Prasiddha Vyaktiyon Ke Prem-Patra (Paperback)

Virendra Kumar Gupt

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  • Year: 2005

  • Binding: Paperback

  • Publisher: Dolphin Books

  • ISBN No: 978-81-88588-10-7

स्त्रियों-पुरुषों के हृदयों में एक-दूसरे के प्रति उठते-बैठते ज्वारभाटों की सबसे सच्ची, ईमानदारी शाब्दिक अभिव्यक्ति प्रेम पत्रों में ही हो पाई है । इसका कारण स्पष्ट है । जब भी व्यक्ति ने, स्त्री या पुरुष ने प्रेम-पत्र लिखा है, वह अनायास ही धन-पद-विद्वत्ता या सामाजिक प्रतिष्ठा की ऊंचाइयों से नीचे उतर आया है और स्त्रीत्व-पुरुषत्व की यथार्थ धरती पर खड़े होकर ही उसने अपने प्रेमी या प्रेमिका को संबोधित किया है । तब शरीर की सभी साज-सज्जाएं और चेहरे के सभी मुख़ौटे उतर जाते हैं और धड़कता हृदय ही सामने होता है । इस स्तर पर लिंकन, बायरन, क्रामवेल, नेपोलियन, विस्मार्क,शॉ और गांधी एक ही सुर में बोलते दिखाई पड़ते हैं ।

Virendra Kumar Gupt

वीरेन्द्र कुमार गुप्त
जन्म : 1928
1950 से लेखनरत । पहली रचना एक नाटक 'सुभद्रा-परिणय' 1952 में प्रकाशित । स्फुट कविताएँ। दो प्रबंध काव्य 'प्राण-द्वंद्व' एवं 'राधा कुरुक्षेत्र में' । सात उपन्यास, जिनमें तीन ऐतिहासिक: चिंतनपरक लेख । जैनेन्द्र कुमार से लंबा संवाद 'समय और हम' । प्रेम-पत्रों का संकलन 'प्रसिद्ध व्यक्तियों के प्रेम-पत्र' ।
अंग्रेजी में दो पुस्तकें 'Ahimsa In India's Destiny' तथा 'The Inner Self'
लगभग दस पुस्तकों का अंग्रेजी से अनुवाद। 
बाल-साहित्य का भी सृजन ।

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