Rang Hawa Mein Phail Raha Hai

Ubaid Siddqi

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  • Year: 2011

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Dolphin Books

  • ISBN No: 9788188588367

हक़ीक़त चाहे जो भी हो, शाइर और अदीब आज भी इस ख़ुशफ़हमी में मुबतिला हैं कि वो अपनी रचनात्मकता के द्वारा इस दुनिया को बदसूरत होने से बचा सकते हैं और समाज में पाई जाने वाली असमानताओं को दूर कर सकते हैं। उबैद सिद्दीक़ी की शाइरी का एक बड़ा हिस्सा इसी ख़ुशफ़हमी का नतीजा मालूम होता है:
जाने किस दर्द से तकलीफ़ में हैं
रात दिन शोर मचाने वाले
ये सब हादसे तो यहां आम हैं
ज़माने को सर पर उठाता है क्या
आधुनिकता के जोश में हमारी शाइरी, ख़ास तौर पर ग़ज़ल ने समाजी सरोकारों से जो दूरी बना ली थी उबैद ने अपनी ग़ज़लों में इस रिश्ते को दोबारा बहाल करने का एक सराहनीय प्रयास किया है:
धूल में रंगे-शफ़क़ तक खो गया है
आस्मां तू कितना मैला हो गया है
बहुत मकरूह लगती है ये दुनिया
अगर नज़दीक जाकर देखते हैं
सदाए-गिर्या जिसे एक मैं ही सुनता हूं
हुजूमे-शहर  तेरे दरम्यां से आती है
अपने विषयवस्तु और कथ्य से इतर उबैद की शाइरी अपनी मर्दाना शैली और अन्याय के खि़लाफ़ आत्मविश्वास से परिपूर्ण प्रतिरोध की भी एक उम्दा मिसाल है:
शिकायत से अंधेरा कम न होगा
ये सोचो रौशनी बीमार क्यों है
मैं फ़र्दे-जुर्म तेरी तैयार कर रहा हूं
ए आस्मान सुन ले हुशयार कर रहा हूं

Ubaid Siddqi

उबैद सिद्दीक़ी
उबैद सिद्दीक़ी की पैदाइश 1957 में उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में हुई, जहां उनकी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई भी हुई। बाद की पढ़ाई और डिग्रियां उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से हासिल कीं। स्वतंत्र पत्रकार की हैसियत से अपनी कामकाजी ज़िंदगी प्रारंभ करने वाले उबैद ने अस्सी के दशक में आकाशवाणी में काम किया और कुछ वर्ष तक वे रेडियो कश्मीर, श्रीनगर से जुड़े रहे। वे क़रीब दस साल बी.बी.सी.उर्दू सेवा में विभिन्न पदों पर लंदन में रहे। उबैद ने 1997 में बी.बी.सी. से इस्तीफ़ा दे दिया और भारत लौटकर एन.डी.टी.वी. से जुड़ गए।
उबैद एक साथ कई रूप में सामने आते हैं-शाइर, पत्रकार, वृत्तचित्र निर्माता और रेडियो प्रस्तोता। उन्होंने साहित्य अकादेमी के लिए कहानीकार काज़ी अब्दुल सत्तार, रस्किन बांड और शाइर शहरयार पर लघु फ़िल्में बनाईं। वे ई.टी.वी. के चर्चित कार्यक्रम ‘हमारे मसाइल’ के पांच वर्ष तक प्रस्तुतकर्ता रहे और उसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया।
उबैद सिद्दीक़ी फ़िलहाल अनवर जमाल क़िदवई मास कम्यूनिकेशन रिसर्च सेंटर के निदेशक हैं और अपने परिवार के साथ दिल्ली में रहते हैं। ‘रंग हवा में फैल रहा है’ हिंदी में उनका पहला ग़ज़ल-संग्रह है, जो 2010 में उर्दू में प्रकाशित हुआ था।

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