ पूर्व प्रकाशित ग़ज़लों को रूप की दृष्टि से फिर तराशा है ।
    ये ग़ज़लें शास्त्रीय दृष्टि से कैसी है यह तो ग़ज़ल-शास्त्री ही जाने किन्तु मुझे विश्वास है कि कविता के पाठकों को इनमें कविता जरूर मिलेगी । मुझे इनके द्वारा अपने अनुभवों को व्यक्त करने में एक अलग तरह की तृप्ति मिली है । मेरी तृप्ति यदि पाठकों क्रो तृप्ति बन सकेगी तो अधिक सार्थक होगी ।
  • Toba Teksingh Tatha Anya Kahaniyan
    Saadat Hasan Manto
    180 162

    Item Code: #KGP-1941

    Availability: In stock


  • Samkalin Sahitya Samachar August, 2017
    Sushil Sidharth
    0

    Item Code: #August, 2017

    Availability: In stock

  • Jahaan Charan Pare Raghuvar Ke (Ram-janki Marg : Ek Smriti Yaatra)
    Rajesh Tripathi
    450 405

    Item Code: #KGP-473

    Availability: In stock

    ... मगर उस राह पर चलने को मन मचल उठा, जिस राह पर प्रभु राम और मां जानकी के पवित्र चरण पड़ने की किंवदंती प्रचलित है । …और एक बार जो पांव बढ़े प्रभु की राह में तो प्रभु की मौजूदगी के चिह्न तो मिलते ही गए बल्कि ऐसे भी चिह्न मिले जो इस बात के सबूत थे कि यह यकीनन 'देवपथ' है क्योंकि समकालीन तथ्य तो किंवदंतियों में है परंतु ऐतिहासिक, पौराणिक, स्वातंत्र्य  वीरों से जुड़ी वीरगाथाओं और आध्यात्मिक घटनाओं की ऐसी श्रृंखला मिलती चली गई जो इस पथ को और महान बनाती गई और यकीन दिलाने लगी बाद के कालखंडों में इस पथ पर घटी गवाही देती घटनाएं कि यकीनन प्रभु इस राह से गुज़रे होंगे ।
    इस 'स्मृति-यात्रा' में कई ऐसे तथ्य आपको मिलेंगे जो जनश्रुतियों, किंवदंतियों और परंपराओं में चली आ रही लोकगीतों-लोकगाथाओं पर आधारित हैं कई ऐसे भी तथ्य हैं जिन पर आगे भी शोध की आवश्यकता होगी । उस यात्रा से जो कुछ मिला और जैसे भी मिला उसे उसी रूप में आपके समक्ष पहुंचा रहा हूँ ।

    -राजेश त्रिपाठी
  • Vipradas
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    300 270

    Item Code: #KGP-852

    Availability: In stock


  • Hilne Lagi Dharti (Stories)
    Shrinivas Vats
    200 180

    Item Code: #KGP-1934

    Availability: In stock

    हिलने लगी धरती
    पंचदेश में शत्रु देश के जासूसों ने विद्रोह करवा दिया । भाट कवि ने राजा नरसिंह के दरबार तक पहुंच बना महामंत्री रुद्रदेव को शक्तिहीन कर दिया। कुछ दिन बाद राज्य में खबर फैल गई कि रुद्रदेव विद्रोहियों के हाथों मारे गए । पर हुआ उलटा । भाट कवि अपनी ही चाल में उलझ गया ।  रुन्द्रदेव तो जिंदा निकले । [गहरी वाला]
    बहेलिये को क्या पता कि जिस पक्षी को उसने पकडा है वह शापित मुनि-कुमार है । बेटे के पैर से परेशान बहेलिये ने देखा, चोंच में जडी-बूटी लिए अनेक पक्षी उसके घर की मुँडेर पर आ बैठे हैं । [बेटे का पैर]
    आलसी हरिया को मिल गए जादुई कुदाल और कुल्हाड़ा । उसने लोगों को डराना शुरू कर दिया । पर मिला क्या ? अपना कुदाल-कुल्हाड़ा ही गँवा बैठा । [मीठे बेर]
    देवपति को कम सुनता था। यह लड़की तुतलाकर बोलती थी। दोनों मिले तो शादी को राजी हो गए। फिर उनकी मुलाकात हुई एक मेंढक से । [मिठाई दो]
    जमींदार के खेत में हल जोतते बेलाराम को पेड़ पर हार मिला । जमींदार ने कहा-“मेरा खेत, मेरा पेड़, अत: हार भी मेरा ।" बेलाराम ने अपनी बात कही तो जमींदार ने अपने कान पकड़ लिए । बोला- "माफ कर दो बेलाराम ।" [घोसले में हार]
    शीतक के बहकावे में आकर माणिक की बेटी सुधा को सब मनहूस समझने लगे । कोई उससे शादी को तैयार न हुआ तो एक पेड़ से उसकी शादी कर दी गई । पर पेड़ पर ऐसा कौन बैठा था, जिससे सारे लोग सुधा के एहसानमंद हो गए ? [घर चलो]
    श्रीनिवास वत्स की ऐसी ही दर्जनों कहानियों को इस पुस्तक से संगृहीत किया गया है । बच्चे तो बच्चे बड़े भी इन्हें पूरा पढ़े  बिना नहीं रह सकेंगे । अनूठे अंदाज, अनूठे ताने-बाने से रची ये रचनाएँ मनोरंजन का खजाना हैं । पढ़कर देखिए तो सही ।
  • Namvar Hone Ka Arth
    Bharat Yayavar
    500 450

