Nayi Kahani Ki Sanrachana

Hemlata

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  • Year: 2013

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Vandana Book Agency

  • ISBN No: 9788189424466

नई कहानी की संरचना
इतिहास के वे क्षण अति महत्त्वपूर्ण होते है जो संकट और परिवर्तनों के क्षण होते है । ऐसे समय में ही पुरानी व्यवस्था को पीछे ढकेलकर नई व्यवस्था आगे आती है और परंपरागत अनेक रूढ तथा गतिहीन तत्त्व पीछे छुट जाते हैं और उनके स्थान पर नए यथार्थ से उदूभूत नए तत्त्व परंपरा का जीवंत अंश वन जाते हैं । इनसे मानव संबंधों के लिए नई भूमिका बनती है, नए मानव का जन्म होता है । इस संधिकाल में वहीं साहित्यकार सफल होता है जो तत्कालीन जीवन यथार्थ को अपने साहित्य के माध्यम से व्यक्त करता है ।
साहित्य में निहित 'समय सत्य' को पहचानना और उदघाटित करना आलोचक का धर्म है । आलोचक यदि कृति मेँ निहित जीवन सत्य की उपेक्षा करके अपने दृष्टिकोण के संदर्भ में कृति का विश्लेषण करता है तो कृति के साथ न्याय नहीं कर पाता ।
स्वातंत्र्योत्तर युग से जिस समय यथार्थ का दर्शन तत्कालीन कथा साहित्य में हुआ, वह रचनाकार ने स्वयं  होता था और यहीं कारण है कि उसकी अभिव्यक्ति भी उससे प्रभावित हुई । तत्कालीन साहित्यकार की अनुभूति और अभिव्यक्ति की भिन्नता का विश्लेषण भी प्राचीन मानद्रडों के आधार पर संभव नहीं था, विशेष रूप से कथा साहित्य का, जिसे 'नई कहानी' नाम से जाना गया ।
'नई कहानी' के माध्यम से व्यक्त भावबोध ने उसकी अभिव्यक्ति शैली को प्रभावित किया । भाव और शैली ने सम्मानित रूप से समय यथार्थ का चित्रण किया । यहीं कारण है कि कहानी विश्लेषण के परंपरागत मानदंड इन कहानियों के विश्लेषण के लिए सक्षम नहीं थे । 'नई कहानी' के विश्लेषण के भिन्न मानदंडों का आश्रय लिया गया जो उन कहानियों में से ही निसृत हुए थे । इस पुस्तक में उन्हें मानदंडों को खोज करने का प्यास है जो उन कहानियों में से ही निसृत हुए हैं और 'नई कहानी की संरचना' से जिनका विशेष महत्त्व रहा है ।

Hemlata

डॉ. हेमलता
जन्म : 2 अगस्त, 1951, दिल्ली
शिक्षा : एम.ए. (हिंदी), पी-एच० डी०  दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
अध्यापन : दिल्ली विश्वविद्यालय की नॉन-कॉलिजिएट स्नातक कक्षाओं के लिए अध्यापन (तीन वर्ष) आंध्र विश्वविद्यालय की 'राजभाषा में स्नातकोत्तर डिप्लोमा' कक्षाओं में अध्यापन
कार्य : मुम्बई पोर्ट ट्रस्ट में हिंदी अधिकारी के रूप में कार्य, तत्पश्चात् विशाखापट्टणम पोर्ट ट्रस्ट में सेवानिवृत्ति तक हिंदी अधिकारी के रूप में कार्य किया
संपादन : पोर्ट की त्रैमासिक पत्रिका 'सागरी' के हिंदी भाग का संपादन ० स्वतंत्र रूप से केवल हिंदी में प्रकाशित हिंदी पत्रिका का संपादन
प्रकाशन : राजभाषा हिंदी से संबंधित विविध पत्रिकाओं में प्रकाशित लेख

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