Ikkisveen Sadi : Kavita Aur Samaj

Jagdish Narayan Shrivastva

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  • Year: 2016

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Amarsatya Prakashan

  • ISBN No: 9789383234493

‘आज जैसा कष्ट है, उसमें सबसे बड़ी चुनौती तो कवि की ही है। हर युग के कवि को कोई न कोई चुनौती मिलती रही है, चाहे समाज की परंपरा दे, चाहे दर्शन दे, चाहे राजनीति दे लेकिन सबको मिलाकर इतनी बड़ी चुनौती कभी नहीं मिली, जो आज मिली है। हर देश के कवि को मिली है, हमारे देश के कवि को ही नहीं मिली है। ‘अस्ति-नस्ति’ के बीच में अगर हम रोक सकें ध्वंस को तो जीवन बच जाएगा। न रोक सकेंगे तो जीवन जाता रहेगा।...
यहां नई पीढ़ी के कवि हैं, पुरानी के भी हैं।...दो पीढ़ियां न सामने हों तो चलता नहीं है।...कवियों की नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी जब मित्र की तरह सामने होती हैं तब शायद बड़ा साहित्य बनता है और अगर दोनों लड़ते हैं तो उनकी लड़ाई ही समाप्त हो जाती है।
जो आज का कवि है वह आज की परिस्थिति को देखे लेकिन युगबोध के साथ वह युगांतरबोध को भी जाने। कविता लिखना एक सामाजिक कर्म तो है ही। समान गति रखता हो वह समाज है, कवि उसी से आता है और उसकी व्यथा जानता है। सुख-दुःख जानता है। चेतना के अनेक स्तर हैं, उनमें एक सहचेतना है। अपने युग को समझने के लिए और बहुत से कर्म के संस्कार इनमें हैं, जो अब चेतना है। अपने युग को समझने के लिए एक पराचेतना भी है। ये सब चेतनाएं एक साथ कविताओं में मिल जाती हैं, तब हमें एक बड़ा कवि मिलता है। इसलिए युगबोध तो है ही आपका, युगांतरबोध भी होगा आपके पास।...जब ये सब मिलते हैं तो एक महान् कवि आता है।
चिंतन सिर्फ बुद्धि की प्रक्रिया है पर अनुभूति सिर्फ बुद्धि की प्रक्रिया नहीं है। बड़ा कवि होने के लिए विशाल अनुभूति होती है, भाषा-संवेदना होती है, आंसू भी होंगे, हंसी भी होगी।
‘कविर्मनीषी परिभू स्वयंभू’--इससे बड़ी परिभाषा नहीं है कवि की क्योंकि वह मनीषी है, सब कालों को मिलाकर देखता है, वह परिभू है, सबमें, सबके हृदय को जानता है और स्वयंभू होता है।...
भाषा-भाव-अनुभूति विलक्षण हो तो आप पूरी समष्टि को बना सकेंगे। पर उसके पहले आपकी कविता पहले आपको बनाएगी। जो कविता आपको नहीं बना सकती, वह किसी को नहीं बनाएगी।’
---महादेवी

Jagdish Narayan Shrivastva

जगदीश नारायण श्रीवास्तव 
जन्म: 27 मार्च, 1936, ग्राम एकौना, ज़िला देवरिया (उ. प्र.)
माता: श्रीमती राधिका देवी (स्व.)
पिता: श्री महेश्वरी प्रसाद श्रीवास्तव (स्व.)
शिक्षा: राष्ट्रीय इंटरमीडिएट कॉलेज, बड़हलगंज, गोरखपुर (उ. प्र.) ०  उच्च शिक्षा आगरा विश्वविद्यालय (1955)
आजीविका: वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी (प्रथम) पूर्वोत्तर रेलवे, गोरखपुर से सन् 1994 में सेवानिवृत्त
परिवार: 1957 में विवाह--पत्नी श्रीमती जयवंती श्रीवास्तव (स्व.) ०  पुत्र-पुत्रियों से भरा-पूरा परिवार
कृतियां: ‘समकालीन कविता पर एक बहस’ चित्रलेखा प्रकाशन, इलाहाबाद से 1976 में प्रकाशित ०  ‘उपन्यास की शर्त’ किताबघर प्रकाशन, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली से 1993 में प्रकाशित ०  ‘पत्रकारिता के शिखरपुरुष’ (संपादित), पत्रकारिता प्रतिष्ठान, गोरखपुर से प्रकाशित ०  ‘पूर्वी उत्तर प्रदेश का साहित्यिक परिदृश्य’ .

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