Mandra (Paperback)

Bhairppa

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  • Year: 2017

  • Binding: Paperback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 978-81-89859-70-1

डॉ. एस.एल. भैरप्पा
(जन्म: 1934)
पेशे से प्राध्यापक होते हुए भी, प्रवृत्ति से साहित्यकार बने रहने वाले भैरप्पा ऐसी गरीबी से उभरकर आए हैं जिसकी कल्पना तक कर पाना कठिन है। आपका जीवन सचमुच ही संघर्ष का जीवन रहा। हुब्बल्लि के काडसिद्धेश्वर कालेज  में अध्यापक की हैसियत से कैरियर शुरू करके आपने आगे चलकर गुजरात के सरदार पटेल विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के एन.सी.ई.आर.टी. तथा मैसूर के प्रादेशिक शिक्षा कालेज में सेवा की है। अवकाश ग्रहण करने के बाद आप मैसूर में रहते हैं।
‘धर्मश्री’ (1960) से लेकर ‘मंद्र’ (2002) तक आपके द्वारा रचे गए उपन्यासों की संख्या 19 है। उपन्यास से उपन्यास तक रचनारत रहने वाले भैरप्पा ने भारतीय उपन्यासकारों में अपना एक विशिष्ट स्थान बना लिया है। आपके ‘उल्लंघन’ और ‘गृहभंग’ उपन्यास भारत की 14 प्रमुख भाषाओं में ही नहीं, अंग्रेज़ी में भी अनूदित हैं। ‘धर्मश्री’ और ‘सार्थ’ उपन्यास संस्कृत में अनूदित हैं। ‘पर्व’ महाभारत के प्रति आपके आधुनिक दृष्टिकोण का फल है, तो ‘तंतु’ आधुनिक भारत के प्रति आपकी व्याख्या का प्रतीक। ‘सार्थ’ में जहाँ शंकराचार्य जी के समय के भारत की पुनर्सृष्टि का प्रयास किया गया है, वहीं ‘मंद्र’ में संगीत लोक के विभिन्न आयामों को समर्थ रूप में प्रस्तुत किया गया है। रवींद्र, बंकिमचंद्र, शरत्चंद्र और प्रेमचंद के बाद किसी ने यदि अखिल भारतीय मनीषा और अस्मिता को शब्दांकित किया है, तो वह भैरप्पा ही हैं। आपकी सर्जनात्मकता, तत्त्वशास्त्रय विद्वत्ता, अध्ययन की श्रद्धा और जिज्ञासु प्रवृत्ति—इन सबने साहित्य के क्षेत्र में आपको अनन्य बना दिया है। आपके अनेक उपन्यास बड़े और छोटे स्क्रीन को भी अलंकृत कर चुके हैं।
केंद्रीय साहित्य अकादेमी तथा कर्नाटक साहित्य अकादेमी (3 बार) का पुरस्कार, भारतीय भाषा परिषद का पुरस्कार--ऐसे कई पुरस्कारों से आप सम्मानित हुए हैं। अखिल भारतीय कन्नड़ साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता का, मराठी साहित्य सम्मेलन के उद्घाटन करने का, अमेरिका में आयोजित कन्नड़ साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता करने आदि का गौरव भी आपने अर्जित किया है।
देश-विदेश की विस्तृत यात्रा करने वाले भैरप्पा ने साहित्येतर चिंतनपरक कृतियों की भी रचना की है। आपकी साहित्यिक साधना से संबंधित कई आलोचनात्मक पुस्तकें भी प्रकाशित हो  चुकी  हैं।

Bhairppa

डॉ. एस.एल. भैरप्पा
(जन्म: 1934)
पेशे से प्राध्यापक होते हुए भी, प्रवृत्ति से साहित्यकार बने रहने वाले भैरप्पा ऐसी गरीबी से उभरकर आए हैं जिसकी कल्पना तक कर पाना कठिन है। आपका जीवन सचमुच ही संघर्ष का जीवन रहा। हुब्बल्लि के काडसिद्धेश्वर कालेज  में अध्यापक की हैसियत से कैरियर शुरू करके आपने आगे चलकर गुजरात के सरदार पटेल विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के एन.सी.ई.आर.टी. तथा मैसूर के प्रादेशिक शिक्षा कालेज में सेवा की है। अवकाश ग्रहण करने के बाद आप मैसूर में रहते हैं।
‘धर्मश्री’ (1960) से लेकर ‘मंद्र’ (2002) तक आपके द्वारा रचे गए उपन्यासों की संख्या 19 है। उपन्यास से उपन्यास तक रचनारत रहने वाले भैरप्पा ने भारतीय उपन्यासकारों में अपना एक विशिष्ट स्थान बना लिया है। 
केंद्रीय साहित्य अकादेमी तथा कर्नाटक साहित्य अकादेमी (3 बार) का पुरस्कार, भारतीय भाषा परिषद का पुरस्कार--ऐसे कई पुरस्कारों से आप सम्मानित हुए हैं। अखिल भारतीय कन्नड़ साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता का, मराठी साहित्य सम्मेलन के उद्घाटन करने का, अमेरिका में आयोजित कन्नड़ साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता करने आदि का गौरव भी आपने अर्जित किया है।
देश-विदेश की विस्तृत यात्रा करने वाले भैरप्पा ने साहित्येतर चिंतनपरक कृतियों की भी रचना की है। आपकी साहित्यिक साधना से संबंधित कई आलोचनात्मक पुस्तकें भी प्रकाशित हो  चुकी  हैं।

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