    Item Code: #KGP-9012

    Availability: In stock

    नामवर होने का अर्थ
    प्रस्तुत पुस्तक नामवर सिंह के जीवन एवं साहित्य का एक पाश्र्वचित्र या प्रोफाइल है। इसे सही मायनों में ‘जीवनी’ भी नहीं कहा जा सकता। कोशिश यह रही है कि उनके जीवन एवं साहित्य का एक सामान्य परिचय इस पुस्तक के द्वारा प्रस्तुत हो जाए। इस कोशिश में मैं कहाँ तक सफल हुआ हूँ, यह स्वयं नहीं कह सकता। बस निश्चयपूर्वक इतना अवश्य कह सकता हूँ कि उनके जीवन एवं साहित्य को जानने-समझने का यह मेरा विनम्र प्रयास है।
    बात उस समय की है, जब मैं साहित्य की दुनिया में अपनी आँखें खोल रहा था। यह बीसवीं शताब्दी का आठवाँ दशक था और मैं हिंदी साहित्य का विद्यार्थी था। उन्हीं दिनों मैंने नामवर जी की तीन पुस्तकें खरीदीं और पढ़ी थीं-- ‘छायावाद’, ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ’ और ‘कविता के नए प्रतिमान’। इनमें उनकी ‘छायावाद’ पुस्तक मुझे तब बहुत अच्छी लगी थी और आज भी उनकी सभी पुस्तकों में यही मेरी सर्वाधिक प्रिय पुस्तक है। 
    1982 ई. की गर्मियों में मैं दिल्ली गया। उन्हीं दिनों एक दिन मुझसे त्रिलोचन जी ने कहा कि नामवर अपने समय के एक समर्थ कवि थे, उनकी कविताओं को खोजकर पुस्तक-रूप में प्रकाशित कीजिए। इन कविताओं की खोज के साथ-साथ तभी मैंने प्रस्तुत पुस्तक तैयार करने का मन बना लिया था। खोज की एक लंबी प्रक्रिया से गुजरकर यह पुस्तक तैयार की।
    मैं यह भी स्पष्टीकरण कर देना चाहता हूँ कि यह पुस्तक एक सहयोगी प्रयास है। इसमें सबसे ज्यादा नामवर जी की विलुप्त रचनाएँ दी गई हैं। उनसे संबंध रखने वाले लेखकों के संस्मरण एवं पत्रों का भी उपयोग इसमें हुआ है। इस सहयोगी प्रयास में जिन लेखकों के वक्तव्य या कथन का इसमें प्रयोग किया गया है, उनके प्रति मैं आभार स्वीकार करता हूँ।
    -
    भारत यायावर
  • Mere Saakshatkaar : Kedar Nath Singh
    Kedarnath Singh
    250 225

    Item Code: #KGP-2027

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : केदारनाथ सिंह
    कवि केदारनाथ सिंह के साक्षात्कारों की यह किताब कविता के ज़रिए समकालीन जीवन में झाँकने की एक कोशिश है । इनसे गुज़रना अपने समय की बदलती हुई सौंदर्य-चेतना के खुले-अधखुले गलियारों से गुज़रना है । विगत पच्चीस वर्षों के लंबे अंतराल में लिए गए ये इंटरव्यू कवि की विकास-यात्रा को समझने की कुंजी भी देते हैं और उन मोड़ों-घुमावों की प्रामाणिक जानकारी भी, जिनसे होकर उसकी सृजन-यात्रा अविराम चलती रही है । यह एक रचनाकार की विश्व-दुष्टि के बनने और आकार ग्रहण करने की लंबी प्रक्रिया का दस्तावेज़ है-एक ऐसा कच्चा माल, जिसमें समकालीन कविता के इतिहास के रंग-रेशे तलाशे जा सकते हैं ।
    कवि केदारनाथ सिंह की कविताएँ समय के साथ संवाद करती हुई कविताएं हैं। यही वजह है कि उनकी कविताओं में एक तरह की प्रश्नाकुलता दिखाई देती है। ऐसी प्रश्नाकुलता, जो कहीं गहरे पैठकर पाठक को बेचैन करती है। यह देखना भी एक दिलचस्प अनुभव होगा कि अपनी कविताओं में निरंतर प्रश्न उपस्थित करने वाला कवि स्वयं प्रश्नों का सामना कैसे करता है ।
    समकालीन सर्जन-परिवेश में दिलचस्पी रखने वाले पाठकों के लिए एक संग्रहणीय दस्तावेज़ है यह किताब ।
  • Dekho Samjho Karo
    Jagat Ram Arya
    160 144

    Item Code: #KGP-105

    Availability: In stock

    बालकों, अपने चारों ओर की दुनिया को देखो। इसमें भगवान ने हजारों वस्तुएं बनाई हैं-हवा, पानी, सूर्य, पृथ्वी, अग्नि आदि। इनमें से हर एक में सैकड़ों-हजारों शक्तियां भरी पड़ी हैं जिनमें से कुछ एक को हम-तुम जानते हैं। कइयों को हम बिलकुल नहीं जानते। कुछेक को हम थोड़ा-बहुत जानते हैं। अपनी दुनिया के बारे में यह हमारा अधूरा ज्ञान है। इसीलिए हम उन शक्तियों से लाभ नहीं उठा पाते। जैसे किसी निर्धन की खाट के नीचे धरती में सोने-चांदी का खजाना दबा हो, किंतु जिसका उसे पता न हो और वह भूखा नंगा रहकर दिन-रात दुख सहता हो। काश, वह उस छिपे खजाने को जान पाता और उसका प्रयोग करके सुखी बन जाता। इसी प्रकार अपने आसपास की वस्तुओं के बारे में भी हम बहुत कम जानते हें। ओर उसका कम लाभ उठाते हें। उनका पूरा लाभ हम तभी उठा सकते हैं जब उनहें अच्छी तरह जान लें। इस प्रकार वस्तुओं के ‘विशेष ज्ञान’ को ही विद्या कहते हैं।
    आज हम मोटर, हवाई जहाज, राकेट आदि के अजब अनोखे आविष्कार देखते हैं, जो विज्ञान के सहारे ही बनाए गए। बड़े-बड़े आविष्कार करने वाले वैज्ञानिक भी हमारे-तुम्हारे जैसे दो हाथ, दो पांव वाले मनुष्य होते हैं। उनमें केवल तीन विशेष गुण होते हैं। वे हर वस्तु को ध्यान से देखते हैं, गहराई से समझते हैं और हाथ से करके देखते हैं। यदि हम भी विज्ञान पढ़ना चाहते हैं तो हमें भी इनहीं तीन बातों का ध्यान रखना चाहिए-
    1. हम अपने प्रयोग की वस्तुओं को ध्यान से देखें।
    2. हम वस्तुओं में छिपी शक्तियों और गुणों को समझें।
    3. हम उन वस्तुओं के नित्य नए प्रयोग करना सीखें।
    इस पुस्तक में वैज्ञानिकों की सच्ची और रोचक घटनाओं के आधार पर विज्ञान के इन्हीं तीन अंगों पर बल दिया गया है। इनका प्रयोग हर बालक अपने घर और विद्यालय में कर सकता है। 
    —लेखक
  • Bimla
    Jagnnath Prabhakar
    75 68

