Manali Mein Ganga Urfa Roznamacha

Dronvir Kohli

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  • Year: 2016

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Parmeshwari Prakashan

  • ISBN No: 9789380048642

मनाली में गंगा उर्फ़ रोजनामचा
चौंकिए नहीं (मनाली में गंगा) क्योंकि मनाली में तो व्यास है फिर यह गंगा यहां कैसे? पर यह गंगा नदी नहीं, जीती-जागती हाड़-मांस की गंगा है जो सब कुछ चुपचाप सहते हुए भी किसी से कोई शिकायत नहीं करती। अपने पति और बच्चों के लिए बड़े से बड़ा जोखिम भी उठाती है। पति का प्यार और अनुकंपा पाने के लिए, उसकी वासनापूर्ति के लिए अपने आप को समर्पित करने के लिए हमेशा प्रस्तुत रहती है। उसकी व्यथा, वेदना, दर्द, पीड़ा को कोई नहीं समझता। हंसते-हंसते सब झेलती है और उफ भी नहीं करती।
गंगा अध्यापन करती है। और उन दिनों जब घरों में गैस नहीं बल्कि पत्थरी कोयलों से अंगीठी सुलगानी पड़ती थी, कपड़े धोने के लिए भी वाशिंग मशीन नहीं थी, फ्रिज भी आम प्रचलन में नहीं थे क्योंकि  फ्रिज के लिए पांच-छह माह का इंतजार करना पड़ता था। टेलीफोन के लिए तो प्रायः दस वर्षों तक का लंबा इंतजार करना पड़ता था। उस समय भी वह प्रातः पांच बजे उठकर सबका नाश्ता बनाकर बच्चों का व पति का टिफिन तैयार करती थी। कपडे़ भी सुबह-सवेरे धोकर बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करके साढ़े छह बजे घर से निकलती थी। पर बदले में उसे क्या मिलता था-पति की उपेक्षा और ताने। इसके बावजूद वह बहुत ही हंसमुख और जिंदादिल थी। उसी गंगा की एक झलक इस डायरी में है।
-द्रोणवीर कोहली

Dronvir Kohli

द्रोणवीर कोहली
अपने लंबे साहित्यिक जीवन में लेखक ने कुल जमा बीसेक कहानियाँ ही लिखी होंगी, लेकिन उनमें से मात्र बारह कहानियों को ही चुना 'जमा-पूँजी' से संगृहीत करने के लिए ।
लेखक के अब तक आठ उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं -- 'टप्परगाडी', 'चौखट', 'हवेलियों वाले', 'आँगन-कोठा', 'काया-स्पर्श', 'तकसीम', ‘वाह कैंप' तथा 'नानी' । 'चौखट' के लिए बिहार राजभाषा विभाग से 'राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह' पुरस्कार ।
बाल-साहित्य में उत्तर प्रदेश से 'कंथक' तथा हिंदी अकादमी, दिल्ली से 'देवताओं की घाटी' पुरस्कृत । इंडो-रशियन लिटरेरी क्लब ने भी बाल-साहित्य से मूल्यवान योग के लिए लेखक को सम्मानित किया है । कुछ विश्वप्रसिद्ध लेखकों की बाल-रचनाओं का अनुवाद करने के अतिरिक्त लोककथाएँ तथा दूसरी कहानियाँ भी लिखी हैं ।
लेखक का जन्म 1932-33 में रावलपिंडी के निकट एक गाँव में हुआ, जहाँ संस्कृति, पाली का पुट लिए अवाणी अथवा अवाणकी बोली बोली जाती है। लड़कपन बीता रावलपिंडी में, जहाँ पोठोहारी बोली बोली जाती है । इन बोलियों का साहित्यिक प्रयोग लेखक ने अपनी रचनाओं में खुलकर किया है । देश-विभाजन के उपरांत 1949 में भारत सरकार के प्रकाशन विभाग में नौकरी, जहाँ 'आजकला', 'बाल भारती', 'सैनिक समाचार' पत्रिकाओं का संपादन किया । आकाशवाणी में वरिष्ठ संवाददाता, हिंदी समाचार विभाग में प्रभारी समाचार संपादक तथा प्रेस इंफरमेशन ब्यूरो में सूचना अधिकारी की हैसियत से भी काम किया ।

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