Satta Ke Aar-Paar (Paperback)

Vishnu Prabhakar

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  • Year: 2010

  • Binding: Paperback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 978-81-89859-07-7

सत्ता के आर-पार
सत्ता और सेवा, सत्ता और तप, सत्ता और मनीषा इनका परस्पर क्या संबंध है, अनादिकाल से हम इसी प्रश्न से जूझते आ रहे हैं। कितने रूप बदले सत्ता ने। बाहरी अंतर अवश्य दीख पड़ा, पर अपने वास्तविक रूप में वह वैसे ही सुरक्षित रही, जैसे अनादिकाल में थी, अनगढ़ और क्रूर।
प्रस्तुत नाटक लिखने का विचार मेरे मन में इन्हीं प्रश्नों से जूझते हुए पैदा हुआ था। जेने वाड्मय की अनेक कथाओं ने मुझे आकर्षित किया। प्रस्तुत नाटक ऐसी ही एक कथा का रूपांतकर है। 
आधुनिक युग की प्रायः सभी समस्याएं मूल रूप में अनादिकाल में भी वर्तमान थीं। उनका समाधान खोजने के लिए लोग तब भी वैसे ही व्याकुल रहते थे जैसे आज। तो कैसी प्रगति की हमने? कहां पहुंचे हम? ये प्रश्न हमें बार-बार परेशान करते हैं। भले ही उनका वह समाधान न हो सके जो तब हुआ था, पर शब्दों की कारा से मुक्ति पाने को हम आज भी उसी तरह छटपटा रहे हैं। यह छटपटाहट ही मुक्ति के मार्ग की ओर ले जाती है।
-इसी पुस्तक की भूमिका से

Vishnu Prabhakar

विष्णु प्रभाकर विष्णु जी का जन्म 21 जून, 1912, को जिला मुजफ्फरनगर (उ०प्र०) के एक गॉव में हुआ था । विष्णु प्रभाकर हिन्दी में नाटक के क्षेत्र में विशिष्ट प्रतिभासंपन्न रचनाकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं । बांग्ला उपन्यासकार शरतचन्द्र के जीवन पर 'आवारा मसीहा' के कृतित्व ने विष्णु जी को भारत के महान जीवनीकार के रूप में भी प्रस्तुत किया है । बचपन हिसार (हरियाणा) में गुजरा। वहीं शिक्षा प्राप्त की और सरकारी नौकरी से जिन्दगी की शुरुआत की । कुछ दिन आकाशवाणी में अधिकारी भी रहे । कुछ समय पश्चात नौकरी छोड़ स्वतन्त्र लेखन अपनाया । मौलिक लेखन के अतिरिक्त उन्होंने साठ से अधिक पुस्तकों का संपादन किया । उनकी अनेक पुस्तके पुरस्कृत हैं । पुरस्कार तथा सम्मान : इंटरनेशनल ह्यूमनिस्ट अवार्ड (1975); सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार (1976), राष्ट्रीय एकता पुरस्कार (1980), मूर्तिदेवी पुरस्कार, भारतीय ज्ञानपीठ (1988); शलाका सम्मान, हिन्दी अकादमी, दिल्ली (1988), केन्द्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार (1993); पाब्लो नेरूदा सम्मानम्, इण्डियन राइटर्स एसोसिंएशन; विशिष्ट साहित्यकार सम्मान, उ० प्र० हिन्दी संस्थान; शरत् पुरस्कार, बंग साहित्य परिषद्, भागलपुर; सूर पुरस्कार, साहित्य कला परिषद्, तुलसी पुरस्कार, हरियाणा साहित्य अकादमी और संस्थान सम्मान, नागरी प्रचारिणी सभा, प्रयाग एवं अन्य कई पुरस्कार।
 स्मृति-शेष : 11 अप्रैल, 2009

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