    Item Code: #KGP-2023

    Availability: In stock

    राजा समरसिंह को उनके दीवान सतीशचन्द्र ने अपने एक विश्वस्त नौकर के उकसाने पर मरवा डाला । उनकी रानी ने उसके विरुद्ध अति भयंकर व्रत धारण किया । वह व्रत क्या था ? इन्द्रनाथ को महाश्वेता की बेटी सरला से प्रेम हो गया, पर ब्याह महाश्वेता का व्रत पूरा हुए बिना नहीं हो सकता था । इस व्रत को पूरा करने के लिये इन्द्रनाथ घर से चल पडा । महेश्वर मन्दिर में एक अद्वितीय सुन्दरी उस पर मोहित हो गयी । सुन्दरी ने अपना नाम भिखारिन बताया ।  उसने एक भिक्षा इन्द्रनाथ से सतीशचन्द्र का वध न करने की माँग ली और सतीशचन्द्र के नौकर को हत्यारा बताया । इन्द्रनाथ मुंगेर पहुँच कर राजा टोडरमल की सेना में भरती हो गया । संध्या समय वह गंगा-तट पर शत्रुओं से लड़ता हुआ बेहोश हो कर गंगा से गिर पड़ा । एक युवक! अपनी नाव से कूदा, उसे उठाकर अपनी नाव में डाल लिया । होश आने पर उसने देखा, इस युवक के भेस में वही भिखारिन थी । उधर दीवान के उसी शबित-सम्पन्न नौकर ने महाश्वेता को सरला सहित चतुर्वेष्ठित दुर्ग में कैद कर लिया था । भिखारिन उन्हें काल कोठरी से निकालकर अपने मकान में ले आयी । इधर टोडरमल ने पठानों के दुर्ग पर हमला किया । गुड़सवार नायक इन्द्रनाथ लड़ाई में घायल व बेहोश होकर गिर पडा । शात्रुओं ने उसे उठा कर दुर्ग में कैद कर लिया । भिखारिन ने वहाँ पहुँच कर उसे दुर्ग से कैसे बाहर भेज दिया और स्वय इन्द्रनाथ बन कर कैद हो गयी ? भेद खुलने पर भिखारिन को मृत्यु दण्ड देने के लिये वृक्ष के साथ बांध दिया गया । परन्तु इन्द्रनाथ ने किस प्रकार उसे बचा लिया ? इतने में दुर्ग पर विजय प्राप्त कर ली गयी ।  इसके बाद सतीशचन्द्र के उसी नौकर ने उन्हें मार डाला । विजेता इन्द्रनाथ अपने वचन के अनुसार निश्चित दिन सरला के पास पहुँच गया ।
    राजा टोडरमल की सभा लगी थी । सतीशचन्द्र का हत्यारा कैदी के रूप में राजा के सामने पेश किया गया । उसे मृत्यु दण्ड सुनाया गया । कैदी ने कहा, "मैं ब्राह्मण हूँ । ब्राह्यण को मृत्यु दण्ड देना शास्त्र-विरुद्ध है । धार्मिक टोडरमल सोच में पड़ गये । इतने में एक निहत्थी महिला तेजी से सभा मण्डल में घुसी और छुरी से सतीशचन्द्र के हत्यारे कैदी की हत्या कर डाली । वह महिला कौन थी और उसने छुरी कैसे प्राप्त कर ली ?
    अपने ब्याह के निश्चित दिन इन्द्रनाथ भिखारिन के पास गया और कहा, "भिखारिन । तुमने मुझे चार बार मौत से बचाया, जिसका बदला मैं चुका नहीं सकता । मेरी प्रार्थना है, तुम मेरे पास पटरानी की तरह रहो । सरला तुम्हारी सेवा करेगी ।" इस प्रकार जाने क्या-क्या स्नेह-भरी बाते कह रहा था, परन्तु वास्तव में भिखारिन वहाँ नहीं थी, था उस का प्राणहीन पार्थिव शरीर । वह इन्द्रनाथ के प्रति शाश्वत प्रेम रखती थी, उसी प्रेम की ज्वाला में वह आत्म- बलिदान कर चुकी थी । हाँ तो यह भिखारिन वास्तव में थी कौन?
    उपर्युक्त समस्त रहस्यमय प्रश्नों के उत्तर विविध रोमांचकारी विवरणों सहित यह पुस्तक प्रस्तुत कर रही है ।
  • Chaucer Ki Amar Kahaniyan
    Vishv Nath Gupta
    140 126

    Item Code: #KGP-322

    Availability: In stock

    प्रस्तुत पुस्तक ‘चैसर की अमर कहानियां’ ज्योफरी चैसर की विश्वप्रसिद्ध और कालजयी कृति ‘द कैंटरब्यूरी टेल्स’ का अनुवाद है। चैसर ने इस पुस्तक की रचना करीब 630 वर्ष पूर्व की थी।
    चैसर ने कहानियों के कुछ पात्र वास्तविक जीवन से भी लिए हैं। इसी तरह तीर्थयात्रियों में कुछ वास्तविक जीवन के लोगों से मेल खाते थे। लंदन की जो सराय तीर्थयात्रियों के रुकने की जगह बनी, एक वास्तविक सराय से प्रेरित थी।
    ‘द कैंटरब्यूरी टेल्स’ की सभी कहानियां रोचक और शिक्षाप्रद हैं। इन कहानियों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कुछ संदेश भी मिलते हैं।
    -विश्वनाथ गुप्त
  • Sushila
    Manorma Jafa
    175 158

