Uttar Aadhuniktavaad Ki Or

Krishna Dutt Paliwal

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  • Year: 2013

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Arya Prakashan Mandal

  • ISBN No: 978-81-88118-78-6

हिंदी में उत्तर आधुनिकतावाद की चर्चा को गंभीरता से लेने का समय आ गया है। अब आप उसे मुंह बिचकाकर खारिज नहीं कर सकते। हिंदी में लगभग दो दशकों से यह चर्चा जारी है और गुजराती, बंगाली आदि में इससे भी पहले। हिंदी के माक्र्सवादियों ने शुरू-शुरू में ‘उत्तर आधुनिक’ चिंतन को लेकर कितना हाय-तौबा किया। अब हालत यह है कि ल्योतार, देरिदा, मिशेलफूको, बौद्रिया, पाल डी मान, सुसान सोंटाग, इहाव हसन, एडवर्ड सईद आदि के बिना अपनी बात पूरी नहीं कर पाते। और फ्रैंकफुर्त स्कूल तो माई-बाप बन गया है। दरअसल, उत्तर आधुनिकता ने ‘नवजागरण’ तथा ‘इनलाइटेनमेंट’ की विरुद्ध सीधा संघर्ष किया। उत्तर आधुनिकतावाद ने ‘तर्क’ की यूरापीय पद्धति को नकारते हुए अर्थहीन सिद्ध कर दिया है। उत्तर आधुनिकतवाद ने घोषणा की है कि वह सांस्कृतिक बहुलतावाद, बहुवचनवाद, हर तरह के वैविध्यवाद का समर्थन करता है और जो दबाए गए हैं उन पर (नारी-विमर्श, दलित-विमर्श पर) नए सिरे से विचार करने की तमन्ना रखता है। ज्ञान के क्षेत्रों में आए विकास-प्रगति के अंतःसूत्रों में ‘आधुनिकता’ का रुतबा कम हुआ है। फिर फूको ने इतिहास के संदर्भ में सोचकर कहा कि अन्य इतिहासकारों, समाजशास्त्रियों ने ‘डिफरेन्स’, ‘डी मिस्टीफाई’ और ‘डिसकंटीन्युटी’ के कारकों की खोज पर ध्यान दिया हैं इतिहास और राजनीति में ‘अदर’ या अन्य की खोज बढ़ी है तथा ‘अदर’ को उपेक्षितों के सरोकारों के कंेद्र में रखने से नया केंद्रवाद बना है। बाजारवाद की अर्थव्यवस्था ने हर माल चालू, हर माल बिकाऊ की नई भूमि तैयार की है। आज उत्तर आधुनिकतावाद आकाश की तरह व्यापक धारणा है, जिसे परिभाषित नहीं किया जा सकता। हां, थोड़ा-बहुत समझा भर जा सकता है। 

Krishna Dutt Paliwal

कृष्णदत्त पालीवाल 
4 मार्च, 1943 को सिकंदराबाद, ज़िला फर्रुखाबाद, उत्तर प्रदेश में जन्मे कृष्णदत्त पालीवाल प्रोफेसर एवं पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, जापान के तोक्यो यूनिवर्सिटी आफ फारेन स्टडीज़ में विज़िटिंग प्रोफेसर रहे।
हिंदी के समकालीन बौद्धिक-सांस्कृतिक क्षेत्रों में गहन अभिरुचि के साथ हिस्सेदारी।
प्रमुख प्रकाशन: भवानीप्रसाद मिश्र का काव्य-संसार ०  आचार्य रामचंद्र शुक्ल का चिंतन जगत् ०  मैथिलीशरण गुप्त: प्रासंगिकता के अंतःसूत्र ०  सुमित्रानंदन पंत ०  डा. अम्बेडकर और समाज-व्यवस्था ०  सीय राम मय सब जग जानी ०  सर्वेश्वरदयाल सक्सेना ०  हिंदी आलोचना के नए वैचारिक सरोकार ०  गिरिजाकुमार माथुर ०  जापान में कुछ दिन ० उत्तर-आधुनिकतावाद की ओर ०  अज्ञेय होने का अर्थ ०  उत्तर- आधुनिकतावाद और दलित साहित्य ०  नवजागरण और महादेवी वर्मा का रचना-कर्म: स्त्री-विमर्श के स्वर ०  अज्ञेय: कवि-कर्म का संकट ०  निर्मल वर्मा ०  दलित साहित्य: बुनियादी सरोकार ०  निर्मल वर्मा: उत्तर औपनिवेशिक विमर्श ०  अज्ञेय से साक्षात्कार (संपादन) ०  अंतरंग साक्षात्कार (संपादन) ०  पत्र-संवाद: अज्ञेय और रमेशचंद्र शाह, पत्र-संवाद: अज्ञेय और नंदकिशोर आचार्य ०  किताबघर प्रकाशन से फरवरी 2015 में प्रकाशित अंतिम पुस्तक--आधुनिक भारतीय नयी कविता।
संपादन: लक्ष्मीकांत वर्मा की चुनी हुई रचनाएं ०  मैथिलीशरण गुप्त रचनावली--बारह खंडों में, अज्ञेय रचनावली--अठारह खंडों में।
पुरस्कार/सम्मान: हिंदी अकादमी पुरस्कार ०  दिल्ली हिंदी साहित्य सम्मेलन सम्मान ०  तोक्यो विदेशी अध्ययन विश्वविद्यालय, जापान द्वारा प्रशस्ति पत्र ०  उ० प्र०  हिंदी संस्थान का राममनोहर लोहिया अतिविशिष्ट सम्मान ०  सुब्रह्मण्यम भारती सम्मान, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा ०  साहित्यकार सम्मान, हिंदी अकादमी, दिल्ली ०  हिंदी भाषा एवं साहित्य में बहुमूल्य योगदान के लिए विश्व हिंदी सम्मान, आठवां विश्व हिंदी सम्मेलन, न्यूयार्क, अमेरिका में सम्मानित।

स्मृति शेष: 8 फरवरी, 2015

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