Kayantran

Jitendra Shrivastva

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  • Year: 2012

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9789381467466

जितेन्द्र श्रीवास्तव का नया संग्रह ‘कायांतरण’ इस मायने में भी नया है कि यह उनके और वृहत्तर अर्थों में हिंदी के काव्य परिसर का सार्थक विस्तार करता है। इस संग्रह में जितेन्द्र की काव्य-संवेदना की मूल भूमि नए संदर्भों से आबाद होकर अर्थ-बहुल होती गई है। जीवन के छोटे-बड़े संदर्भों के प्रति एक जैसी गहरी आसक्ति इन कविताओं की ताकत है। स्मृति और विस्मृति के दबावों के बीच हमारी आंतरिकता के निरंतर क्षरण पर व्याकुल-सी दिखती इन कविताओं का रहस्य यह है कि इनकी आलोचकीय अथवा आक्रोशी वैचारिकताएँ इन्हीं व्याकुलताओं के नीचे सक्रिय रहती हैं।
मनुष्य जीवन के सामान्य संवेदनों के माध्यम से कवि हर बार एक ऐसे अनदेखे और अबूझ अनुभव को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करता है कि वे सामान्य अनुभव मनुष्य जीवन की व्यापक विडंबनाओं को प्रतीकित करने लगते हैं। कवि सहज ही मानवीय भावनाओं को सभ्यता समीक्षा का मानक बना लेता है। मनुष्य समाज को इन्हीं आधारों पर जाँचते हुए जितेन्द्र के यहाँ प्रेम जैसी भावना महज मनुष्य के आंतरिक संवेदनों की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि कठोर राजनीतिक आशयों में परिवर्तित हो जाती है। यहाँ विशृंखलित और विघटित समाज की वर्तमान त्रासदी ही नहीं रेखांकित होती बल्कि ‘चाहिए’ की अंतर्ध्वनि  के साथ मनुष्यता के वैकल्पिक रूपों की जरूरत को भी कवि अपनी अटूट निष्ठा से व्यक्त करता है। वैश्वीकरण की मायावी शब्दावली के घटाटोप में जब इतिहास और आख्यान के अंत की घोषणा कर दी गई है, तब कवि उस यूटोपिया का सृजन करता है, राजनीतिक दृष्टि से जिसकी मौजूदगी प्लेटो तक सहन नहीं कर पाते थे। कहने की जरूरत नहीं कि यह यूटोपिया एक बेहतर मनुष्य समाज के निर्माण का प्रेरक है। इन मायनों में जितेन्द्र का कवि-कर्म मौजूदा समय में स्रष्टा-द्रष्टा की हैसियत प्राप्त कर लेता है, जिसमें अधिक मानवीय समाज को अर्जित करने की नैतिक विकलता विद्यमान है।   

Jitendra Shrivastva

जितेन्द्र श्रीवास्तव 
जन्म: उ.प्र. के देवरिया जिले की रुद्रपुर तहसील के एक गाँव सिलहटा में।
शिक्षा: बी.ए. तक की पढ़ाई गाँव और गोरखपुर में करने के बाद जे.एन.यू., नई दिल्ली से हिंदी साहित्य में एम.ए., एम.फिल. और पी-एच.डी.। एम.ए. और एम.फिल. में प्रथम स्थान।
प्रकाशित कृतियाँ: ‘इन दिनों हालचाल’, ‘अनभै कथा’, ‘असुंदर सुंदर’, ‘बिल्कुल तुम्हारी तरह’ (कविता-संग्रह) ० ‘भारतीय समाज की समस्याएँ और प्रेमचंद’, ‘भारतीय राष्ट्रवाद और प्रेमचंद’, ‘शब्दों में समय’, ‘आलोचना का मानुष-मर्म’ (आलोचना) ० ‘प्रेमचंद: स्त्री-जीवन की कहानियाँ’, ‘प्रेमचंद: दलित जीवन की कहानियाँ’, ‘प्रेमचंद: स्त्री और दलित विषयक विचार’, ‘प्रेमचंद: हिंदू-मुस्लिम एकता संबंधी कहानियाँ और विचार’ (सभी भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली से शीघ्र प्रकाश्य) (संपादन) ० भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली से प्रकाशित ‘गोदान’, ‘रंगभूमि’, ‘धु्रवस्वामिनी’ की भूमिकाएँ लिखी हैं।
हिंदी के साथ-साथ भोजपुरी में भी लेखन-प्रकाशन। कुछ कविताएँ अंग्रेजी, मराठी, उर्दू, उड़िया और पंजाबी में अनूदित। लंबी कविता ‘सोनचिरई’ की कई नाट्य प्रस्तुतियाँ।
पुरस्कार-सम्मान: हिंदी अकादमी, दिल्ली का कृति सम्मान, उ.प्र. हिंदी संस्थान का रामचंद्र शुक्ल पुरस्कार, भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार, उ.प्र. हिंदी संस्थान का विजयदेवनारायण साही पुरस्कार, भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता का युवा पुरस्कार, डॉ. रामविलास शर्मा आलोचना सम्मान और परंपरा ऋतुराज सम्मान।
जीविका: अध्यापन। कार्यक्षेत्र पहाड़, गाँव और अब महानगर। राजकीय महाविद्यालय बलुवाकोट, धारचूला (पिथौरागढ़), राजकीय महिला महाविद्यालय, झाँसी और आचार्य नरेन्द्रदेव किसान स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बभनान, गोण्डा (उ.प्र.) में अध्यापन के पश्चात् इन दिनों इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के मानविकी विद्यापीठ में अध्यापनरत।

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