    Item Code: #KGP-7810

    Availability: In stock

    सुशीला
    लंदन में बफाँली हवा चल रहीं श्री। सुशीला को इसका अनुमान नहीं था। उनको लन्दन के घर में ले जाने के लिए कुछ सांग उनके स्वागत के लिए खड़े थे। लंदन में चारों तरफ गोरे-गोरे लोग थे और सबके हाथों में छाता था ।
    लंदन की हबा सुशीला को बडी मनभावनी लगी। भविष्य में विलायत की सब यादें उनके साथ सदा बनी रहें इसलिए वह बाजार गई और उन्होंने सबसे पहले एक कैमरा और कैमरे की रील खरीदी। उसी दुकानदार ने उन्हें कैमरे के बारे में भी विस्तार से बताया, साथ ही साथ कैमरे में फोटो खौब्वेनै की रील भी लया दो। बच्चे सुशीला के पथ थे, वह उसी समय लंदन के ट्रफात्नार स्ववायर में गई। ट्रफग्लार स्वचायर के मैदान में अनगिनत कबूतर जाना चुग रहैं थे। सुहावना मौसम था । सुशीला ने अपनी बेटी को उनके बीच में बैठा दिया। सब सामान बेटे को पकड़। दिया और सबसे पहले कबूतरों के बीच में जैसी हूई बिटिया की तस्वीर खंचि ली।
    अगले दिन वह बच्चों को लेकर लंदन के अजायबघर जू) में गई। तरह-तरह के जानवर देखकर बच्चे बडे खुश हुए ।
  • Shirdi Wale Sai Baba
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-275

    Availability: In stock


  • Mohabbat Ka Per
    Priya Anand
    100 90

    Item Code: #KGP-1841

    Availability: In stock

    मोहब्बत का पेड़
    वैसे तो संग्रह की सभी कहानियां प्रेम-कथाएँ ही है, मगर 'मोहब्बत का पेड़' कहानी कई प्रेम-कथाओँ को जीवित कर देती है । इस कहानी में स्त्री का विद्रोही स्वर है, जो मोहब्बत की वकालत करता है और सामंती व्यवस्था को कटघरे में खडा करने की कोशिश करता है । यहाँ गौर करने वाली बात सिर्फ यह है कि जहाँ इस कहानी का अंत होता है, वहीं से एक नई कहानी की शुरुआत होती है । नारी के संघर्ष और यातना की कहानी । यह कहानी प्रिया आनंद की कहानियों का प्रस्थान बिंदु हो सकती है ।...
  • Jyotipunj Himalaya
    Vishnu Prabhakar
    300 270

    Item Code: #KGP-568

    Availability: In stock

    ज्योतिपुंज हिमालय
    किन्हीं के लिए हिमालय प्रणव की भूमि है, किन्हीं के लिए प्रणय की रम्यस्थली, कोई यहाँ प्रेरणा पाता है तो किसी के लिए यह पलायन का स्थान है। ये सब तो मानव की सीमित कल्पना की सीमा-रेखा के रूप हैं। अपने आप में तो यह मूक तपस्वी सौंदर्य और साधना में कोई अंतर नहीं मानता। इसीलिए किसी भी कारण से हो, सर-सरिताओं, वृक्ष-पादपों, पशु- पक्षियों और औषधियों के समान ही मानव को भी उसने सदा शरण दी है। शरण के वे स्थान आज भी वर्ष में आठ मास तक मानवीय क्रीड़ा से गूँजते रहते हैं। उसकी छोटी-छोटी चोटियों पर तो वर्ष-भर बस्तियाँ बसी रहती हैं, परंतु सर्वोच्च शिखरों पर भी मनुष्य के चरण-चिह्न अंकित हो गए हैं। 
    हिमालय आयु की दृष्टि से संभवतः सबसे तरुण गिरिमाला है, परंतु प्राकृतिक सौंदर्य की दृष्टि से कदाचित् यह सर्वोच्च पर्वत संसार में सर्वश्रेष्ठ है।
    इसकी विशिष्टता अर्थात् झीलों और नदियों की प्रमुखता, प्राकृतिक वैभव की संपन्नता, अनुपम सुंदरता और सुषमा के कारण ही न केवल भारतवासी, बल्कि दूसरी जातियों के लोग भी इसे देवताओं का आवासगृह मानते रहे हैं।
    प्रस्तुत पुस्तक में उत्तरकाशी, गंगोत्री, गोमुख और तपोवन की यात्राएँ इसके महत्त्व को और भी बढ़ा देती हैं।
  • Itihaas Ka Vartamaan : Aaj Ke Bouddhik Sarokar-2
    Bhagwan Singh
    500 450

    Item Code: #KGP-9157

    Availability: In stock

    ‘इतिहास का वर्तमान: आज के बौद्धिक सरोकार’ इस विमर्श-व्याकुल समय में तर्क, विवेक, परंपरा, निहितार्थ और रचनात्मक साहस सहेजकर लिखी गई एक अद्भुत पुस्तक है। इसके लेखक भगवान सिंह विभिन्न विधाओं में सक्रिय किंतु इतिहास-विवेचन में सर्वाधिक  ख्यातिप्राप्त सजग मनीषी हैं। उनकी इतिहास-दृष्टि स्पष्ट, प्रमाण पुष्ट और चिंतन संपन्न है। यही कारण है कि जब भगवान सिंह ‘तुमुल कोलाहल समय’ व ‘स्वार्थसिद्ध वाग्युद्ध’ को परखने के लिए विचारों में प्रवेश करते हैं तो चिंतन की एक अलग रूपरेखा तैयार होने लगती है। स्वयं लेखक ने कहा है–
    "मैंने चर्चाओं को शीर्षक तो दिए हैं, परंतु उन विषयों का सम्यव्फ निर्वाह नहीं हुआ है। बातचीत करते हुए आप किसी विषय से बँधकर नहीं रह पाते। बात आरंभ जहाँ से भी हुई हो बीच में कोई संदर्भ, दृष्टांत, प्रसंग आते ही विषय बदल जाता है और आप भूल जाते हैं बात कहाँ से आरंभ हुई थी। याद भी आई तो आप कई बार स्वयं पूछते हैं, ‘हाँ तो मैं क्या कह रहा था?’ गरज कि सुनने वाले को आप क्या कह रहे हैं इसका हिसाब भी रखना चाहिए! परंतु सबसे मार्मिक प्रसंग तो उन विचलनों में ही आते हैं, तभी तो अपना दबाव डालकर वे धरा को ही बदल देते हैं ।"

