Sunanda Ki Dairy (Paperback)

Raj Kishore

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  • Year: 2011

  • Binding: Paperback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 978-93-81467-02-2

एक थी सुनंदा  ।
संपन्न परिवार की लड़की । मित्र से पति बने मलय के  साथ नहीं बनी, तो वह किसी नीहारिका की तरह शून्य में विचरण करने लगी । कभी इस शहर में, कभी  उस शहर में  । उसने कई नौकरियाँ कीं, परंतु स्वतंत्रता की उसकी चेतना ने उसे कहीं भी टिकने नहीं दिया । यह एक अदृश्य बेचैनी का शिकार थी । उसके मन में कई तरह के सवाल उमड़ते-घुमड़ते रहते थे, पर किसी भी उत्तर से उसे संतोष नहीं होता था । उसकी यह खोज ही उसे नैनीताल ले आई, जहाँ वह कुछ दिनों तक विश्राम करना चाहती थी, ताकि आगे की जिंदगी की कोई रूपरेखा उभर सके ।
एक था सुमित ।
मस्त, फक्कड़ और विचारशील । माँ-बाप नहीं रहे, तो पारिवारिक संपत्ति को अपने गाँव के कल्याण के लिए समर्पित कर वह आवारगी करने लगा । उसकी एक अंतरंग मित्र मंडली थी, जिसके आर्थिक सहयोग से वह अपनी मनचाही जिंदगी बिता रहा था । उसकी जिंदगी में किताब, शराब और सिगरेट के अलावा और कुछ नहीं था । घुमते-फिरते वह भी नैनीत्ताल आ गया । संयोग से यह उसी गेस्ट हाउस में ठहरा जहाँ सुनंदा ठहरी हुई थी ।
दोनों की मुलाकात दोनों  के ही लिए एक अविस्मरणीय घटना बन गई । सुनंदा और सुमित विभिन्न विषयों पर बातचीत करने लगे, जैसे ईश्वर, धर्म, नैतिकता, प्रेम, विवाह, स्त्री, लोकतंत्र, मानव अधिकार आदि । इसके साथ ही, दोनों के हृदय अनुराग की आभा से भरते चले गए । लेकिन परिपाक की ऐश्वर्यमयी रात के तुरंत बाद जुदाई का मुहूर्त आ पहुंचा - दोनों की जिंदगी को एक नई दिशा प्रदान करने के लिए ।
'सुनंदा की डायरी' विचार-विमर्श के इन्हें घटनापूर्ण दिनों का दिलचस्प दस्तावेज है ।

Raj Kishore

राजकिशोर
राजनीतिक टिप्पणीकार और स्तंभ लेखक राजकिशोर रविवार, परिवर्तन तथा नवभारत टाइम्स के उच्च संपादकीय पदों पर काम कर चुके हैं । पत्रकारिता के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है । उनकी कुछ प्रसिद्ध पुस्तके हैं - एक भारतीय के दुखा, जाति कौन तोड़ेगा, रोशनी यहाँ है, एक आहिन्दू का घोषणपत्र, सोचो तो संभव  है, गांधी मेरे भीतर, स्त्रीत्व का उत्सव तथा स्विमिंग पूल पर टॉपलेस । वे बहुचर्चित पुस्तक श्रृंखला 'आज के प्रश्न' के संपादक भी हैं ।
राजकिशोर के उपन्यास तुम्हारा सुख को पाठकों ने बहुत सराहा है । उनके कविता संग्रह का नाम है, पाप के दिन। इनका व्यंग्य संकलन अँधेरे में हँसी हाल ही में प्रकाशित हुआ है ।

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