Ek Nirvasit Maharaja (Paperback)

Navtej Sarna

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  • Year: 2010

  • Binding: Paperback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 978-93-80146-83-6

एक निर्वासित महाराजा
हिंदुस्तान के महानतम शासकों में से एक, पंजाब के महाराजा रंजीत सिंह का सन् 1839 में देहांत हो गया और उनका विस्तृत साम्राज्य अराजकता में डूब गया । अभी एक दशक भी नहीं हुआ था कि गृहकलहपूर्ण प्रतिद्वन्द्विता और षड़यंत्रों के चलते पंजाब अंग्रेजों के प्रतीक्षारत हाथों में चला गया । जिस शासक ने साम्राज्य के अधिग्रहण की शर्तों पर दस्तखत किए और मशहूर कोहिनूर हीरे सहित लाहौर का तोशकखाना अंग्रेजी को सौंपा, यह एक ग्यारह साल का बच्चा था, महाराजा रंजीत सिंह का सबसे छोटा पुत्र, दलीप सिंह ।
इस सटीक और मर्मस्पर्शी उपन्यास में, जो सच्ची घटनाओं पर आधारित है, नवतेज सरना पंजाब के आखिरी महाराजा की असाधारण कहानी बखानते हैं । साम्राज्य के अधिग्रहण के साथ ही दलीप को उनकी माँ और प्रजा से अलग-थलग कर दिया जाता है । ब्रिटिश सरकार उन्हें अपने संरक्षण में  लेकर, उनका धर्मांतरण का उन्हें ईसाई बना देती है । सोलह साल की उम्र में उन्हें एक देशीय दरबारी का जीवन जीने के लिए इंग्लैड भेज दिया जाता है । यह एक ऐसा निर्वासन था, जिसके लिए उन्हें अभ्यस्त कराया गया था कि वे खुद इसकी मांग करें; लेकिन अपने साथ होने वाले व्यवहार के कारण जब उनका मोहभंग  हुआ और देर से ही सही, जब उन्हें अपनी सोई हुई विरासत का अहसास हुआ, तब वे विद्रोही वन गए । वे फिर से सिख बन गए और हिंदुस्तान वापस लौटने और अपने लोगों का नेतृत्व करने के लिए मचल उठे, लेकिन उनके इस प्रयास ने उन्हें उन्नीसवीं सदी के यूरोप की गंदी राजनीति से फँसा दिया, जिसने उन्हें रिक्त कर दिया । वे धोखे और उपहास क पात्र बन गए । अंतत: पेरिस के एक सस्ते होटल में वे एक अकेले और हारे हुए आदमी के रूप से मृत्यु को प्राप्त हुए ।
दलीप सिंह के अपने ही स्वर में और उनकें पाँच समकालीनों की आवाज में कहा गया यह उपन्यास न सिर्फ सिख-इतिहास, वरन् पुरे हिंदुस्तान के इतिहास के एक वेहद कारुणिक व्यक्तित्व की रोचक और भीतर तक हिला देने वाली तस्वीर पेश करता से । साथ ही यह ब्रिटिशा साम्राज्यवाद छोर उसको बढावा देने वाले भारतीय राजा-महाराजाओं के लालच और अदूरदर्शिता की भी बेबाक पाताल है ।

Navtej Sarna

नवतेज सरना 
नवतेज सरना का जन्म पजाब के  जालंधर जिले  में हुआ। दिल्ली विश्वविद्यालय से कानून की पढाई पूरी करने के वाद वे सन् 1980 में भारतीय विदेश सेवा में आए । बतौर राजनयिक वे मॉस्को, वारसा, जिनेवा, तेहरान, भूटान और वाशिंगटन डी०सी० से कार्यरत रहे । उसके बाद दिल्ली में भारत के विदेश मंत्रालय में प्रवक्ता के बतौर काम कर, संप्रति वे इजराइल में  भारत के राजदूत हैं ।
उनका पहला उपन्यास 'वी वरंट लवर्स लाइक दैट' सन् 2003 से प्रकाशित हुआ और अरबी तथा हिन्दी में इसके अनुवाद भी छपे । हिंदी से 'हम यूँ आशना न थे' शीर्षक से ।
कथेतर साहित्य पर भी उनकी दो पुस्तकें हैं-'दि बुक आँफ नानक' एवं 'फोक टेल्स आँफ़ पोलैंड' । नवतेज सरना के लेख एवं कहानियां भारत तथा यूनाइटेड किंगडम की पत्र- पत्रिकाओं में छपती रहती हैं और बी०बी०सी० वर्ल्ड सर्विस से प्रसारित भी होती हैं । 'टाइम्स लिटरेरी सप्लीमेँट' , 'दि हिंदु' एवं अन्य पत्र-पत्रिकाओं में वे नियमित रूप से छपते रहते हैं ।

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