Pattharon Per Tootata Jal

Surendra Pant

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  • Year: 2017

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Himachal Pustak Bhandar

  • ISBN No: 9411225544887

पत्थरों पर टूटता जल

आरम्भिक कविताएँ कवि के आत्मसंघर्ष का,
खुद से लड़ते हुए कहीं न पहुँचने की
विवशता के बीच भी अपनी पहचान
बनाने की ललक से भरी तैयारी
का दस्तावेज होती है ।
उनमें एक ओर प्रचलित काव्यविधान
से टूटने की छटपटाहट होती है
तो दूसरी और शास्त्र की चुनौतियों के सम्मुख
कुछ नया कहने का तेवर होता है ।
इतना कहने का प्रयोजन यह नहीं कि
सुरेन्द्र पंत की कविताएँ अन्तिम कविताएँ हैं
जिन पर बहस नहीं की जा सकती ।
वास्तव में वे कविताएँ बहस की कविताएँ है ।
कारण यह कि उनमें एक गंभीर किस्म के
कवि की मुद्रा सहसा किसी शब्द मा शब्दार्थ
के कोने से झलकने लगती है ।

वे चाहे आज की भाषा में खुद को खोजने की
कोशिशें हो पर उनमें आज और कल की
कालगत धारणाओं से बचने की कोशिशें हों ।
इस अर्थ में वे ऐसे वर्तमान की कविताएँ है
जो सदैव अमानवीय परिस्थितियों में
ऐसी ही रुपाकृ्ति देता है ।

Surendra Pant

सुरेन्द्र पंत
1 नवम्बर, 1946 को ठाकुरद्वारा, मुरादाबाद में जन्म ।  मेरठ कॉलेज से एम० ए० समाजशास्त्र की पढाई बीच से छोड़कर दिल्ली पुलिस की नियुक्ति स्वीकार की, परन्तु साहित्य और कलाओं से अपना नाता बराबर बनाए रखा ।
वर्षों से कविताएँ लिखकर अपने पास रखने का शोक तोडना पड़ा और 'पत्थरों पर टूटता जल' संग्रह के साथ हिंदी कविता की नव्यतम धारा में प्रवेश ।

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