Aadivasi : Srijan Mithak Evam Anya Lokkathayen (Paperback)

Ramnika Gupta

Availability: In stock

Seller: KGPBOOKS

Qty:
200 + Free Shipping


  • Year: 2015

  • Binding: Paperback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 978-93-85054-29-7

आदिवासी संस्कृति अब तक ज्ञात मानव सभ्यताओं में सबसे प्राचीन है। इस समाज की लोककथाओं-गाथाओं में मानव सभ्यता के शुरुआती दौर के सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यबोध की झलक तो मिलती ही है, साथ ही ये हमें आदिम मनुष्य को विस्मित कर देने वाली कल्पना की उड़ान और मनुष्य की आकांक्षाओं-अपेक्षाओं की मंत्र-मुग्ध करने वाली विरासत भी सौंपती हैं। ये कथाएँ--मिथक मानव सभ्यता के विकास की कथाएँ हैं--परिवर्तनों की दस्तकें दर्ज हैं इनमें--कल्पना और यथार्थ की भाषा में बोलती हैं ये कथाएँ। यदि हमने मौजूदा भूमंडलीकरण के दौर में मानव सभ्यता की इस विरासत को सुरक्षित नहीं रखा तो वर्तमान पीढ़ी के साथ ही ये विस्मृत हो जाएँगी।  
इस संकलन में झारखंड, महाराष्ट्र, गुजरात और अंडमान-निकोबार की कथाओं को शामिल किया गया है। इन्हें पाठकों की सुविधा के लिए 12 खंडों में विभाजित किया गया है। पृथ्वी की उत्पत्ति से संबंधित खंड में आदिवासी समूहों व समाजों में मौजूद आस्थाओं, विश्वासों व उनकी अपनी-अपनी अवधारणाओं पर आधारित लोककथाएँ शामिल की गई हैं।
‘पशु-पक्षी और जलचर खंड’ में संताली की ‘छोटी चिड़िया की कथा’ में छोटी चिड़िया की वीरोचित कथा का संवाद सुनकर मानव में एक संदेश पहुँचता है कि कैसे एक छोटी चिड़िया भी एक अन्यायी एवं अहंकार से भरे हाथी का दर्प-दलन कर सकती है। यह साहस तभी जुटने लगता है, जब कोई व्यक्ति अथवा प्राणी सत्य-पथ पर चलकर किसी अत्याचारी के विरुद्ध अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति एवं संकल्प के साथ सामना करने के लिए तैयार हो। इस खंड में मानव और अन्य जीवों के बीच भावनात्मक संबंधों की प्रेरणादायक कथाएँ संकलित हैं। 
इसके अलावा ‘प्रेम-कथा’, ‘विवाह, गोत्र और रीति- रिवाज’, ‘रिश्तों का सच’, ‘कायांतरण’ और ‘लोकजन्य कथाएँ’ खंड की मिथ कथाओं में स्वैरागात्मक व संवेदनाओं, सामाजिक गतिविधियों के उद्भव व विकास, प्रकृति के सहयोग व संवाद और मनुष्य की विभिन्न अच्छी-बुरी प्रवृत्तियों को रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

Ramnika Gupta

रमणिका गुप्ता
अध्यक्ष रमणिका फाउंडेशन
जन्म: 22 अप्रैल, 1930, सुनाम (पंजाब)
शिक्षा: एम. ए., बी. एड.
बिहार/झारखंड की पूर्व विधयक एवं विधन परिषद् की पूर्व सदस्या। कई गैर-सरकारी एवं स्वयंसेवी संस्थाओं से संबद्ध  तथा सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक कार्यक्रमों में सहभागिता। आदिवासी और दलित महिलाओं-बच्चों के लिए कार्यरत। कई देशों की यात्राएँ। विभिन्न सम्मानों एवं पुरस्कारों से सम्मानित।
प्रकाशित कृतियाँ: पातियाँ प्रेम की, भीड़ सतर में चलने लगी है, तुम कौन, तिल-तिल नूतन, मैं आजाद हुई हूँ, अब मूरख नहीं बनेंगे हम, भला मैं कैसे मरती, आदिम से आदमी तक, विज्ञापन बनता कवि, कैसे करोगे बँटवारा इतिहास का, प्रकृति युद्धरत है, पूर्वांचल: एक कविता-यात्रा, आम आदमी के लिए, खूँटे, अब और तब, गीत-अगीत (काव्य-संग्रह); सीता, मौसी (उपन्यास); बहू-जुठाई (कहानी-संग्रह); हादसे (आत्मकथा) मेरे साक्षात्कार; स्त्री-विमर्श: कलम और कुदाल के बहाने, दलित हस्तक्षेप, निज घरे परदेसी, सांप्रदायिकता के बदलते चेहरे, दलित चेतना: साहित्यिक और सामाजिक सरोकार, दक्षिण-वाम के कटघरे और दलित-साहित्य, असम नरसंहार--एक रपट, राष्ट्रीय एकता, विघटन के बीज (गद्य पुस्तकें) इसके अलावा छह काव्य-संग्रह, चार कहानी-संग्रह एवं बारह विभिन्न भाषाओं के साहित्य की प्रतिनिधि रचनाओं का संकलन-संपादन। शरणकुमार लिंबाले की पुस्तक ‘दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र’ का मराठी से हिंदी में अनुवाद। इनके उपन्यास ‘मौसी’ का अनुवाद तेलुगु में ‘पिन्नी’ नाम से और पंजाबी में ‘मासी’ नाम से हो चुका है। जहीर गाजीपुरी द्वारा उर्दू में अनूदित इनका कविता-संकलन ‘कैसे करोगे तकसीम तवारीख को’ प्रकाशित। इनकी कविताओं का पंजाबी अनुवाद बलवीर चंद्र लांगोवाल ने किया जो ‘बागी बोल’ नाम से प्रकाशित हो चुकी है।

Scroll