    आज सच और झूठ के बीच भीषण संघर्ष चल रहा है। भगवान सिंह इसमें अपना पाठ और पक्ष रखते हैं। वे वर्तमान राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक आदि परिस्थितियों से उठ रहे सवालों से मुठभेड़ करते हैं। तात्कालिक घटनाओं को खँगालकर वे कोई जीवन-मूल्य या ऐतिहासिक सत्य सामने रख देते हैं। असहिष्णुता, आजादी, देशभक्ति, भारतमाता की संकल्पना, राजनीति का सांप्रदायिक कारोबार जैसे आयोजित-प्रायोजित प्रश्नों के बीच यह पुस्तक एक प्रकाश स्तंभ है। संवाद की अत्यंत पठनीय शैली में लिखे गए इसके आलेख आमने-सामने बैठकर की जाने वाली बातचीत का सुख भी देते हैं। उस हरेक पाठक के लिए एक अपरिहार्य पुस्तक जो वर्तमान की विशेषताओं और विरूपताओं दोनों को समझना चाहता है। 
  • Kaale Kuyen
    Ajeet Kaur
    225 203

    Item Code: #KGP-18

    Availability: In stock

    काले कुएँ
    इस संग्रह की कहानी 'बाजीगरनी' से-
    वह औरत जो तमाम उम्र एक कसी हुई रस्सी पर बाजीगरनी की तरह अपने बोझ का संतुलन कायम रखने की कोशिश में सारी ताकत और समूची एकाग्रता खर्च करती हुई चलती रही थी, आज ज़मीन पर खडी थी । रस्सी के दोनों सिरे कभी उनके सास-ससुर और खाविंद के दरम्यान तने रहे थे, कभी उनके खाविंद और बच्चों के दरम्यान । बहुत बरसों से एक सिरा भाइया जी के वजूद से बँधा था और दूसरा सिरा बड़े मामा जी के साथ । भाइया जी नहीं रहे तो रस्सी कड़क करके टूट गई । भाभी जी चक्कर खाकर ज़मीन पर आ गिरी । ज़मीन पर खडे होना तो वह भूल ही गई थीं ।  लडखड़ाती, काँपती, चकराती, हिचकोले खाती वह नए सिरे से छोटे बच्चे की तरह ज़मीन पर खडी होना सीखेंगी । शायद छोटे मामा जी का हाथ पकड़कर यह पैर बढाना सीखेंगी । पर फिलहाल तो वह चारों खाने चित गिरी पडी थीं ।
    भाइया जी नहीं रहे, तो बड़े मामा जी भी चले जाएँ-चले जाएँ..
    और उन्होंने दो-दो पुरानी सोने की चूडियों अपने हाथों से उतारी । उठीं और वे चारों चूडियाँ मामा जी के कोट की जेब में डाल दी, "बस, यही है मेरे पास । इसे ले ले और चला जा । पैंशनों वाले चले गए । रोटी खत्म । चूल्हा बुझ गया । तोड़ दिया है मैंने चूल्हा । तोड़ दिया है । तूने सुना ? चूल्हा तोड़ दिया है मैंने । चला जा । ”
    हिंदी और पंजाबी में समान रूप से रचनारत, साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कथाकार की मानव-मन के सच को उकेरती कहानियों का नया संग्रह ।

  • Teen Laghu Upanyas : Mamta Kaliya (Paperback)
    Mamta Kalia
    150

    Item Code: #KGP-211

    Availability: In stock


  • Aadhunik Hindi Kavita_225
    Dr. Hardyal
    225 203

    Item Code: #KGP-888

    Availability: In stock

    आधुनिक हिंदी कविता अनेक दृष्टियों से विशिष्ट कविता है। उसकी विशिष्टता इस बात में है कि उसमें अनुभूति और अभिव्यक्ति से संबंधित इतनी विविधता है जितनी आधुनिक काल से पहले की किसी भी काल की कविता में नहीं रही। उसकी इस विविधता में अंतःसलिला के रूप में ऐसी एकरूपता भी है जो उसे एक स्वतंत्र इकाई बनाती है। उसकी विभिन्न प्रवृत्तियों को विशिष्टता और उसकी समग्र एकरूपता को पकड़ने और रेखांकित करने के अनेक प्रयत्न विभिन्न विद्वानों ने किए हैं। उन्हीं प्रयत्नों की शृंखला में एक प्रयत्न यह पुस्तक है। ‘इस पुस्तक की मुख्य विशेषता यह है कि इसमें भारतेन्दु-युग से लेकर नवें दशक तक की हिंदी कविता की सभी प्रमुख प्रवृत्तियों की क्रमिक चर्चा है। इस कारण कोई चाहे तो इसे आधुनिक हिंदी कविता का प्रवृत्यात्मक इतिहास भी कह सकता है।’ पाठकों को इस पुस्तक में हिंदी के सुख्यात आलोचक डाॅ. हरदयाल की स्पष्ट और निभ्र्रान्त शैली में आधुनिक हिंदी कविता का तटस्थ विवेचन और निष्पक्ष मूल्यांकन मिलेगा। हमारा विश्वास है कि यह पुस्तक पाठकों की बहुत-सी जिज्ञासाओं को शांत करेगी और उन्हें आधुनिक हिंदी कविता के संबंध में नए सिरे से सोचने के लिए प्रेरित करेगी।
  • Pride And Prejudice (Paperback)
    Jane Austen
    125

    Item Code: #KGP-347

    Availability: In stock

    Boy meets girl, Girl meets boy—how boring. 
    Girl hates boy, Boy loves her not—equally boring. 
    Put in some minor love tornadoes, now you are talking. That makes for the romance of the century.
    19th century England is in the midst of love-filled storms! Welcome
    to Meryton and to Elizabeth Bennet, who by the way hates Darcy. And Darcy thinks she is a part of 'Rich Groom Hunters' (at least her mother seems so)! A dozen fights, misunderstandings, and romantic musings later, will pride and prejudice fly out of the ‘English’ window for love to breathe?
    A romance mesh in a 'spoon and fork society' with drama to put Bollywood to shame. Nothing tugs at the heart like love does—and 'Pride and Prejudice' with love stories entangled all over, still tugs at our hearts in this 21st century just as it did way back in the 19th century. Meet the ‘you’ and 'your love story' in this tale of the haughty Darcy and the hotheaded Elizabeth.
    Read Jane Austen as she places life knowledge into an excellent plot to illustrate the negatives of pride and prejudice where relationships are concerned.  
    You will agree—love surely never ages!
  • Suno Manu
    Vishva Mohan Tiwari
    225 203

    Item Code: #KGP-537

    Availability: In stock

    सुनो मनु
    आज का युवा तेज़ी से आगे बढ़ना चाहता है, किंतु अपने माता-पिता या दादा-दादी से उचित सलाह न मिल सकने के कारण उसे शीघ्र ही भोगवादी बाज़ार के दलदल में फँस जाने का खतरा रहता है। 
    एक युवक को ऐसे खतरे से बचाने के लिए एक पिता ने होस्टल में रहने वाले अपने पुत्र को लगातार पत्र लिखे, जिससे न केवल उसे वरन् उसकी मित्रमंडली के समुचित विकास में, उन्हें जीवन में सोच-विचार कर आगे बढ़ने में सहायता मिली। 
    उन पत्रों की सफलता का रहस्य था पुत्रा एवं पिता में मित्रवत् व्यवहार। पिता में एक ओर तो अपनी जड़ों से जुड़े रहने का विवेक है तथा दूसरी ओर आधुनिकता की पर्याप्त समझ है। 
    पत्रों में पुत्र की सामान्य समस्याओं से लेकर जीवन-मूल्य संबंधी प्रश्नों पर आपस में विचार- विमर्श है। 
    इस पुस्तक में युवाओं के लिए वे संदेश हैं, जिनसे उनमें इतनी मानसिक, बौद्धिक, नैतिक शक्ति आ सकेगी कि वे भारत को और इसलिए स्वयं को सचमुच ही विश्व में सम्मानप्रद स्थान दिला सकें। 
  • Nirakaran (Paperback)
    Bhairppa
    70

    Item Code: #KGP-7094

    Availability: In stock


  • Parinti (Paperback)
    Narendra Kohli
    50

    Item Code: #KGP-7101

    Availability: In stock


  • Reality Repair (Self-Help)
    William Cottringer
    695 626

    Item Code: #KGP-9013 A

    Availability: In stock

    Something very important is missing in the world today and it’s no secret as to what it is. It is sad but true that common sense isn’t common anymore. The problems we face in living today, require something that has been lost—a collective consciousness of common sense. Some say that it has been bred out of the human gene pool. That is serious business! 
    I have studied long-term success all my professional life and I can tell you the most important common denominator—that success is built on a foundation of common sense. Without it, success is just a fleeting dream of rambling images. No one in the history of the world has achieved genuine success and the real peace of heart that comes with it, without learning and using good old common sense.
    Reality Repair is a book of common sense. This book gives you 7 simple ways to improve your store of it that guarantees more success than you can imagine. Here are the seven simple ways to find the valuable 5% truth that is hidden away in the 95% worthless, non-sensical information overload that doubles every two years:
    •  Purpose
    •  Principles
    •  Perspectives
    •  Passions
    •  Polarizations
    •  Priorities
    •  Problems
    Reality Repair admits funny mistakes and offers plenty of practical solutions to improve success in these seven important areas of living, working and relating. It is your easy-to-read guide to start going from surviving to thriving.
  • Toro Kara Toro-3 (Parivrajak)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #Kgp-1575

    Availability: In stock


  • Koorha Kabaarha
    Ajeet Kaur
    220 198

    Item Code: #KGP-2058

    Availability: In stock

    कूड़ा-कबाड़ा
    इतनी भयानक दूट-फूट में से, इतनी नकारा, बेकार, बेवकूफ़ और डरी-सहमी औरत में से कैसे और कब एक निडर, बेखौफ, अपने जीवन के सभी फैसले खुद लेने की हिम्मत और हौसला करने वाली औरत पैदा हो गई, इसी ट्रांसफॉर्मेशन यानी काया- कल्प की दास्तान सुनाना चाहती हूँ आप सबको ।
    औरत, जिसे हमेशा कूड़ा-कबाड़ा समझा जाता है ।
    औरत, जो खुद भी अपने आपको  कूड़ा-कबाड़ा समझती रहती है उम्र-भर । क्योंकि यही समझकर ही तो जीवन से, जीवन की तमाम कड़वाहटों से समझौता किया जा सख्या है ।
    कि सहना, समझोता करना और अपना अस्तित्व मिटा देना, किसी भी तकलीफ की शिकायत जुबान पर नहीं लाना ही औरत का आदर्श मॉडल समझा जाता है । हर औरत को इसी आदर्श की घुट्टी दी जाती है । समाज में औरत का स्वीकृत  मॉडल यही है । कि वह निगाह नीची रखे, हर जुल्म को चुपचाप सहे, खामोश रहे बेटे पैदा कर ससुराल के खानदान का नाम जीवित रखे और वंश-परंपरा को आगे चलाए । पति के हर आदेश का पालन करे ।
    औरत, जिसे पहले माता-पिता के घर से 'पराई अमानत' समझकर पाला-पोसा जाता है । औरत, जो विवाह के बाद पति के घर की और ससुराल की 'धरोहर' यानी जायदाद होती है । औरत, जिसे उसका पिता दानस्वरूप एक अजनबी पुरुष के हाथों में सौंप देता है कि ले जा, आज से यह गाय तेरी है । इसका दूध निकाली, बछड़े पैदा करवाओ, मारो-पीटो, चाहे चमडी उधेड़ दो इसकी ।
    जा, ले जा, पाल-पोसकर तुझे दान में दी अपनी बेटी हमने । आज से इसके लिए यह घर पराया है । आज से तेरा घर ही इसके सिर छुपाने की जगह है ।
    जा बेटी, जा अपने घर । आज से ये घर तेरे लिए पराया हुआ । चावलों की मुट्ठी भरकर सिर के ऊपर से पीछे फेंक । मखानों की मुट्ठी भरकर पीछे फेंक । तेरे भाई सुखी रहें, और सुखी बसे उनका घर-परिवार । भाइयों का घर हरा-भरा रहे । दूध-पूत से भरा रहे ।
    औरत, जिसके लिए पिता का घर हमेशा पराया रहता है, और विवाह के बाद पति का घर भी अपना नहीं होता ।
    'बेटी, घर जा अपने...'
    अपने घर ।
    कौन-सा घर उसका अपना होता है ?
  • Hindi Ki Pratinidhi Kahaniyan : Taatvik Vivechan (Paperback)
    Jayanti Prasad Nautiyal
    60

    Item Code: #KGP-7029

    Availability: In stock

    कहानी साहित्य पर अनुशीलन, साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा कम ही हुआ है । कहानी साहित्य जहाँ एक ओर भारत के सभी विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है  वहीं दूसरी ओर कहानी  पाठक वर्ग बहुत विस्तीर्ण है, परंतु इतने विराट और व्यापक साहित्य पर आलोचना, समालोचना तथा तात्त्विक विवेचनपरक साहित्य बहुत कम मात्रा में उपलब्ध है ।
    इस पुस्तक में कथा तत्त्वों का विश्लेषण, शब्दार्थ एवं टिप्पणी खंड तथा व्याख्या खंड आदि का अनुशीलन उत्तर, दक्षिण, पूरब और पश्चिम के बोर्डों, विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर किया गया है । 
    संक्षेप में कहें तो कह सकते हैं कि यह पुस्तक सम्पूर्ण भारत में विश्वविद्यालयों, बोर्डों, महाविद्यालयों आदि के प्राध्यापकों तथा विद्यार्थियों के लिए तो उपयोगी है ही, साथ ही यह पुस्तक शोधार्थियों, कथा साहित्य के गंभीर अध्येताओं, समालोचकों, समीक्षकों के लिए भी उपादेय सिद्ध होगी ।  इस पुस्तक को इस प्रकार लिखा गया है कि यदि सामान्य पाठक भी इसे पढ़ना चाहे तो उसे हिंदी कथा साहित्य की पर्याप्त जानकारी प्राप्त हो ।
  • Helen Keller
    Vinod Kumar Mishra
    250 225

    Item Code: #KGP-240

    Availability: In stock


  • Khoyi Huyi Thati
    Ganga Prasad Vimal
    50 45

    Item Code: #KGP-9064

    Availability: In stock


  • Aadhi Raat Ka Surya : Vaigyanik Kathayen
    Dr. Rajiv Ranjan Upadhyaya
    300 270

    Item Code: #KGP-320

    Availability: In stock

    नॉर्वे में मध्य जून से सितंबर मास तक दिन-रात चमकने वाला सूर्य, चंद्रमा की-सी शीतलता रखता है। इसी ग्रीष्म ऋतु में ‘आधी रात का सूर्य’ की घटना घटित होती है। वास्तव में अपराधियों को पकड़ने की डी.एन.ए. ‘फिंगर प्रिंटिंग’ तकनीक के उपयोग के पूर्व इसका संकेत इस कथा में प्रथम बार हुआ है। 
    प्रकृति के रहस्यों को स्पष्ट करने तथा समझने की चेष्टा का फल आधुनिक विज्ञान है, जिसने तर्क और प्रयोगों के सोपानों पर आरूढ़ होकर, मात्र दो सौ वर्षों के अंतराल में, मानव के जीवन को सुखमय बनाने तथा उसे विविध संसाधन उपलब्ध कराने में आशातीत सफलता प्राप्त की है। तथ्यतः मानव के इतिहास में जितनी प्राप्ति विज्ञान ने इन वर्षों में की है, वह एक प्रकार से अभूतपूर्व कही जाएगी।
    मैं मिस्र (इजिप्ट) के नागरिक, रसायनज्ञ मित्र के निमंत्रण पर काहिरा गया था। उन्हीं के साथ विश्वविख्यात गीजा के पिरामिड को भी देखा था। क्लोनिंग को आधार बनाकर, इस ‘पिरामिड’ की पृष्ठभूमि में लिखी गई इसी नायक की कथा इस संग्रह का अंश है। 
    आतंकवाद से जूझ रहे देशों में ‘जैविक आतंकवाद’ की कल्पना सिहरन पैदा कर देती है। इसी पक्ष को बिंबित करती--एंटीरैवियोला वैक्सिन के द्वारा मानवता को त्रण देने का प्रयास करती कथा है--‘जिससे मानवता बची रहे।’
    वह दिन दूर नहीं है, जब मानव अंतरिक्ष के होटलों में जाकर आराम करेगा। पुनः धरती पर अपना कार्य करने, कुछ डॉलर खर्च कर आ जाया करेगा। निकट भविष्य में अंतरिक्ष टूरिज्म प्रारंभ हो जाएगा। आने वाले वर्षों में कंप्यूटर और बुद्धिमान बन जाएगा तथा रोबो संवेदनशील होकर मानव के अधिकांश कार्यों का संपादन करने लगेंगे। 
    आज हम अपने बदलते पर्यावरण की समस्या से परिचित हैं और ‘ग्रीन हाउस’ गैसों और उनसे संबंधित प्रभावों को नियंत्रित करने के प्रयास में लगे हैं। यह समस्या मूलभूत रूप से आधुनिक वैज्ञानिक प्रगति के असंतुलित पक्ष की ओर संकेत करती है। पर्यावरण को संरक्षित करने की तकनीकों की खोज में वैज्ञानिक लगे हुए हैं।
    हम अनेक ग्रहों, उपग्रहों, शनि और मंगल के रहस्यों को भी समझने के प्रयास में रत हैं। इतना ही नहीं, विज्ञान और वैज्ञानिक ब्रह्मांड की संरचना एवं उसके उत्पत्ति के सूत्रों को खोजने में, हिग्स बोसानों की उपस्थिति ज्ञात कर चुके हैं।
    इसी प्रकार विज्ञान द्वारा प्रदत्त संसाधनों का उपयोग कर, विकसित राष्ट्रों ने ऊर्जा का असंतुलित रूप में दोहन किया है, जिसके परिणामस्वरूप ऊर्जा के नवीन स्रोतों, जो पारंपरिक माध्यमों से इतर हों, को विकसित करने का प्रयास चल रहा है। 
    प्रथम बार हिंदी भाषा की ललित शैली में लिखी गईं ‘दूसरा नहुष’, ‘आधुनिक ययाति’, ‘अंतरिक्ष दस्यु’ एवं ‘जिससे मानवता बची रहे’ नामक विज्ञान कथाओं के साथ गुंपिफत हैं दो लघु विज्ञान कथाएं, जो इस विधा की प्रतिनिधि हैं। त्वरित गति से विकसित हो रही प्रौद्योगिकी के प्रभावों, परिणामों, तज्जनित परिवर्तनों आदि की झलक आपको इन कथाओं में दृष्टिगोचर तो होगी ही, साथ ही साथ आशा है, यह संग्रह आपका स्वस्थ मनोरंजन करने में भी सफल होगा। 
  • Svasthya Evam Chikitsa (Paperback)
    Dr. Rakesh Singh
    160

    Item Code: #KGP-369

    Availability: In stock

    स्वास्थ्य एवं चिकित्सा 
    पुस्तक में स्वास्थ्य से संबंधित विभिन्न विषयों पर लगभग 41 लेख संकलित हैं। जो लोग यह कहते हैं कि चिकित्सा विज्ञान या इंजीनियरिंग आदि को केवल अंग्रेजी माध्यम से ही पकाया जा सकता है, उनके लिए ये लेख चुनौती हैं और सिद्ध करते हैं कि दुराग्रह से मुक्त होकर यदि राष्ट्रभाषा को उनका माध्यम बनाने का प्रयास किया जाए तो इन विषयों को हिंदी माध्यम से पढाया जा सकता है।
    स्वास्थ्य-लाभ के लिए दवाओं के उपयोग से अधिक स्वास्थ्य-रक्षा के बारे में ज्ञान होना आवश्यक है। इन लेखों में अधिकांशत: इस बात की ध्यान में रखा गया है। आजकल आम प्रवृति यह हो गई है कि लोग कुछ दवाओं का नाम याद कर लेते हैं और अपने आप उनका प्रयोग आरंभ कर देते हैं। उससे कितनी जानि हो सकती है, यह 'दवाओं के उपयोग में सावधानियाँ शीर्षक से स्पष्ट है। इसी प्रकार टॉनिक के अंधाधुंध प्रयोग की निस्सारता से भी सामान्य पाठकों को परिचित कराया गया है। 'हदय-रोग और आहार' शीर्षक लेख हृदय-रोगियों के लिए अत्यंत लाभदायक है। इसमें अधुनातन चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में नवीन अनुसंधानों को भी समाविष्ट किया गया है।
    पुस्तक की भाषा सरल, सुबोध एवं बोधगम्य है। अभिव्यक्ति आदि से अंत तक प्रसाद गुण-संपन्न है। कहीं भी उलझाने का उपक्रम दृष्टिगत नहीं होता, यह लेखक के भाषा-सामर्थ्व एवं उनके सफ़ल अभिव्यक्ति-कौशल का प्रतीक है।
  • Vartmaan Ki Dhool
    Govind Prasad
    250 225

    Item Code: #KGP-658

    Availability: In stock

    ‘वर्तमान की धूल’ गोबिन्द प्रसाद का तीसरा काव्य संग्रह है जो एक छोटे से अंतराल के बाद आ रहा है। इस संग्रह के पाठक सहज ही लक्ष्य करेंगे कि इस कवि का अपना एक अलग रंग है जो सबसे पहले उसकी भाषा की बनावट में दिखाई पड़ता है और बेशक अनुभवों के संसार में भी। मेरा ध्यान सबसे पहले जिस बात ने आकृष्ट किया वह यह है कि इस कवि ने हिंदी और उर्दू काव्य भाषा की बहुत सी दूरियाँ ध्वस्त कर दी हैं। और इस तरह एक नई काव्य-भाषा बनती हुई दिखती है। इसे गोबिन्द प्रसाद की एक काव्यगत सफलता के रूप में देखा जाना चाहिए। यह वह परंपरा है जिसकी शुरुआत कभी शमशेर ने की थी और गोबिन्द प्रसाद इसे आज की ज़रूरत के मुताबिक एक नए अंदाज़़ में आगे ले जाने की कोशिश कर रहे हैं । पर केवल इतनी सी बात से इस संग्रह की विशेषता प्रकट नहीं होती। असल में यहाँ गोबिन्द प्रसाद एक गहरी घुलावट वाली रूमानियत के समानांतर एक विलक्षण राजनीतिक चेतना को भी बेबाक ढंग से व्यक्त कर सके हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है ‘अल्लाह नहीं अमेरिका जानता है’ शीर्षक कविता जिसकी आरंभिक दो पंक्तियाँ हमारे समय की एक बहुत बड़ी राजनीतिक गु